Saturday, April 30, 2016

11 वीं शताब्दी में जब महमूद गजनी सोना लूटने के लिए सोमनाथ मंदिर की और बढ़ रहा था तो मंदिर के पुजारीयों को सलाह दी गयी कि स्वर्ण भण्डार को शहर के नागरिकों में बाँट दो (29-Apr-2016) No.2

April 29, 2016 No.2

https://www.facebook.com/mehtarahulc/posts/10153453698461922

11 वीं शताब्दी में जब महमूद गजनी सोना लूटने के लिए सोमनाथ मंदिर की और बढ़ रहा था तो मंदिर के पुजारीयों को सलाह दी गयी कि स्वर्ण भण्डार को शहर के नागरिकों में बाँट दो। यदि ऐसा कर दिया जाता तो ग़जनी के सोमनाथ आने का उद्देश्य ही खत्म हो जाता। और यदि तब भी वह सोमनाथ पहुँचता तो उसे सोना हासिल नहीं होता। क्योंकि एक एक व्यक्ति से सोना लूटना संभव नहीं था। लेकिन सोमनाथ के पुजारियों ने ऐसा नहीं किया और गजनी ने आकर वहाँ ग़दर मचा दिया। उसने मंदिर को ध्वस्त किया, श्रद्धालुओं व पुजारियों का कत्ले आम किया और सोने के साथ शिवलिंग के भी टुकड़े करके साथ ले गया। 

सोमनाथ मंदिर में इतना सोना आया कहाँ से था ? क्योंकि मंदिर तो कोई व्यापारिक संस्था नहीं है, जो मुनाफा कमा कर सोना अर्जित करें। जाहिर है यह सोना समुदाय के श्रद्धालुओं द्वारा दिए गए दान से एकत्र हुआ था। फिर पुजारियों और मंदिर प्रबंधकों ने यह सोना फिर से समुदाय में बाँटने से इंकार क्यों कर दिया ?

मान लीजिए कि आप के सरकारी बैंक के मेनेजर है और आपको पता है कि दुश्मन की सेना आपके बैंक को लूटने के लिए बढ़ रही है। बचने का कोई उपाय नहीं। आपके पास सेना नहीं है और न ही बैंक की तिजोरी में पड़े सोने को छिपाने की कोई सुरक्षित जगह है और आप ही निर्णयकर्ता है तो आप क्या करेंगे ? तब आपके पास दो ही विकल्प बचते है -- १) या तो आप इस संपत्ति को दुश्मन के हाथों में जाने दें या २) समुदाय में बाँट दे। बैंक में जमाकर्ताओं की गयी राशि हो सकती है, जो कि बैंक की देनदारी है। लेकिन मंदिर के स्वामियों की कोई देनदारी नहीं थी। फिर भी उन्होंने इस संपत्ति को मंदिर में रखने का जोखिम क्यों उठाया ? उन्हें एक कमजोर उम्मीद थी कि यदि सोना बच गया तो यह उनके पास बना रहेगा। और इस आशा में वे यह जोखिम उठाने को तैयार हो गए !! 

दरअसल तब मंदिरों पर स्वामित्व मंदिर के पुजारियों/महन्तो आदि का था। समुदाय का उन पर कोई नियंत्रण नहीं था। इन महन्तो को समुदाय के नागरिकों द्वारा न तो नियुक्त किया जाता था न ही पद से हटाया जा सकता था। महन्त उत्तराधिकार द्वारा पद ग्रहण करते थे और आजीवन अपने पद पर बने रहते थे। इस व्यवस्था के कारण मंदिर प्रमुख दान से प्राप्त संपत्ति का उपयोग सामुदायिक कार्यों में करने की जगह उनका संग्रहण करते थे। इस तरह जहां मंदिरों द्वारा किये जा रहे परोपकार कार्यों में कमी आई और समुदाय का क्षरण हुआ वही दूसरी और विपुल सम्पदा होने के कारण मंदिर आक्रमणकारियों के निशाने पर आ गए। 

1000 वर्ष बाद आज भी धर्म के प्रशासन में यह व्यवस्थागत दोष मौजूद होने से हिन्दू धर्म का प्रशासन निरन्तर कमजोर हो रहा है और अन्य धर्मो की तुलना में हिन्दू धर्म पिछड़ता जा रहा है।

समाधान - हिन्दू धर्म के प्रशासन को मजबूत बनाने के लिए हमने जो प्रक्रिया प्रस्तावित की है, उसे गैजेट में प्रकाशित करने से हिन्दू धर्म को भी सिक्ख धर्म के समान मजबूत बनाया जा सकता है। इस प्रस्तावित ड्राफ्ट का समर्थन करने के लिए निचे दिए गए लिंक को क्लिक करके इसे पढ़े और यदि आप इसका समर्थन करते है तो इसके कमेंट बॉक्स में 'I support' लिखें। साथ ही अपने सांसद को एसएमएस द्वारा आदेश भेजे कि इस क़ानून ड्राफ्ट को गैजेट में प्रकाशित किया जाए। 

ड्राफ्ट का लिंक ---https://web.facebook.com/ProposedLawsHindi/posts/570764579768407

[ राष्ट्रीय हिन्दू देवालय प्रबंधक ट्रस्ट के लिए प्रस्तावित कानूनी ड्राफ्ट ] (29-Apr-2016) No.1

April 29, 2016 No.1

https://www.facebook.com/mehtarahulc/posts/10153453786806922

[ राष्ट्रीय हिन्दू देवालय प्रबंधक ट्रस्ट के लिए प्रस्तावित कानूनी ड्राफ्ट ]
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भारत के सभी नागरिकों,
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यह स्तम्भ हिन्दू धर्म के प्रशासन को मजबूत बनाने के लिए आवश्यक प्रस्तावित प्रक्रिया का विवरण प्रस्तुत करता है।
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यदि आप इस कानूनी ड्राफ्ट का समर्थन करते है तो अपने सांसद को एसएमएस द्वारा इस पोस्ट का लिंक भेजें। तथा इस स्तम्भ के कमेंट बॉक्स में 'I support' या 'मैं समर्थन करता हूँ' दर्ज करें।
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इस कानूनी ड्राफ्ट की जानकारी देश के नागरिको तक पहुंचाने के लिए इस स्तम्भ को शेयर करें, समाचार पत्रो में विज्ञापन दें, इस मुद्दे पर चुनाव लड़ें तथा इस पोस्ट के पहले कमेंट में सुझायी गयी अन्य गतिविधियों में भाग लें। यदि आप इस पोस्ट के पहले तथा दूसरे कमेंट को नहीं देख पा रहे है तो, इस पेज के विवरण खंड (डिस्क्रिप्शन कॉलम) को देखें। वहाँ इस पेज के सभी पोस्ट्स तथा शेष पांच कमेंट्स के लिंक की सूची दी गयी है।
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यदि करोड़ो नागरिक अपने सांसदो को अपने मोबाईल फोन से एसएमएस द्वारा आदेश भेजते है तो देश की वर्तमान व्यवस्था में क्या परिवर्तन आयेंगे ? इस प्रश्न तथा ऐसे ही अक्सर पूछे जाने वाले अन्य प्रश्नो के जवाब इस पोस्ट के दूसरे कमेंट में देखें जा सकते है। अन्य सम्बंधित जानकारी के लिए इस समुदाय का विवरण खंड देखें।
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टिप्पणी -- इस क़ानून ड्राफ्ट की विश्वसनीयता बनाएं रखने के लिए, इस पोस्ट को एक बार लिखे जाने के बाद संपादित नही किया गया है। वर्तनी या व्याकरण आदि की अशुद्धियों के सम्बन्ध में कृपया इस पोस्ट का छठा कमेंट देखें।
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सांसद को भेजे जाने वाले SMS का प्रारूप --
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"Hon MP, I order you to --https://web.facebook.com/ProposedLawsHindi/posts/570764579768407, voter ID : #####"
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माननीय सांसद,
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यदि आपको इस पोस्ट का लिंक एसएमएस द्वारा प्राप्त होता है तो, ऐसा एसएमएस आपके लिए मतदाता द्वारा भेजा गया आदेश है। इस पोस्ट के लेखक का भेजे गए ऐसे आदेश या एसएमएस से कोई लेना देना नहीं है। आपको भेजा गया ऐसा आदेश इस कानूनी ड्राफ्ट को भारत के राजपत्र में प्रकाशित करने के लिए दिया गया है।
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(टिप्पणी -- इस कानूनी ड्राफ्ट के मूल अंग्रेजी संस्करण का लिंक इसी पोस्ट के दसवें कमेंट में दर्ज किया गया है।)
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सैक्शन A. संक्षेपण
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300 ईस्वी पूर्व से हिंदूवाद का विस्तार थम गया था, तथा 700 ई.पू. से यह लगातार सिमटना शुरू हो गया। 300 ई. पू. में हिंदूवाद का प्रसार अफगानिस्तान से लेकर फिलीपींस तक था। 1600 ई.पू. तक आते आते लगभग 35% जनसँख्या तथा 50% भूमि दूसरे धर्मों के अधीन चली गयी।
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सिखों तथा मराठा ने इस क्षति को काफी हद तक रोका तथा बहुत सारी भूमि फिर से प्राप्त कर ली। लेकिन धर्म-परिवर्तित लोगों को फिर से जोड़ नहीं सके। इनकी यह पुनर्विजय स्पेन की धार्मिक पुनर्विजय (जिसमें पहले ईसाई बहुल रहे स्पेन ने अपनी खोई हुई धार्मिक स्वतंत्रता को मुस्लिमों के हाथों से दोबारा प्राप्त कर लिया था ), की तुलना में काफी कमजोर रही। यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न है कि यह इतनी कमजोर क्यों थी ? फिर 1947 ईस्वी में हिंदुओं ने अपनी भूमि का बड़ा हिस्सा पाकिस्तान के रूप में गवाँ दिया तथा बाद में इसी का एक बड़ा हिस्सा बांग्लादेश बना और 1947 से लेकर अब तक उत्तर-पूर्व तथा कश्मीर का लगभग आधा हिस्सा हम गँवा चुके है।
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1700 ईस्वी से लेकर अब तक हिन्दुत्व से धर्म-परिवर्तन करके लोग ईसाई बन रहे है। और पिछले 20 वर्षों में ये धर्म-परिवर्तन की प्रवृत्ति तेजी से बढ़ी है। किसी अन्य लेख में हम उन कारणों पर भी लिखेंगे कि भूतकाल में हिन्दुत्व को यह क्षति क्यों हुई। यह लेख वर्तमान एवं भविष्य की संभावनाओ के सम्बन्ध में है।
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हमारे विचार से वर्तमान में मिशनरियों के हाथों हिन्दुत्व की लगातार होती हानि के निम्नलिखित मुख्य कारण है :
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1. मिशनरियों का गठबंधन बहुराष्ट्रीय कंपनियों के मालिकों के साथ है। बहुराष्ट्रीय कंपनियों के पास भारत की तुलना में ज्यादा अच्छी तकनीक तथा सेना है। उनके पास ज्यादा अच्छी तकनीक होने का कारण है पश्चिमी देशों में राइट टू रिकॉल पुलिस प्रमुख, राइट टू रिकॉल न्यायाधीश, ज्यूरी सिस्टम , संपत्ति कर आदि क़ानून प्रक्रियांए है । जबकि हमारे पास भारत मे ऐसे कानून नहीं है ; इसलिए मिशनरी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के सहयोग से बढ़त बना रहे है |
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2. चर्च में नियुक्तियों तथा धन को सामुदायिक समूहों में बांटने की प्रक्रियाएं मंदिरों की तुलना में ज्यादा अच्छी है। इसके ज्यादा अच्छे होने के निम्नलिखित कारण हैं :
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(2a) चर्च ऑफ़ इंग्लैण्ड नामक एक प्रोटेस्टेंट संप्रदाय में चर्च के पैसों के वितरण सम्बन्धी सभी निर्णय पादरी (priests) लेते है। परन्तु ये पादरी प्रधानमंत्री/सांसदों के द्वारा नियुक्त होते है तथा कोई भी आपराधिक कार्य करने पर नागरिकों की ज्यूरी के नियंत्रण में होते है। साथ ही चर्च की संपत्ति पर उनका कोई उत्तराधिकार नही होता।
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(2b) अन्य सभी प्रोटेस्टेंट सम्प्रदायों में स्थानीय बुजुर्गों द्वारा पादरी नियुक्त किया जाता है। चर्च के पैसों पर उत्तराधिकार लागू नही होता, और इसलिए प्रोटेस्टेंट चर्चों में धन इकठ्ठा करने की ओर झुकाव नही पाया जाता। अत: वे इस धन का उपयोग समुदाय के निर्माण व विकास में करते है।
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(2c) कैथोलिक में चर्च के पैसों के समाज में बांटने सम्बन्धी निर्णय पादरी द्वारा लिए जाते है, जो कि पोप के अधीन होता है। अगले पोप को नौकरी पर रखने के लिए 100-200 सर्वाधिक पुराने पादरी जिन्हें कार्डिनल्स कहते हैं, वोट करते हैं। चूँकि पादरी शादी नहीं कर सकता तथा उनमें गुरु प्रथा भी नही होती, अत: उत्तराधिकार यहाँ भी लागू नही होता। मतलब वर्तमान पादरी द्वारा अगले पादरी की नियुक्ति नहीं की जाती है। इसीलिए कैथोलिक चर्चों में भी संपत्ति संग्रह नही होता, तथा ये भी दान में मिले पैसों को समुदाय के निर्माण व विस्तार पर खर्च करते है।
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3. प्राचीन हिंदूवाद के अंतर्गत "मंदिरों" का प्रशासन :
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रामायण एवं महाभारत में एक भी ऐसे मंदिर की चर्चा नही मिलती जिसके पास प्रचुर मात्रा में स्वर्ण और धन हो !! इस सम्बन्ध में जो कुछ भी हमें पढ़ने को मिलता है उससे पता चलता है कि उस समय में मंदिरों की जगह आश्रम होते थे। इन आश्रमों को दान के रूप में मिले धन का उपयोग गायों की सेवा, सबको गायों का दूध उपलब्ध कराने, अमीर-गरीब का भेद किये बिना सभी बच्चों को गणित, विज्ञान, कानून, भाषा तथा अस्त्र-शस्त्र (हथियार चलने) की शिक्षा देने, गरीबों को दवाई दिलवाने तथा उनके भलाई के लिए किया जाता था। इसलिए आश्रम-प्रमुख को "पुरोहित" कहते थे जो दो शब्दों से बना है- "पर" तथा "हित", अर्थात ऐसा व्यक्ति जो दुसरो के कल्याण की चिंता करे। आश्रम उत्तराधिकार (वारिस) द्वारा नही चलता था। तथा जरूरी नही था कि आश्रम-प्रमुख के पुत्र को हीं आश्रम की बागडोर सौंपी जाये। आश्रम की यह बागडोर एक संत से दूसरे ऐसे संत को दी जाती थी जो कि समाज में सम्मानित होते थे। इनका कार्यकाल भी स्थायी नही होता था। संत बहुधा यात्रा पर रहते थे और मुक्त विचरण करते थे। यह व्यवस्था अब बहुत ही कम हिन्दू समुदायों में बची हुई है।
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4. वर्तमान हिन्दू मंदिरों का प्रशासन -
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वर्तमान हिन्दू मंदिरों में धन के समाज में बांटने सम्बन्धी निर्णय मंदिर प्रमुख (ट्रस्टी) या संप्रदाय प्रमुख (गुरु) द्वारा लिए जाते है, तथा इनका ही मंदिरों की संपत्ति के उपयोग पर पूर्ण नियंत्रण होता है। ट्रस्टी का पद उत्तराधिकार तथा गुरु प्रथा द्वारा हस्तांतरित होता है। मतलब आज का गुरु ही अगला गुरु नियुक्त करता है। अतः यहाँ संपत्ति इकठ्ठा करने की ओर झुकाव होता है, तथा इसका उपयोग तड़क-भड़क, दिखावे एवं ऐशो आराम में भी किया जाता है।
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इसका समाधान सिक्ख गुरुओं ने, खासकर 10 वें सिक्ख गुरु श्री गोविन्द सिंह जी ने ढूंढ निकाला था तथा इसे सभी सिक्ख गुरुद्वारों में लागू किया। किन्तु दुर्भाग्य से यह कभी भारत के सभी मंदिरों में लागू नही हो सका। हमारे विचार से हमें इसे आज ही लागू करवाने के प्रयास करने चाहिए। समस्या का समाधान यह है कि सभी हिन्दू मंदिरों के लिए सिक्ख गुरुद्वारा प्रबंधक कमिटी (एसजीपीसी) जैसा कानून बनाया जाये। तथा इस प्रकार इस कानून के माध्यम से हम मंदिरों में संपत्ति को इकठ्ठा करने की प्रवृति को कम करके हिंदूवाद का पतन रोक सकते है।
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सैक्शन B. किस प्रकार पूरे जीवन के कार्यकाल और वारिसान (उत्तराधिकार) से मंदिरों में जमाखोरी को बढ़ावा मिलता है ?
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पाठक हमसे असहमत होकर यह कह सकते है कि यदि मंदिरों में पूरे जीवन के कार्यकाल तथा उत्तराधिकार प्रणाली (वारिस प्रथा) है तो इसमें बुराई क्या है ? और गुरू प्रथा में गलत क्या है, जिससे आज के गुरू ही अपने शिष्यों में से किसी एक को अगला गुरू चुनते है ? यह एक जायज प्रश्न है।
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आइये, हम दो परिस्थितियों की तुलना करके देखें - पहला, जिसमें मंदिर प्रमुख A का कार्यकाल मात्र 2 वर्षों का है, और दूसरी परिस्थिति जिसमें मंदिर प्रमुख B का कार्यकाल पूरे जीवन का है। मान लीजिये प्रमुख A तथा प्रमुख B दोनों हीं अलग-अलग मामलों में 1-1 करोड़ रूपये प्राप्त करते है। ऐसी स्थिति में B, जिसका कार्यकाल पूरे जीवन का है, उस 1 करोड़ रूपये को खर्च करने की बजाय लम्बे समय तक अपने पास रखना चाहेगा। लेकिन चूंकि A का कार्यकाल कुछ वर्षों के लिए निश्चित है, इसीलिए A इस पैसे को जितना सम्भव हो सकेगा, सामुदायिक कार्यों और धर्म के उत्थान में हीं लगाएगा, ताकि उसे नाम मिले और उसके फिर से चुने जाने की सम्भावना भी बढ़ जाये। इस प्रकार पूरे जीवन के कार्यकाल से खर्च की इच्छा घटती है, और जमाखोरी की इच्छा बढ़ती है। जबकि कुछ वर्षों के निश्चित कार्यकाल से जमाखोरी की सम्भावना घटती है, और समाज के कार्यों में खर्च करने की इच्छा बढ़ती है।
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भारत में मंदिरों के प्रशासन में बहुधा उत्तराधिकार और पूरे जीवन का कार्यकाल दोनों हीं साथ-साथ पाये जाते हैं। प्रत्येक ऐसी संस्था जिसमें पूरे जीवन का कार्यकाल होता है, वहाँ उत्तराधिकार (वारिस प्रथा) भी होता है। इसी प्रकार उत्तराधिकार प्रथा वहीँ होती है जहाँ कि पुरे जीवन का कार्यकाल भी होता है। निश्चित समय का कार्यकाल होने से पूरे जीवन का कार्यकाल तथा गुरु प्रथा दोनों हीं अपने आप रद्द हो जाते है।
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सैक्शन C. किस प्रकार मंदिरों में पूरे जीवन के कार्यकाल एवं उत्तराधिकार से समाज की रक्षा पंक्ति कमजोर होती चली जाती है ?
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सैक्शन B में दिए गये उदाहरण में प्रमुख B अपने उत्तराधिकारी के लिए धन इकठ्ठा करना चाहेगा और उत्तराधिकारी भी उस पर जितना सम्भव हो कम खर्च करने के लिए दबाव बनाएंगे। इसीलिए जमाखोरी आगे बढ़ते हीं जायेगी, समाज के लिए कार्यों में गिरावट आएगी, और समस्या बद से बदतर होती जायेगी। समाज के लिए कार्यों में धन खर्च करने की जगह धन इकठ्ठा करने के झुकाव से समाज की रक्षा क्षमता कमजोर पड़ती है।
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उदाहरण के लिए मान लीजिये दो समुदाय A तथा B हैं। समुदाय A में मंदिर प्रमुख का कार्यकाल निश्चित है, तथा प्रमुख का चुनाव अनुयायियों (चेलों) द्वारा किया जाता है। समुदाय B में मंदिर प्रमुख का कार्यकाल पूरे जीवन का है, तथा उत्तराधिकार प्रथा भी है। मान लीजिए कि समुदाय B पर कोई बाहरी आक्रमण होता है, जिसमें समुदाय के 1000 में से लगभग 100 सदस्यों ने युद्ध में जाने का निर्णय लिया। मान लीजिये युद्ध में उनमें से 10 मारे गये तथा 10 बुरी तरह घायल हो गये। अब यदि घायलों तथा मारे गये व्यक्तियों के रिश्तेदारों को मंदिर कोई सहायता नही देते, तो अगली बार हमले में बहुत कम व्यक्ति लड़ने जायेंगे। इसका परिणाम ये होगा कि समुदाय का नियंत्रण हमला करने वालों के हाथों में चला जायेगा।
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यदि समुदाय A के साथ भी समान परिस्थिति की कल्पना करें तो चूँकि यहाँ धन इकठ्ठा करने की प्रवृति नहीं होती इसलिए मंदिर प्रमुख घायलों एवं मृत तथा घायल व्यक्तियों के रिश्तेदारों की सहायता करेंगे। इसलिए अगली बार भी युद्ध छिड़ने पर बड़ी संख्या में लोग अपनी जान जोखिम में डाल कर लड़ने जायेंगे।
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इस प्रकार निम्नलिखित बातें स्पष्ट होती है कि यदि मंदिर में धन के इकट्ठे करने की ओर झुकाव है तो :
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1. मंदिर की तरफ से घायलों तथा मरने वालों के रिश्तेदारों को मिलने वाली सहायता में कमी आती है।
2. इसलिए समुदाय की सुरक्षा के लिए लड़ने की इच्छा रखने वाले सदस्यों की संख्या में कमी आती है।
3. इसका परिणाम ये होता है कि समुदाय को युद्ध में पराजय का सामना करना पड़ता है।
सिक्ख प्रशासन में उत्तराधिकार परम्परा नहीं होने से गुरूद्वारे प्रमुखों में धन संग्रह की प्रवृति नहीं थी और यही कारण है कि गैर सिक्ख हिन्दू पराजित हुए जबकि सिखों ने आक्रमणकारियों को युद्धों में कड़ी टक्कर दी। गैर सिक्ख हिन्दूओं में मंदिर प्रमुख आजीवन तथा उत्तराधिकार द्वारा नियुक्त होते हैं, इसलिए उनमें धन को इकठ्ठा करने की ओर झुकाव होती है, तथा वे घायलों व मृतकों के परिवार वालों की बहुत कम मदद कर पाते हैं या करते हीं नही। जबकि सिख गुरुद्वारा प्रबंधक का चुनाव निश्चित समय के कार्यकाल के लिए होता है, इसलिए उनमें धन को इकठ्ठा करने की ओर झुकाव नहीं पाया जाता, इसलिए वे घायलों और मरने वालों के रिश्तेदारों की मदद करते हैं। इसलिए सिक्ख समुदाय में धर्म के लिए लड़ने का जोश बना रहता है, तथा लगातार बढ़ता हीं जाता है। और इस कारण सिक्ख अपने आप को और हिंदुओं को मुगलों व अफगानों के हिंसक आक्रमणों में सुरक्षा दे पाये।
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सैक्शन D. मंदिरों की संपत्ति पर मिशनरियों के कब्जे में उत्तराधिकार प्रथा किस प्रकार सहायक हुई ?
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मंदिरों में उत्तराधिकार व्यवस्था ने एक लम्बे समय तक बने रहने वाली समस्या को जन्म दिया। हम यहाँ एक मंदिर का उदाहरण बिना उसका नाम लिए देना चाहेंगे। यह मंदिर लगभग 1000 वर्ष पूर्व बनाया गया था तथा उसका एक महंत था। उसके 5 बेटे थे जो कि उसके बाद महंत बने। उनमें से हरेक कुछ समय के समय के लिए महंत की गद्दी पर बैठता था। फिर उन 5 में से हरेक को 2 या 3 पुत्र हुए, यानी कुल मिलकर लगभग 12 पुत्र। उन पाँचों के मरने के बाद उनके ये 12 पुत्र, यानी प्रथम महंत के पोते वारिस बने। अब ये 12 भी बारी बारी से कुछ समय से चक्रीय क्रम से (बारी-बारी से) महंत की गद्दी पर बैठते थे।
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लेकिन उनकी भागीदारी समान नहीं रहती। जैसे- यदि A के 2 पुत्र A1 तथा A2 थे एवं B के 4 पुत्र B1, B2, B3 तथा B4 थे। ऐसी स्थिति में A1 या A2 की भागीदारी B1, B2, B3 या B4 की तुलना में ठीक दोगुनी हो जायेगी। अक्सर ऐसा भी होता है कि किसी महंत का कोई पुत्र न हो और उसकी मृत्यु हो जाये। अब ऐसे में यदि उसने पुत्र गोद लिया है या पुत्र का जन्म उसकी मृत्यु के बाद हुआ हो तो ऐसे में वह महंत बनेगा या नहीं इस पर कानूनी विवाद चल सकता है। साथ हीं भागीदारी पर भी विवाद हो सकता है। इसलिए इस तरह लगभग 20-30 पीढ़ियों के बाद अमुक मंदिर के लगभग 500 महंत हैं। साथ हीं उत्तराधिकार सम्बन्धी 50 से अधिक अनसुलझे मुकदमे भी कोर्ट में चल रहे हैं । इन मुकदमों का बहाना बनाकर भारत सरकार मंदिरों का अधिग्रहण कर सकती है। चूँकि भारत के प्रमुख राजनीतिक दल मिशनरी के दलाल हैं, इसीलिए मंदिरों की दान द्वारा प्राप्त पैसा मिशनरियों द्वारा चलायी जा रही धर्मार्थ संस्थाओं के पास चला जाता है। इस प्रकार मिशनरियों को मंदिरों से पैसे प्राप्त होते हैं जिसका उपयोग वे हिन्दूओं का धर्मपरिवर्तन कर उन्हें ईसाई बनाने में करते हैं।
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इस प्रकार मंदिरों में उत्तराधिकार के चलते दर्जनों विवाद खड़े होते हैं जिससे कि सरकार द्वारा मंदिरों की संपत्ति पर कब्ज़ा करना आसान हो जाता है।
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सैक्शन E. प्रस्तावित समाधान संक्षेप में
हिन्दू मंदिरों के लिए हम यहाँ सिक्ख गुरुद्वारा प्रबंधक समिति अधिनियम जैसा एक ढांचा प्रस्तावित कर रहे हैं। समस्या यह है कि हिन्दू धर्म में अनेक संप्रदाय हैं तथा इनमें से हरेक स्वयं को दूसरे से अलग रखना चाहता है। साथ हीं एक मुख्य समस्या करों से सम्बंधित है। धार्मिक ट्रस्टों पर कॉर्पोरेट के समतुल्य हीं परन्तु कुछ छूट के साथ कर लगाये जाने चाहिए। यदि ट्रस्टों पर कर नहीं लगाया जाये तो लोग ट्रस्ट बनाकर उसके माध्यम से करों से बचने लगेंगे। एक अन्य मुद्दा राज्य- केंद्र सम्बन्ध तथा भाषा का है। भाषा की समस्या के चलते सभी राज्य अपने सभी मंदिरों का प्रबंधन केंद्र के अधिकार में नहीं देना चाहेंगे।
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हम जो समाधान प्रस्तावित कर रहे हैं उसमें तीन प्रकार के HMPC = हिन्दू मंदिर प्रबंधक समितियों की स्थापना होगी - एक राष्ट्रीय स्तर पर, प्रत्येक राज्य के लिए एक, और प्रत्येक संप्रदाय के लिए एक। प्रत्येक समिति में एक प्रमुख तथा 4 ऐसे सदस्य होंगे जिनका निर्वाचन मतदाताओं द्वारा 2 वर्ष के लिए होगा। लेकिन किसी भी दिन मतदाता एस.एम.एस./ए.टी.एम द्वारा या पटवारी के कार्यालय में स्वयं जाकर उन्हें बदलने का वोट देकर बदल भी सकते हैं। प्रत्येक हिंदू मंदिर प्रबंधक समीति (HMPC) को धार्मिक ट्रस्ट की श्रेणी प्राप्त होगी। एक व्यक्ति इसके चुने गए सदस्य के तौर पर अपने पूरे जीवनकाल में अधिकतम 4 वर्ष हीं रह सकता है। साथ हीं पुजारी तथा कर्मचारियों को नौकरी लिखित परीक्षा द्वारा मिलेगी तथा ज्यूरी सिस्टम का उपयोग करके इन्हें बदला जा सकेगा।
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नागरिकों की जूरी द्वारा आपराधिक मामलों की सुनवाई होगी। प्रत्येक हिंदू मदिर प्रबंधक समीति (HMPC) की सम्पत्ति पर कर लगेगा जिस पर 100 रूपये (या एक निश्चित रकम) प्रति सदस्य प्रति वर्ष छूट का नियम लागू होगा। प्रत्येक नागरिक 5 ट्रस्टों को करों में राहत या छूट प्रदान कर सकता है। टैक्स के नियम सभी ट्रस्टों के लिए समान होंगे, चाहे वे हिन्दू, क्रिस्चियन, सिख, जैन, मुस्लिम, बौद्ध या कोई अन्य दान संस्था अथवा ट्रस्ट हों। एक नागरिक कितने भी ट्रस्टों का सदस्य हो सकता है। सदस्य दो प्रकार के हो सकते हैं- मतदाता सदस्य तथा गैर-मतदाता सदस्य। सिर्फ मतदाता सदस्य हीं सीमिति सदस्यों का चुनाव कर सकते हैं।
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इसकी विस्तृत जानकारी इस प्रकार है -
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1. NHDPT = ( राष्ट्रीय हिन्दू देवालय प्रबंधन ट्रस्ट):
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प्रत्येक हिन्दू, सिख, जैन, बौद्ध आदि इस ट्रस्ट के जन्म से सदस्य होंगे, जब तक कि वे स्वयं अपनी सदस्यता नहीं छोड़ देते (नागरिक मताधिकार का प्रयोग मतदाता सूची में नाम दर्ज होने पर ही कर सकेंगे), इस ट्रस्ट को अपनी ओर से करों (टैक्स) में छूट का लाभ वे दे भी सकते हैं और नहीं भी दे सकते है, लेकिन प्रत्येक स्थिति में उनका मतदान का अधिकार बना रहेगा। मुस्लिम तथा क्रिश्चियन इस ट्रस्ट के सदस्य नहीं बन सकेंगे। ट्रस्ट के प्रमुख का चुनाव सभी सदस्य मिलकर करेंगे तथा सदस्यों के पास मंदिर प्रमुख को किसी भी दिन बदलने का अधिकार भी होगा।
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प्रमुख द्वारा 4 व्यवस्थापकों को नौकरी दी जाएगी, जिन्हें मतदाता सदस्य चाहें तो किसी भी दिन बदल सकते हैं। ट्रस्ट को आय-कर तथा सम्पत्ति-कर देना होगा, तथा इसे करों में छूट उसी अनुपात में मिलेगी जितने छूट के यूनिट उसे सदस्यों द्वारा प्राप्त होंगे। शुरू में राष्ट्रीय हिंदू देवालय प्रबंधक ट्रस्ट (NHMPT) मात्र 4 मंदिरों की देख-रेख करेगा -- कश्मीर का अमरनाथ देवालय, राम जन्म भूमि देवालय, कृष्ण जन्म भूमि देवालय तथा काशी विश्वनाथ देवालय। आगे चलकर यह अन्य मंदिरों की देख-रेख भी कर सकता है, यदि सम्बंधित संप्रदाय स्वेच्छा से मंदिर को इसके सुपुर्द कर दे।
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2. RHDPT= ( राज्य हिन्दू देवालय प्रबंधक ट्रस्ट) :
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प्रत्येक राज्य में एक राज्य हिंदू देवालय प्रबंधन ट्रस्ट (RHDPT) होगा, जिसके सदस्य उस राज्य के प्रत्येक हिन्दू, सिख, जैन, बौद्ध आदि मतदाता होंगे, तथा वे तब तक सदस्य बने रहेंगे जब तक कि वे स्वयं अपनी सदस्यता न छोड़ना चाहें। वे चाहें तो अपनी ओर से ट्रस्ट को टैक्स (करों) में छूट का लाभ दे सकते हैं और नही भी दे सकते, इससे उनका मतदान का अधिकार प्रभावित नही होगा। मुस्लिम तथा क्रिश्चियन इस ट्रस्ट के सदस्य नहीं बन सकते। ट्रस्ट के प्रमुख का चुनाव सभी सदस्य मिलकर करेंगे, तथा सदस्यों के पास प्रमुख को किसी भी दिन बदलने का अधिकार भी होगा।
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प्रमुख द्वारा 4 व्यवस्थापकों की नियुक्ति की जायेगी, जिन्हें कि मतदाता सदस्य चाहें तो किसी भी दिन बदल सकते हैं। ट्रस्ट को आय कर तथा सम्पत्ति कर देना होगा, तथा इसे करों में छूट उसी अनुपात में मिलेगी जितने छूट के यूनिट उसे सदस्यों द्वारा प्राप्त होंगे। शुरू में राज्य हिंदू देवालय प्रबंधन ट्रस्ट (RHDPT) राज्य के उन्हीं मंदिरों की व्यवस्था करेगा जिन्हें कि सम्बंधित संप्रदाय उस राज्य के सम्पूर्ण हिन्दू समुदाय के सुपुर्द करना चाहेगा।
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3. RT = ( रिलिजियस ट्रस्ट अथवा धार्मिक ट्रस्ट) :
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जितने भी हिन्दू ट्रस्ट बने हैं, उनमें से हरेक को इस श्रेणी में रखा जाएगा। शुरू में सिर्फ ट्रस्टी हीं VM= वोटिंग मेंबर (मतदाता सदस्य) होंगे, तथा NVM= नॉन वोटिंग मेंबर्स (गैर मतदाता सदस्य) की संख्या शून्य होगी। फिर आज के मतदाता सदस्य 67% के बहुमत के साथ और मतदाता सदस्यों तथा गैर मतदाता सदस्यों को जोड़ सकते हैं। कोई एक नागरिक कितने भी धार्मिक ट्रस्टों में मतदाता सदस्य तथा गैर मतदाता सदस्य हो सकता है, बशर्ते उस धार्मिक ट्रस्ट को भी अपने सदस्यों के अन्य ट्रस्टों के सदस्य बनने से कोई एतराज न हो।
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प्रमुख की नियुक्ति मतदाता सदस्यों (VMs) द्वारा होती है जो कि 4 व्यवस्थापकों की नियुक्ति करता है। मतदाता सदस्य प्रमुख या किसी भी व्यवस्थापक को किसी भी दिन बदल सकते हैं। ट्रस्ट को आय कर तथा सम्पत्ति कर देना होगा, तथा इसे करों में छूट उसी अनुपात में मिलेगी जितने छूट के यूनिट उसे सदस्यों द्वारा प्राप्त होंगे। यदि इस ट्रस्ट (RT) में ऐसा कोई आतंरिक कानून है कि मतदाता सदस्यों के बच्चे भी मतदाता सदस्य बन सकेंगे तो अपने आप वे बच्चे मतदाता सदस्य बन जायेंगे। और एक बार यदि कोई धार्मिक ट्रस्ट इस अधिनियम के अंतर्गत आने की सहमति दे देता है तो फिर वह इस अधिनियम से बाहर नहीं हो सकेगा।
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4. मुस्लिम तथा क्रिश्चियन धार्मिक ट्रस्टों की व्यवस्था आज के कानूनों के अनुसार हीं होगी :
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टैक्स के लिए इन ट्रस्टों पर भी दूसरे ट्रस्ट के समान नियम लागू होंगे। तथा करों में उन्हें प्राप्त होने वाली छूट भी उनके सदस्यों द्वारा प्राप्त होने वाले कर छूट के यूनिटों के अनुपात में होगी।
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वर्तमान में भारत में धार्मिक ट्रस्ट कोई आय कर तथा संपत्त-कर नहीं देते, अत: इस क़ानून के आने से इस व्यवस्था मे बदलाव आएगा। इस कानून के लागू होने पर सभी ट्रस्टों को अपने स्वामित्व वाले प्लाट/इमारतों तथा सोना/चांदी के बाजार मूल्य के अनुसार तथा अपनी आय तथा प्राप्त होने वाले दान के अनुसार कर चुकाने होंगे। करों में छूट इस बात पर निर्भर करेगी कि नागरिकों से कर छूट के कितने यूनिट उन्हें प्राप्त होते हैं। आज के ट्रस्टों के लिए ट्रस्टी हीं मतदाता सदस्य माने जायेंगे, तथा उन्हें गैर मतदाता सदस्यों की आवश्यकता नहीं होगी।
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सैक्शन F. राष्ट्रीय हिन्दू देवालय प्रबंधक ट्रस्ट के ड्राफ्ट का विवरण
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इस स्तम्भ में 'राष्ट्रीय देवालय प्रबंधक ट्रस्ट' का ड्राफ्ट दिया गया है। विभिन्न सम्प्रदायों के प्रबंधन के लिए प्रस्तावित क़ानून ड्राफ्ट की जानकारी के लिए कमेंट बॉक्स देंखे।
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प्रधान मंत्री द्वारा निम्नलिखित ड्राफ्ट को राजपत्र में छापने के बाद राष्ट्रीय हिन्दू देवालय प्रबंधक ट्रस्ट (NHDPT) लागू हो जायेगा
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======ड्राफ्ट का प्रारम्भ=====
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व्यक्ति, जिसके पद का नाम कोष्ठ [ ] में दिया गया है, वह अधिकारी होगा जो कि सम्बंधित निर्देशों को लागू करेगा।
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[परिभाषाएं]
• ‘ट्रस्ट’ शब्द से मतलब ‘राष्ट्रीय हिन्दू देवालय प्रबंधक ट्रस्ट' (NHDPT) से है।
• ‘अध्यक्ष’ शब्द का मतलब है ट्रस्ट का अध्यक्ष।
• ‘ट्रस्टी’ शब्द का मतलब है ट्रस्ट का ट्रस्टी।
• ‘हिन्दू नागरिक’ शब्द का मतलब एक पंजीकृत मतदाता से है जो कि हिन्दू, सिख, बौद्ध, या जैन है, अथवा जिसे अध्यक्ष द्वारा हिन्दू कहकर सम्बोधित किया जाये, जब तक कि उस नागरिक ने स्वयं को गैर हिन्दू नहीं कहा हो।
• शब्द ‘सकता है’ (May) का मतलब है 'सम्भावना है' अथवा 'जरूरी नही है।' तथा साफ़ तौर पर इसका मतलब है 'कोई बाध्यता नही है'।
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(राष्ट्रीय हिन्दू देवालय प्रबंधक ट्रस्ट)
खण्ड -1 : अध्यक्ष तथा ट्रस्टी को नौकरी पर रखना एवं बदलाव
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1.1 [ प्रधान मंत्री ]
प्रधानमंत्री राष्ट्रीय हिन्दू देवालय प्रबंधक ट्रस्ट (NHDPT) का गठन करेगा, जिसका कार्यकारी अध्यक्ष प्रधानमंत्री स्वयं अथवा उसके द्वारा अपनी पसंद का कोई हिन्दू मन्त्री होगा, तथा उसी की पसंद के 4 हिन्दू मंत्री ट्रस्टी के रूप में होंगे।
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1.2 [ कलेक्टर ]
यदि 30 वर्ष से अधिक उम्र का कोई भी भारतीय नागरिक इस ट्रस्ट का अध्यक्ष बनना चाहे तो वह कलेक्टर के सामने उपस्थित होगा। कलेक्टर उससे सांसद चुनाव के लिए जमा की जाने वाली जमा राशि की तरह ही एक निश्चित रकम लेकर एक क्रम संख्या जारी करेगा, तथा उसका नाम प्रधानमंत्री की वेबसाइट पर रखेगा।
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1.3 [ तलाटी/पटवारी, ग्राम अधिकारी ]
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(1.3.1) यदि कोई नागरिक स्वयं पटवारी के कार्यालय आता है, 3 रूपये का शुल्क चुकाता है, तथा अधिकतम 5 व्यक्तियों के नामों का अनुमोदन अध्यक्ष के पद के लिए करता है, तो तलाटी उसके अनुमोदन को कम्प्यूटर में वेबसाइट पर दर्ज करेगा तथा उसे एक रसीद देगा, जिसमें उसका मतदाता पहचान पत्र संख्या, तिथि, समय, तथा उसके द्वारा अनुमोदित (पसंद किये गए) व्यक्तियों के नाम होंगे। बी.पी.एल कार्ड धारकों के लिए यह फीस मात्र 1 रूपये होगी।
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(1.3.2) यदि कोई नागरिक अपना अनुमोदन रद्द करना चाहता है तो वह पटवारी के कार्यालय जायेगा, तथा तलाटी उसके कहने पर बिना कोई शुल्क लिए उसके एक या एक से अधिक अनुमोदन रद्द कर देगा।
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(1.3.3) कलेक्टर मतदाता को एस.एम.एस द्वारा फीडबैक भेजने के लिए एक सिस्टम बना सकता है।
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(1.3.4) कलेक्टर मतदाता के उँगलियों के निशान तथा तस्वीर लेकर उन्हें रसीद पर डालने का सिस्टम भी बना सकता है।
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(1.3.5) मतदाता एस.एम.एस द्वारा अपना अनुमोदन दर्ज करा सकें, ऐसा सिस्टम प्रधानमंत्री बनवा सकता है। प्रधानमंत्री ऐसा सिस्टम बनवा सकता है, जिसमें मतदाता अपना अनुमोदन ए.टी.एम द्वारा दर्ज करा सके।
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1.4 [ पटवारी ]
पटवारी नागरिक की पसंद को जिले की वेबसाइट पर उसके मतदाता पहचान पत्र संख्या तथा पसंद को दर्ज करेगा।
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1.5 [ कलेक्टर ]
प्रत्येक सोमवार को कलेक्टर हरेक उम्मीदवार को प्राप्त अनुमोदनों की कुल संख्या सार्वजनिक रूप से दर्शायेगा।
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1.6 [ प्रधानमंत्री ]
यदि किसी उम्मीदवार को हिन्दू नागरिकों की कुल संख्या में से 35% का अनुमोदन प्राप्त हो जाता है, तथा यदि यह संख्या आज के अध्यक्ष को प्राप्त अनुमोदन से 1 करोड़ अधिक हो, तो प्रधानमंत्री उसे नया अध्यक्ष नियुक्त कर सकते हैं।
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1.7 [ कलेक्टर ]
यदि 30 वर्ष से अधिक उम्र का कोई भी भारतीय नागरिक ट्रस्टी बनना चाहे तो वह कलेक्टर के सामने उपस्थित होगा। कलेक्टर उससे सांसद चुनाव के लिए जमा की जाने वाली जमा राशि की तरह ही एक निश्चित रकम लेकर एक क्रम संख्या जारी करेगा, तथा उसका नाम प्रधानमंत्री की वेबसाइट पर रखेगा।
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1.8 [ तलाटी/पटवारी, ग्राम अधिकारी ]
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(1.8.1) यदि एक नागरिक स्वयं पटवारी के कार्यालय आता है, 3 रूपये का शुल्क चुकाता है, तथा अधिकतम 5 व्यक्तियों के नामों का अनुमोदन ट्रस्टी के पद के लिए करता है, तो तलाटी उसके अनुमोदन को कम्प्यूटर में वेबसाइट पर दर्ज करेगा तथा उसे एक रसीद देगा, जिसमें उसका मतदाता पहचान पत्र संख्या, तिथि, समय तथा उसके द्वारा अनुमोदित व्यक्तियों के नाम होंगे। बी.पी.एल कार्ड धारकों के लिए यह शुल्क 1 रूपये होगा।
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(1.8.2) यदि कोई नागरिक अपना अनुमोदन रद्द करना चाहता है तो वह तलाटी के कार्यालय जायेगा तथा तलाटी उसके कहने पर बिना कोई शुल्क लिए उसके एक या एक से अधिक अनुमोदन रद्द कर देगा।
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(1.8.3) कलेक्टर मतदाता को एस.एम.एस द्वारा फीडबैक भेजने के लिए एक सिस्टम बना सकता है।
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(1.8.4) कलेक्टर मतदाता के उँगलियों के निशान तथा तस्वीर लेकर उन्हें रसीद पर डालने कि पद्धति भी बना सकता है।
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(1.8.5) मतदाता एस.एम.एस द्वारा अपना अनुमोदन दर्ज करा सकें, ऐसा सिस्टम प्रधानमंत्री बनवा सकता है। प्रधानमंत्री ऐसा सिस्टम बनवा सकता है जिसमें मतदाता अपना अनुमोदन ए.टी.एम द्वारा दर्ज करा सके।
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1.9 [ प्रधानमंत्री ]
यदि किसी उम्मीदवार को हिन्दू नागरिकों की कुल संख्या में से 35% का अनुमोदन प्राप्त हो जाता है, तथा यदि यह संख्या आज के ट्रस्टी को प्राप्त अनुमोदन से 1 करोड़ अधिक हो, तो प्रधानमंत्री उसे नया ट्रस्टी बना सकते हैं, तथा आज के ट्रस्टी को हटा सकते हैं।
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1.10 [ प्रधानमंत्री ]
एक ही व्यक्ति ट्रस्टी के साथ साथ अध्यक्ष पद के लिए भी उम्मीदवार हो सकता है।
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1.11 [ प्रधानमंत्री ]
यदि किसी व्यक्ति ने ट्रस्टी या अध्यक्ष के पद पर 1000 दिनों तक कार्य कर लिया है तो प्रधानमंत्री उसे हटा कर अधिकतम अनुमोदन प्राप्त करने वाले व्यक्ति को उसकी जगह रख सकेंगे।
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1.12 [ ट्रस्टी ]
अध्यक्ष तथा ट्रस्टी मिलकर ट्रस्ट को चलाने तथा कर्मचारियों की व्यवस्था के लिए जरुरी नियम बनाएंगे।
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1.13 [प्रधानमंत्री]
यदि कोई ट्रस्टी अथवा अध्यक्ष किसी अन्य धार्मिक ट्रस्ट का ट्रस्टी या कर्मचारी बन जाता है तो ऐसी स्थिति में प्रधानमंत्री उसे हटा कर उसकी जगह ट्रस्टी या अध्यक्ष पद के ऐसे उम्मीदवार को रखेगा जिसे अधिकतम व्यक्तियों का अनुमोदन प्राप्त हो।
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खण्ड - 2 : ट्रस्ट की व्यवस्था तथा सदस्यता
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2.1 [ अध्यक्ष ]
ट्रस्ट की व्यवस्था अध्यक्ष करेगा। पुजारी तथा अन्य कर्मचारियों को अध्यक्ष द्वारा लिखित परीक्षा करवाकर 1000 दिनों के समय-काल के लिए नौकरी दी जायेगी, जो 2000 दिनों तक बढ़ाई जा सकती है।
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2.2 [ अध्यक्ष ]
कर्मचारियों के खिलाफ शिकायतों की सुनवाई के लिए अध्यक्ष जूरी प्रणाली का निर्माण करेगा। अर्थात वह जूरी प्रणाली का प्रारूप तैयार कर उसे लागू करेगा तथा इसकी व्यवस्था के लिए अधिकारियों की नियुक्ति एवं भूमिका तय करेगा।
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2.3 [ अध्यक्ष ]
यदि कोई सरकारी कर्मचारी ट्रस्टी या कर्मचारी बन जाता है तो जूरी द्वारा सुनवाई के बाद अध्यक्ष उसे पद से हटा देगा।
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2.4 [ अध्यक्ष ]
यदि किसी कर्मचारी ने 2000 दिनों से अधिक कार्य कर लिया है तो अध्यक्ष जूरी द्वारा सुनवाई के बाद उसे सेवा से हटा सकता है। उसके बाद वह कर्मचारी फिर से ट्रस्टी अथवा अध्यक्ष के तौर पर 1000 दिनों तक कार्य कर सकता है।
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खण्ड -3 : राष्ट्रीय मंदिर
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3.1 [ प्रधानमंत्री ]
भूमि के उपलब्ध होने पर प्रधानमंत्री निम्नलिखित 4 भूखण्ड ट्रस्ट के हवाले कर देंगे -- कश्मीर में अमरनाथ देवालय, राम जन्मभूमि देवालय, कृष्ण जन्मभूमि देवालय तथा काशी विश्वनाथ देवालय। इन 4 देवालयों की देखरेख तथा व्यवस्था ट्रस्ट करेगा।
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3.2 [अध्यक्ष]
यदि कोई सम्प्रदाय अपने किसी देवालय को ट्रस्ट के हवाले करता है तो उसकी देखरेख भी ट्रस्ट करेगा। अगले 15 वर्षों के अंदर वह संप्रदाय चाहे तो अपने उस देवालय को वापस ले सकता है। 15 वर्ष का समय पूरी होने पर ट्रस्ट उस संप्रदाय से लिखित में पूछेगा कि क्या वह देवालय को वापस लेना चाहता है या नही। यदि उस समय संप्रदाय ऐसा करने के लिए मना करता है तो वह देवालय हमेशा के लिए ट्रस्ट के देखरेख में हीं चलाया जायेगा।
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खण्ड - 4 : सदस्यता एवं मताधिकार
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4.1 [ अध्यक्ष/प्रधानमंत्री ]
हरेक व्यक्ति जो हिन्दू है तथा ट्रस्ट का गठन होने की तिथि को 18 वर्ष से अधिक उम्र का है, इस ट्रस्ट का स्वत: ही मतदाता सदस्य होगा। ट्रस्ट के गैर-मतदाता सदस्य नहीं होंगे। "हिन्दू" शब्द का मतलब हिन्दू धर्म के सभी संप्रदाय, सिख, जैन, बौद्ध आदि से है। फिर भी यदि कोई व्यक्ति किसी भी माध्यम से यह स्पष्ट करता है कि वह हिन्दू कहलाया जाना नहीं चाहता तो इस मतदाता सूची से उसका नाम हटा दिया जायेगा। बाद में जब वह फिर से हिन्दू कहलाया जाना चाहेगा तो उसका नाम फिर से इस सूची में शामिल कर लिया जायेगा।
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4.2 [ प्रधानमंत्री ]
यदि कोई हिन्दू व्यक्ति स्वयं को गैर हिन्दू कहता है तो उसका अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति का स्थान इस कानून से प्रभावित नहीं होगा। यदि कोई अन्य कानून उसकी इस सामाजिक स्थिति को प्रभावित कर रहा हो, केवल तभी यह प्रभावित हो सकता है।
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4.3 [ अध्यक्ष अथवा अध्यक्ष द्वारा नियुक्त अधिकारी ]
यदि कोई व्यक्ति धर्म परिवर्तन कर मुस्लिम या क्रिश्चियन बन जाता है तो अध्यक्ष उसका नाम मतदाता सूची से 1 वर्ष के बाद हमेशा के लिए हटा देगा, यदि वह इस समय के अंदर फिर से धर्म परिवर्तन कर के हिन्दू नहीं बनता। उस 1 वर्ष के समय में वह मतदान नहीं कर सकता। फिर से हिंदू बनने के बाद व्यक्ति दोबारा अपना नाम इस मतदाता सूची में डलवाने की अर्जी दे सकता है | साथ हीं यदि वह दोबारा धर्म परिवर्तन करता है तो ऐसी स्थिति में उसका नाम मतदाता सूची से बिना 1 वर्ष बीतने की प्रतीक्षा किये हमेशा के लिए हटा दिया जायेगा। किसी प्रकार के विवाद की स्थिति में जूरी का निर्णय ही अंतिम होगा।
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4.4 [ अध्यक्ष ]
यदि कोई क्रिश्चियन या मुस्लिम व्यक्ति धर्म परिवर्तन कर हिन्दू बनना चाहता है तो जूरी द्वारा उसकी पहचान की पुष्टि तथा अनुमोदन के बाद तथा सभी ट्रस्टियों के अनुमोदन के बाद अध्यक्ष उसका नाम मतदाता सूची में शामिल करेगा।
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खण्ड - 5 : दान, आय तथा टैक्स
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5.1 ट्रस्ट किसी व्यक्ति अथवा अवैयक्तिक संस्था अथवा विदेशी व्यक्ति या संस्था से दान प्राप्त कर सकता है। साथ ही ट्रस्ट किसी भी व्यावसायिक गतिविधि में भी किसी भी कॉर्पोरेशन की तरह हीं भाग ले सकता है।
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5.2 [ प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री ]
प्रधान मंत्री तथा मुख्यमंत्री आय कर, संपत्ति कर तथा अन्य कर जो ट्रस्ट पर लागू हो रहे हैं, उनसे ले सकते हैं।
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5.3 [ सभी ]
दान पर टैक्स : चंदे की रकम पर लगने वाला टैक्स अधिकतम टैक्स की दर में से दानकर्ता द्वारा पिछले वर्ष चुकाया गया अधिकतम टैक्स की दर को घटाने पर प्राप्त दर के अनुसार होगा। नकद दान तथा विदेशी दान पर टैक्स अधिकतम दर से लगाया जायेगा।
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(स्पष्टीकरण - ये एक प्रकार से टैक्स देने वाले व्यक्तियों के लिए टैक्स की छूट है ताकि लोगों को टैक्स चुकाने की प्रेरणा मिले | उदहारण - यदि अधिकतम टैक्स की दर 30% है और भारतीय दानकर्ता ने चेक से पिछले वर्ष 20% अपनी आय पर टैक्स दिया था, तो उसे दिए गए दान पर 10% टैक्स लगेगा)
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5.4 [ सभी ]
करों में छूट : नागरिकों द्वारा दी गयी छूट की यूनिटों को प्रति यूनिट वित्त मंत्री द्वारा निर्णय की गयी रकम में गुना करने पर जो रकम प्राप्त होगी, ट्रस्ट को टैक्स में उतनी हीं छूट मिलेगी । नागरिक ट्रस्ट को कर-राहत यूनिट तलाटी के कार्यालय में स्वयं उपस्थित होकर अथवा एस.एम.एस या ए.टी.एम द्वारा दे सकता है, तथा यह वित्त मंत्री द्वारा निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार होगा।
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खण्ड - 6. जनता की आवाज
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6.1 [जिला कलेक्टर]
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यदि कोई नागरिक इस कानून में परिवर्तन चाहता हो तो वह जिला कलेक्टर के कार्यालय में जाकर एक शपथपत्र प्रस्तुत कर सकता है और जिला कलेक्टर या उसका क्लर्क इस ऐफिडेविट को नागरिक के वोटर आई.डी. नंबर के साथ 20 रूपए प्रति पृष्ठ की दर से फ़ीस लेकर प्रधानमंत्री की वेबसाईट पर स्कैन करके डाल देगा ताकि कोई भी व्यक्ति उस एफिडेविट को बिना लॉग-इन देख सके।
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6.2. [ तलाटी/पटवारी/लेखपाल ]
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यदि कोई नागरिक इस कानून अथवा इसकी किसी धारा पर अपनी आपत्ति दर्ज कराना चाहता हो अथवा ऊपर के खण्ड में प्रस्तुत किसी भी शपथपत्र पर हां/नहीं दर्ज कराना चाहता हो तो वह अपना मतदाता पहचान पत्र के साथ तलाटी के कार्यालय में जाकर 3 रूपए का शुल्क जमा कराएगा। तलाटी नागरिक की हां/नहीं दर्ज कर लेगा और उसे इसकी रसीद देगा। इस हां/नहीं को प्रधानमंत्री की वेबसाईट पर नागरिक के वोटर आई.डी. नंबर के साथ डाल दिया जाएगा।
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=======ड्राफ्ट की समाप्ति=========
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सैक्शन G. राज्य हिन्दू देवालय प्रबंधक ट्रस्ट (RHDPT) :
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ये अधिनियम तब लागू होगा जब मुख्यमंत्री इस ड्राफ्ट को राजपत्र में छापेंगे। यदि मुख्यमंत्री इसे छापने से मना करते हैं तो प्रधानमंत्री राष्ट्रपति शासन की घोषणा कर सकते हैं तथा फिर राज्यपाल के माध्यम से इस अधिनियम को राजपत्र में छपवा सकते हैं।
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यह ड्राफ्ट राष्ट्र हिंदू देवालय प्रबंधक ट्रस्ट (NHDPT) की तरह हीं है, अंतर सिर्फ इतना है कि इसके अंतर्गत सदस्य वैसे हिन्दू होंगे जो सम्बंधित राज्य की सीमा के अंदर 6 माह से अधिक से निवास कर रहे हों अथवा मूल रूप से उस राज्य के निवासी हों। अर्थात प्रत्येक हिन्दू व्यक्ति के पास चयन का विकल्प होगा कि वह दोनों में से किस 'राज्य हिंदू देवालय प्रबंधक ट्रस्ट' (RHDPT) का सदस्य बनना चाहता है। लेकिन एक व्यक्ति एक ही समय में दो राज्यों के 'राज्य हिंदू देवालय प्रबंधक ट्रस्ट' (RHDPT) का सदस्य नहीं हो सकता। तथा यदि वह सदस्यता बदलता है तो नयी सदस्यता 6 माह के बाद हीं चालू होगी।
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इस ट्रस्ट के अंदर वे मंदिर आयेंगे जो उस राज्य सरकार के पास हैं या वे ट्रस्ट जो उस राज्य के 'राज्य हिंदू देवालय प्रबंधक ट्रस्ट' के अधीन आना चाहते हैं |
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[स्वदेशी हथियारो के निर्माण को प्रोत्साहित करने के लिए] (30-Apr-2016) No.1

April 30, 2016 No.1


स्व[देशी हथियारो के निर्माण को प्रोत्साहित करने के लिए]

भारत के सभी नागरिकों, 

यह स्तम्भ भारत में स्वदेशी हथियारों के उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए आवश्यक प्रस्तावित प्रक्रिया का विवरण प्रस्तुत करता है। 

यदि आप इस कानूनी ड्राफ्ट का समर्थन करते है तो अपने सांसद को एसएमएस द्वारा इस पोस्ट का लिंक भेजें। तथा इस कानूनी ड्राफ्ट की जानकारी देश के नागरिको तक पहुंचाने के लिए इसे लाइक करें, शेयर करें, समाचार पत्रो में विज्ञापन दें, इस मुद्दे पर चुनाव लड़ें तथा इस पोस्ट के पहले कमेंट में सुझायी गयी अन्य गतिविधियों में भाग लें। यदि आप इस पोस्ट के पहले तथा दूसरे कमेंट को नहीं देख पा रहे है तो, इस पेज के विवरण खंड (डिस्क्रिप्शन कॉलम) को देखें। वहाँ इस पेज के सभी पोस्ट्स तथा शेष पांच कमेंट्स के लिंक की सूची दी गयी है। 

यदि करोड़ो नागरिक अपने सांसदो को अपने मोबाईल फोन से एसएमएस द्वारा आदेश भेजते है तो देश की वर्तमान व्यवस्था में क्या परिवर्तन आयेंगे ? इस प्रश्न तथा ऐसे ही अक्सर पूछे जाने वाले अन्य प्रश्नो के जवाब इस पोस्ट के दूसरे कमेंट में देखें जा सकते है। अन्य सम्बंधित जानकारी के लिए इस समुदाय का विवरण खंड देखें। 

टिप्पणी -- इस क़ानून ड्राफ्ट की विश्वसनीयता बनाएं रखने के लिए, इस पोस्ट को एक बार लिखे जाने के बाद संपादित नही किया गया है। वर्तनी या व्याकरण आदि की अशुद्धियों के सम्बन्ध में कृपया इस पोस्ट का छठा कमेंट देखें। 
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सांसद को भेजे जाने वाले SMS का प्रारूप -- 
"Hon MP, I order you to --https://web.facebook.com/ProposedLawsHindi/posts/548862728625259, voter ID : ####"
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माननीय सांसद,
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यदि आपको इस पोस्ट का लिंक एसएमएस द्वारा प्राप्त होता है तो, ऐसा एसएमएस आपके लिए मतदाता द्वारा भेजा गया आदेश है। इस पोस्ट के लेखक का भेजे गए ऐसे आदेश या एसएमएस से कोई लेना देना नहीं है। आपको भेजा गया ऐसा आदेश इस कानूनी ड्राफ्ट को भारत के राजपत्र में प्रकाशित करने के लिए दिया गया है।
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(टिप्पणी -- इस कानूनी ड्राफ्ट के मूल अंग्रेजी संस्करण का लिंक इसी पोस्ट के दसवें कमेंट में दर्ज किया गया है।)
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भारत में स्वदेशी हथियारों के उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए प्रस्तावित क़ानून ड्राफ्ट
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======= ड्राफ्ट का प्रारम्भ=======
1. यह क़ानून सिर्फ 'सम्पूर्ण रूप से भारतीय नागरिको के स्वामित्व वाली कम्पनियों' (WOIC) पर लागू होगा ।
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2. शब्द 'रक्षा मंत्री' से आशय भारत सरकार के रक्षा मंत्री से या इस प्रकृति के कार्य को करने के लिए उनके द्वारा नियुक्त अधिकारी से है।
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3. [रक्षा मंत्री के लिए निर्देश]
रक्षा मंत्री या उसके द्वारा इस कार्य के लिए नियुक्त अधिकारी निम्नलिखित हथियारों की परिभाषाएं प्रकाशित करेगा -
(A) छोटी बंदूके।
(B) मध्यम आकार की बंदूके।
(C) बड़ी बंदूके।
(D) होवित्ज़र तथा होवित्ज़र किस्म के अन्य प्रकार।
(E) टेंक तथा टेंक के अन्य प्रकार।
(F) कारतूस, गोले तथा कारतूस व गोलों के अन्य प्रकार।
(G) प्रक्षेपास्त्र तथा प्रक्षेपास्त्र के अन्य प्रकार।
(H) लड़ाकू विमान तथा लड़ाकू विमानो के अन्य प्रकार।
(I) सेना द्वारा उपयोग किये जाने वाले अन्य उपकरण तथा उनके प्रकार।
(J) आणविक हथियार एवं उनके प्रकार।
(K) रासायनिक हथियार एवं उनके प्रकार।
(L) जैविक हथियार एवं उनके प्रकार।
(M) अन्य श्रेणी के हथियार एवं उनके प्रकार ।
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4. [रक्षा मंत्री के लिए निर्देश]
रक्षा मंत्री हथियारों की निम्नलिखित तीन श्रेणियां निर्धारित करके प्रकाशित करेंगे -
(A) श्रेणी प्रथम : हथियार जिनके लिए पंजीकरण करवाना आवश्यक नहीं है ।
(B) श्रेणी द्वितीय : ऐसे हथियार जिनके लिए पंजीकरण आवश्यक हो किन्तु लाइसेंस नहीं ।
(C) श्रेणी तृतीय : ऐसे हथियार जिनके लिए लाइसेंस आवश्यक हो।
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5. [रक्षा मंत्री के लिए निर्देश]
रक्षा मंत्री निम्नलिखित हथियारों को 'श्रेणी द्वितीय' = 'पंजीकरण आवश्यक परंतु लाइसेंस जरूरी नहीं' सूची के अंतर्गत रखेंगे :
(A) छोटी बंदूके
(B) मध्यम आकार की बंदूके
(C) बड़ी बंदूके
(D) अनुमति मिले होवित्ज़र एवं उनके प्रकार ।
(E) अनुमति मिले टेंक एवं उनके प्रकार ।
(F) अनुमति मिले प्रक्षेपास्त्र एवं उनके प्रकार ।
(G) अनुमति मिले कारतूस, गोले एवं उनके प्रकार ।
(H) अनुमति मिले लड़ाकू विमान एवं उनके प्रकार ।
(I) सेना द्वारा स्वीकृत और उपयोग में लाये जाने वाले अन्य श्रेणी के हथियार एवं उनके प्रकार ।
भारत सरकार इंसास राइफल, 303, 202, .22 रिवोल्वर और भारतीय पुलिस द्वारा प्रयोग की जाने वाली सभी बंदूकें, जो "इंसास से कम" के स्तर की है, उनके डिजाईन सार्वजनिक करेगी। कोई भी नागरिक इस डिजाईन से, बिना किसी लाइसंस के, केवल पंजीकरण करवाकर, बंदूक या बन्दुक के पुर्जे या बंदूक की गोलियाँ बनाने की फैक्ट्री शुरू कर सकता है। कोई भी नागरिक गोली-रोक (बुलेट-प्रूफ) जैकेट भी बना सकता है।
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6. [रक्षा मंत्री के लिए निर्देश]
रक्षा मंत्री निम्नलिखित हथियारों को 'श्रेणी तृतीय' = 'लाइसेंस जरूरी' की सूची के अंतर्गत रखेंगे :
(A) आणविक हथियार एवं उनके प्रकार ।
(B) जैविक हथियार एवं उनके प्रकार ।
(C) रासायनिक हथियार एवं उनके प्रकार ।
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7. [रक्षा मंत्री के लिए निर्देश]
रक्षा मंत्री उन हथियारों की एक सूची जारी करेंगे जिनके लिए पंजीकरण या लाइसेंस की आवश्यकता न हो।
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8. [रक्षा मंत्री के लिए निर्देश]
जिन हथियारों के लिए सिर्फ पंजीकरण अनिवार्य है, ऐसे हथियारों के उत्पादन के लिए रक्षा मंत्री 'भारतीय नागरिकों के सम्पूर्ण स्वामित्व वाली कम्पनियों (WOIC)' के लिए आवश्यक निर्देश जारी करेंगे। रक्षा मंत्री सुनिश्चित करेंगे कि इन कम्पनियों द्वारा कौनसी जानकारीयां सार्वजनिक की जायेगी तथा कौनसी जानकारियाँ रक्षा मंत्रालय के पास गुप्त रहेंगीं। रक्षा मंत्री यह भी निर्देशित करेंगे कि कौनसी जानकारियाँ इन कम्पनियों को प्रकाशित करनी होंगी तथा कौनसी जानकारियाँ कम्पनियां स्वयं के पास गुप्त रख सकेंगी।
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9. [सभी के लिए]
जो कम्पनियां भारतीय नागरिकों के पूर्ण स्वामित्व वाली नहीं है, ऐसी कम्पनियों को तीनों श्रेणियों तथा अन्य किसी भी श्रेणी के हथियारों के उत्पादन हेतु पंजीकरण तथा लाइसेंस लेना अनिवार्य होगा।
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10. [रक्षा मंत्री के लिए निर्देश]
ऐसी कम्पनियाँ जो भारतीय नागरिकों के पूर्ण स्वामित्व वाली नहीं हैं, उनके द्वारा हथियार उत्पादन को नियंत्रण करने के लिए रक्षा मंत्री आवश्यक गैजेट अधिसूचना प्रकाशित करवाएंगे।
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11. [रक्षा मंत्री के लिए निर्देश]
हथियार उत्पादन कर रही सभी प्रकार की कम्पनियों पर पंजीकरण और लाइसेंस दिशा-निदेशों को लागू करवाने के लिए रक्षा मंत्री अफसरों को नियुक्त करेंगे।
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12. [सभी के लिए]
हथियारों का उत्पादन कर रही कंपनियों के बीच कोई विवाद हो या कोई नागरिक या सरकारी अफसर को ये लगता है कि किसी फैक्ट्री का मालिक किसी कानून को तोड़ रहा है, तो कोर्ट मामले का निपटारा जज द्वारा नहीं, बल्कि जिले के मतदाताओं की जूरी द्वारा होगा। ज्यूरी सदस्यों का चयन जिले की वोटर लिस्ट में से 30 और 55 के आयुवर्ग में से किया जाएगा। मामले की अपील राज्य जूरी और राष्ट्रिय जूरी में की जा सकती है।
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13. [जिला कलेक्टर]
यदि कोई नागरिक मतदाता इस कानून में किसी परिवर्तन का प्रस्ताव करता है तो वह नागरिक जिला कलेक्टर अथवा उसके क्लर्क से परिवर्तन की मांग करते हुए एक एफिडेविट जमा करवा सकता है। जिला कलेक्टर अथवा उसका क्लर्क 20 रूपए प्रति पृष्ठ का शुल्क लेकर इस एफिडेविट को नागरिक के वोटर आई.डी. नंबर के साथ प्रधानमंत्री की वेबसाइट पर स्कैन करके डाल देगा ताकि कोई भी उस एफिडेविट को बिना लॉग-इन के पढ़ सके।
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14. [तलाटी अर्थात पटवारी अथवा लेखपाल]
यदि कोई नागरिक इस कानून या इस कानून की किसी धारा पर अपना विरोध दर्ज कराना चाहता है, अथवा उपरोक्त धारा के अनुसार दिए गए ऐफिडेविट पर अपना समर्थन अथवा विरोध दर्ज कराना चाहता है तो वह पटवारी के कार्यालय में 3 रूपए का शुल्क जमा करके अपना हां/नहीं दर्ज करवा सकता है। पटवारी हां/नहीं को दर्ज करेगा और नागरिकों के हां/नहीं को प्रधानमंत्री की वेबसाइट पर डाल देगा।
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====== ड्राफ्ट की समाप्ति======

Friday, April 29, 2016

Why Bajirao-I and later Kings did NOT work to free Goa from Portugese, even though Portugese were torturing Hindus and forcing them to convert? [BajiRao1] (28-Apr-2016) No.1

April 28, 2016 No.1

https://www.facebook.com/mehtarahulc/posts/10153451321176922

Why Bajirao-I and later Kings did NOT work to free Goa from Portugese, even though Portugese were torturing Hindus and forcing them to convert? [BajiRao1] 
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And other hard questions in Indian history are at ---https://www.facebook.com/notes/10151452669961922

SUPERB !!!! We at Right to Recall Group propose narcotest of Surpankha Gandhi in public in case of Westland Helicopter deal (27-Apr-2016) No.1

April 27, 2016 No.1

https://www.facebook.com/mehtarahulc/posts/10153449799981922

SUPERB !!!! We at Right to Recall Group propose narcotest of Surpankha Gandhi in public in case of Westland Helicopter deal. Where as NaMo / ArKe / BJP / AAP / BJP etc are a;; opposing such narcotest in public !!! WHY?

आगस्टा वेस्टलैंड स्केंडल और उसका समाधान
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वीआईपी हेलीकॉप्टर आगस्टा वेस्टलैंड की खरीद के मामले में चल रहे मुकदमे में इटली की हाई कोर्ट ने यह फैसला दिया है कि इन हेलीकॉप्टरो की खरीद में घूस का लेनदेन हुआ, और भारत के नेताओ और अधिकारियों को भारी मात्रा में रिश्वत दी गयी। पेड मिडिया द्वारा प्रकाशित खबर के अनुसार अदालत ने अपने फैसले में लिखा कि 'भारत में अन्य अधिकारियों और नेताओ के अलावा अहमद पटेल, ऑस्कर फर्नांडिस, मनमोहन सिंह और कोई 'सिंग्नोरा गांधी'(*) नामधारी शख्श की इसमें भूमिका थी'।
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(*) इटालियन भाषा में सिंग्नोरा का मतलब मिसेज होता है। अत: यहां सिंग्नोरा गांधी से आशय मिसेज गांधी है।
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खबर का लिंक यहां देखें -- https://www.pgurus.com/italian-court-judgment-exposing-son…/
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मेरे हिसाब से यूपीए के 10 साला कार्यकाल में किये गए सभी घोटालो में सोनिया घांडी शामिल थी और उन्होंने आगस्टा डील में भी निश्चित रूप से पैसा खाया होगा। श्री मनमोहन सिंह जी के बारे में भी मोदी साहेब की तरह यह भ्रम फैलाया गया है कि वे ईमानदार है, और कभी घूस नहीं खाते। पर सच्चाई यह है कि मनमोहन का भी सभी घोटालो में नियमित हिस्सा होता था।
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सोडियम पेंटानोल नामक रसायन की यह विशेषता है कि इसका इंजेक्शन दिए जाने से व्यक्ति नीम बेहोशी में चला जाता है, और सोच समझकर झूठ बोलने की उसकी क्षमता समाप्त हो जाती है। इस रसायन का इंजेक्शन लगाकर आरोपी व्यक्ति से पूछताछ की जाती है, और व्यक्ति सभी सवालों के सच्चे जवाब देने लगता है। पूछताछ की इस प्रक्रिया को नार्को टेस्ट कहते है। नार्को टेस्ट लाई डिक्टेटर या पॉलीग्राफ टेस्ट से बिलकुल भिन्न है। लाई डिक्टेटर और पॉलीग्राफ में आरोपी को कोई दवा नहीं दी जाती, केवल सवाल पूछते समय शरीर का तापमान और धड़कन आदि मापने के लिए कुछ सेंसर लगाए जाते है। पॉलीग्राफ और लाइ डिक्टेटर से सिर्फ यह पता चलता है की आरोपी झूठ बोल रहा है, लेकिन सच्चाई मालूम नहीं होती, जबकि नार्को टेस्ट में आरोपी सच बोलने लगता है।
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नार्को टेस्ट के दौरान आरोपी द्वारा दिए गए बयानों को अदालती कार्यवाही में सबूत की तरह नहीं माना जाता, लेकिन इस पूछताछ के दौरान आरोपी अपने खिलाफ कई महत्त्वपूर्ण जानकारियां उगल देता है, जिनका पीछा करके सबूत बरामद करके न्यायालय में पेश किये जा सकते है। इसे एक उदाहरण से समझते है कि नार्को टेस्ट कैसे सबूत जुटाने में सहायता करता है।
प्रश्नों के नमूने :
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पहली स्थिति (सामान्य पूछताछ के दौरान)
सवाल - क्या आपने आगस्टा हेलीकॉप्टर के सौदे में रिश्वत खायी ?
सोनिया घांडी - नहीं खायी, नहीं खायी, नहीं खायी।
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दूसरी स्थिति (इंजेक्शन लगने के बाद)
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सवाल - आगस्टा हेलीकॉप्टर के लेनदेन में आपको कितना रूपया मिला ?
सोनिया - 10 करोड़ डॉलर
सवाल - पर राहुल तो कह रहा है कि 1000 करोड़ मिला था।
राहुल - उसे कुछ याद नहीं रहता। वो पैसा तो कोयले से आया था।
सवाल - पैसा आपने कैसे लिया ?
सोनिया - खाते में
सवाल - कौनसा खाता ? एसबीआई का ?
सोनिया - नहीं स्विस बैंक का ?
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सवाल - खाता नंबर बोलो
सोनिया - याद नहीं है।
सवाल - कहाँ लिखा हुआ है ?
सोनिया - मेरे मोबाइल में सेव है। बैडरूम में अंदर वाली अलमारी के लॉकर में जो फाइलें पड़ी है उसमें भी लिखा हुआ है।
सवाल - आपकी तरफ से ये सारी बातचीत किसने की ?
सोनिया - ये सब काम जमाई सा ही देखते है।
सवाल - मनमोहन सिंह जी कह रहे थे कि उनका पैसा भी आपने खा लिया।
सोनिया - झूठ है। उनको कोयले से बहुत पैसा मिला था। इसमें भी मिला है।
सवाल - और किसे किसे मिला ?
सोनिया - स्वामी, कपिल, ऑस्कर, वोरा और भी बहुत को मिला। पूरा हिसाब अहमद के पास है।
सवाल - स्वामी कौन ? सुब्रह्मण्यम स्वामी ?
सोनिया - हाँ
सवाल - उन्हें क्यों दिया ?
सोनिया - उन्होंने 2G में हंगामा मचाकर दूरसंचार मंत्रालय DMK के हाथ से निकालकर कांग्रेस को दिलवा दिया था। फिर हमने उससे बहुत पैसा बनाया। अपने ही आदमी है।
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तो इस प्रकार की जानकारी के बाद सोनिया की निशानदेही पर स्विस बैंक के खाता नंबर तक पहुंचा जा सकता है। और यदि उसमे रूपये पाये जाते है तो यह तय हो गया कि इस घोटाले में जमाई सा, मनमोहन और अहमद भी संदिग्ध है। अत: अगले चरण में इंजेक्शन अहमद और जमाई सा के लगाया जाएगा। इससे वे भी अपने खिलाफ और अन्य के खिलाफ सबूत उगलेंगे। और इस तरह से एक चेन रिएक्शन की तरह सभी आरोपी धर लिए जाएंगे।
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तो हमारे विचार में 10 साल के कार्यकाल में किये गए घोटालो का खुलासा करने, घूस में खायी गयी धनराशि को फिर से जब्त करने और घोटालेबाजो को जेल में पहुंचाने के लिए सोनिया घांडी का नागरिकों की ज्यूरी द्वारा नार्को टेस्ट लिया जाना चाहिए। यह निहायत ही जरूरी है कि ऐसा नार्को टेस्ट नागरिकों की ज्यूरी द्वारा किया जाए वरना जज पैसा खाकर मामला रफा दफा कर देगा। और यह टेस्ट सार्वजनिक रूप से लिया जाना चाहिए। ताकि जनता यह देख सके कि क्या सवाल जवाब किये जा रहे है। यदि सोनिया जी ईमानदार है तो छूट जायेगी और घोटालेबाज है तो पकड़ी जायेगी।
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हमारा प्रस्ताव है कि देश की मतदाताओं सूचियों में से 1500 नागरिकों का रेंडमली चयन किया जाए और यह ज्यूरी इस मुकदमे की सुनवाई करे। यदि दो तिहाई ज्यूरी सदस्य सोनिया घांडी का सार्वजनिक नार्को टेस्ट करने पर सहमति देते है तो नार्को टेस्ट लिया जाना चाहिए। मुकदमे की सुनवाई रोजाना की जानी चाहिए ताकि मामला महीने दो महीने में फैसल हो सके।
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समस्या ?
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समस्या यह है कि मोदी साहेब सोनिया घांडी के सार्वजनिक नार्को टेस्ट का विरोध कर रहे है ! आज यह मामला सामने आने के बाद उन्होंने सोनिया का सार्वजनिक नार्को टेस्ट लेने से साफ़ इंकार कर दिया है !! वे इस मामले की सुनवाई नागरिकों की ज्यूरी द्वारा किये जाने का भी विरोध कर रहे है !! उनका कहना है कि न तो सोनिया का और न ही अन्य कॉंग्रेसी आरोपियों का कोई नार्को टेस्ट लिया जाएगा। वे इस मामले की रोजाना सुनवाई के भी खिलाफ है। उन्होंने कहा है कि मामले की जांच जैसे चल रही है वैसे ही चलेगी और इस बारे में जज ही फैसला करेंगे, और हम इस मामले को जनता में यूपी के चुनाव में जोर शोर से उठाएंगे !!!!
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श्री मोहन भागवत और अरविन्द केजरीवाल ने भी सोनिया के नार्को टेस्ट लिए जाने का विरोध करना शुरू कर दिया है, और वे भी इस मामले में मोदी साहेब से सहमत है ! सुब्रह्मण्यम स्वामी को भय है कि सोनिया का नार्को टेस्ट लेने से सोनिया पकड़ी जा सकती है, और वे भी इस मामले में घसीटे जा सकते है, अत: वे भी सोनिया के सार्वजनिक नार्को टेस्ट और नागरिकों की ज्यूरी द्वारा रोजाना सुनवाई का विरोध कर रहे है !!
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चूंकि जिस तरह भीष्म पितामह हस्तिनापुर की गद्दी से बंधे होने के कारण धृतराष्ट्र का समर्थन करने के लिए बाध्य थे उसी तरह मोदी साहेब के प्रति निष्ठा की शपथ ले लेने के कारण मोदी साहेब के सभी अंध भगत भी सोनिया का सार्वजनिक नार्को टेस्ट न लिए जाने के मोदी साहेब के फैसले का समर्थन करने पर विवश है !! सुब्रह्मणियम स्वामी के सभी अंध भगत भी सोनिया के नार्को टेस्ट लिए जाने का विरोध कर रहे है !! संघ के अंध सेवको का कहना है कि हम संघ के अनुशासित सिपाही है अत: हम परम पूज्य मोहन भागवत के फैसले के साथ है !! संघ के ज्यादातर संघ सेवक सोनिया का नार्को टेस्ट लिए जाने का समर्थन करते है लेकिन अनुशासन से बंधे होने के कारण इसका विरोध कर रहे है !!
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समाधान ?
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जो कार्यकर्ता सोनिया घांडी के सार्वजनिक नार्को टेस्ट के क़ानून का समर्थन करते है, उन्हें अपने सांसद को एसएमएस द्वारा आदेश भेजने चाहिए कि नार्को टेस्ट के क़ानून को गैजेट में प्रकाशित किया जाए।
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पब्लिक में नार्कोटेस्ट - बलात्कार , हत्या , भ्रष्टाचार , गौ हत्या आदि के लिए नारको टेस्ट का कानूनी ड्राफ्ट :
www.facebook.com/pawan.jury/posts/812341812217390
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जिन पाठको को यह शुबहा है कि मोदी साहेब सोनिया के सार्वजनिक नार्को टेस्ट का विरोध नहीं कर रहे है, वे कृपया ट्विटर पर उनसे पूछे कि, "क्या वे सोनिया के नार्को टेस्ट का समर्थन करते है" ? और मोदी साहेब जो भी जवाब देते है उसे यहाँ रखें। भागवत, स्वामी आदि के समर्थक भी उनसे यह प्रश्न करें और जवाब यहां रखे। यदि आपके पास अपने नेता से प्रश्न पूछने और आपके नेता के पास जवाब देने का समय नहीं है तो इस सम्बन्ध में कमेंट करके मेरा और आपका समय नष्ट न करें।

क्यों मोदी साहेब समेत विहिप, बीजेपी और संघ के नेताओ ने उन स्थानीय महिलाओं को लामबंद होने के लिए प्रेरित करने से इंकार कर दिया जो शनि मंदिर में स्त्रियों के प्रवेश के खिलाफ थी ? (26-Apr-2016) No.1

April 26, 2016 No.1

https://www.facebook.com/mehtarahulc/posts/10153448359116922

क्यों मोदी साहेब समेत विहिप, बीजेपी और संघ के नेताओ ने उन स्थानीय महिलाओं को लामबंद होने के लिए प्रेरित करने से इंकार कर दिया जो शनि मंदिर में स्त्रियों के प्रवेश के खिलाफ थी ?
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प्रचार की भूखी कुछ महिला 'कार्यकर्ताओ' ने मिशनरीज़ के इशारे पर शनि मंदिर में महिलाओ के प्रवेश को निषिद्ध किये जाने वाले नियम का विरोध करना शुरू किया, और मामले को तूल देने के लिए मिशनरीज ने पेड मिडिया को इस मामले को उठाने का निर्देश दिया। साथ ही मिशनरीज ने जजों को भी भुगतान किया ताकि वे महिलाओ के शनि मंदिर में प्रवेश का समर्थन करें। लेकिन ज्यादातर स्थानीय महिलाएं और देश भर की हिन्दू महिलाएं शनि मंदिर में महिलाओ के प्रवेश के विरोध में थी। 

समाधान के लिए मेरा प्रस्ताव है कि इस मुद्दे पर हिन्दू 'महिलाओं' का जनमत संग्रह लिया जाए या अमुक जिले की मतदाता सूचियों से 25 से 55 वर्ष की महिलाओं का रेंडमली चयन करके 100-200 महिला सदस्यों की ज्यूरी बुलाई जाए और यह ज्यूरी इस मामले पर अपना फैसला दें। इन दोनों में किसी भी प्रक्रिया का पालन करने से जो नतीजा आए उसे ही लागू किया जाना चाहिए। यह तय है कि यदि महिलाओं को इस बारे में फैसला करने का अधिकार दिया गया तो महिलाएं बहुमत से यही निर्णय देंगी कि 'धार्मिक परम्पराओ' का पालन किया जाना चाहिए। 

यदि स्थानीय महिलाएं स्त्रियों के शनि मंदिर में प्रवेश के खिलाफ एकजुट हो जाती तो ये समूह अदालत में भी एक पक्षकार के तौर पर अपना रूख प्रस्तुत कर सकता था। ऐसी स्थिति में यह पूरा मामला 'महिलाओ के साथ भेदभाव' की दिशा से हट जाता, और बहस का विषय 'धार्मिक परम्पराओ' पर केंद्रित हो जाता। 

ठीक यही योजना मुस्लिम महिलाओ ने बनायी। जब इन महिला 'कार्यकर्ताओ' ने हाजी अली दरगाह में प्रवेश करने की घोषणा की तो मुस्लिम महिलाओं ने कहा कि हम उन्हें दरगाह में प्रवेश करने से रोकेंगे !! और इससे महिलाओं के साथ भेदभाव के मुद्दे की हवा निकल गयी !!!

लेकिन मोदी साहेब और श्री मोहन भागवत समेत बीजेपी, विहिप और संघ के नेताओ ने इस मुद्दे पर स्थानीय महिलाओ को एकजुट करने से इंकार कर दिया। और इसीलिए मिशनरीज के टुकड़ो पर आश्रित भू माता ब्रिगेड जैसे पेड कार्यकर्ता, पेड अर्नब पेड गोस्वामी जैसे पेड मिडियाकर्मी और पेड न्यायधीशो की टोली की विजय हुयी। 

दूसरे शब्दों में, हम इसीलिए नहीं हार रहे है क्योंकि मिशनरीज द्वारा पोषित पेड मिडिया, पेड एक्टिविस्ट और पेड जज अच्छे तरीके से लड़ रहे है, बल्कि हम इसीलिए हार रहे है क्योंकि धर्म की इजारेदारी करके धर्म की रक्षा को समर्पित कार्यकर्ताओ को खींचने वाले समूहो बीजेपी, संघ और विहिप के शीर्ष नेता सक्रियता दिखाने के वक्त पर "जानबूझकर" निष्क्रिय बने रहते है या मैदान से हट जाते है। 

जानबूझकर इस प्रकार की 'निष्क्रिय हो जाओ' की नीति का पालन करने का कारण यह है कि बीजेपी नेतृत्व वोटो और सत्ता के लिए पेड मिडिया पर बुरी तरह से निर्भर है। इसी तरह से बीजेपी नेता बेरोजगारी कम करने के लिए भी एफडीआई पर टिके हुए है और विदेशी निवेश लाने वाले धनिक चाहते है कि बीजेपी मिशनरीज के एजेंडे को बढ़ाने पर भी कार्य करें। संघ/विहिप अपने सैंकड़ो संगठनों को चलाने के लिए आवश्यक चन्दो के लिए बीजेपी पर निर्भर है। बीजेपी के नेता हिन्दू धर्म को तोड़ने के लिए मिशनरीज द्वारा चलाये जा रहे सभी अभियानों के पक्ष में 'निष्क्रिय हो जाओ' की नीति का अनुसरण करते है, और बीजेपी पर निर्भर होने के कारण संघ-विहिप बीजेपी के नेताओ का समर्थन करते है।

समाधान ?

मेरे विचार में हिंदुवादियो को इस बात को समझना चाहिए कि कई कारणों और मजबूरियों के चलते बीजेपी नेता मिशनरीज के सामने पूरी तरह से समर्पण कर चुके है, और कुशल इसी में है कि अब इनका त्याग कर दिया जाए। ज्यादातर बीजेपी नेता सुबह से देर रात तक सोना और जमीनों में अपना काला धन निवेश करने में व्यस्त रहते है, और शेष समय में टीवी स्टूडियो में बैठकर बयानबाजी करते है। जहां तक मोदी साहेब की बात है, उन्हें 2019 में फिर से पीएम बनने की चिंता ने जकड़ रखा है, और सत्ता में वापसी करने का उन्हें एक ही रास्ता नजर आता है -- एफडीआई एफडीआई एफडीआई !! संघ-विहिप की सबसे बड़ी समस्या उस धनराशि को जुटाना है जिसकी आवश्यकता उन्हें अपने सैंकड़ो संगठनों को चलाने में पड़ती है। स्वार्थ के दलदल में गहरे धंसे हुए ऐसे नेता उन मिशनरीज समूहों से मुकाबला करने में बिलकुल भी सक्षम नहीं है, जिन्हें बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का समर्थन हासिल हो। 

समाधान के लिए हमें उन कानूनों को गैजेट में प्रकाशित करने का प्रयास करना चाहिए जिससे हिन्दू धर्म के प्रशासन को मजबूत बनाया जा सके। कौनसे क़ानून ड्राफ्ट्स ? प्रस्तावित क़ानून ड्राफ्ट्स निम्नलिखित लिंक्स पर देखे जा सकते है :

1. मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त करने के लिये प्रस्तावित क़ानून ड्राफ्ट --- see English PDF athttps://www.facebook.com/groups/righttorecallparty/10152190088748103/ और हिंदी पीडीएफ के लिए यहाँ देखें --https://www.facebook.com/groups/righttorecallparty/10152606376338103/ )
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2. ज्यूरी सिस्टम 
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3. राईट टू रिकॉल जज 
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अत: मेरा आग्रह है कि हिंदूवादी कार्यकर्ताओ को बीजेपी-संघ-विहिप का अनुसरण करने की जगह उपरोक्त क़ानून ड्राफ्ट्स को देश में लागू करवाने के लिए प्रयास करने चाहिए।

कैसे ज्वेलरी पर मोदी साहेब द्वारा लागू किया गया 1% उत्पाद शुल्क छोटे जौहरियों के निर्यात अवसरों को घटा कर निर्यात व्यापार को विशेष आर्थिक जोन (सेज) धारकों के हाथो में पहुँचा कर उन्हें गैर वाजिब लाभ पहुंचाएगा। (25-Apr-2016) No.7

April 25, 2016 No.7

https://www.facebook.com/mehtarahulc/posts/10153446661841922

कैसे ज्वेलरी पर मोदी साहेब द्वारा लागू किया गया 1% उत्पाद शुल्क छोटे जौहरियों के निर्यात अवसरों को घटा कर निर्यात व्यापार को विशेष आर्थिक जोन (सेज) धारकों के हाथो में पहुँचा कर उन्हें गैर वाजिब लाभ पहुंचाएगा।
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जब कोई सेज धारक ज्वेलर निर्यात करता है तो उसे उत्पाद शुल्क नहीं चुकाना होता है।
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मान लीजिए कि एक आभूषण निर्माता जेवरात बनाता है और किसी ऐसे ट्रेडर को बेचता है, जो कि निर्यातक है। तब आभूषण निर्माता को उत्पाद शुल्क चुकाना होगा और उसे चुकाया गया यह उत्पाद शुल्क वापिस भी नहीं मिलेगा , क्योंकि निर्यात आभूषण निर्माता द्वारा नहीं बल्कि अन्य व्यापारी द्वारा किया गया है !!!
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और जब कोई ऐसा आभूषण निर्माता जिसके पास सेज का लाइसेन्स नहीं है, निर्यात करता है तो उसे पहले उत्पाद शुल्क चुकाना होगा और उसे चुकाए गए उत्पाद शुल्क का पुनर्भुगतान तब होगा जबकि किये गए निर्यात की विदेशी मुद्रा बैंक में जमा हो जाती है। दूसरे शब्दों में उसे पहले पैसे चुकाने होंगे और पुनर्भुगतान के लिए इन्तजार करना होगा। और भारत में सामान्यतया पैसा प्राप्त करने की ऐसी प्रक्रियाओं में काफी बाधाओं का सामना करना पड़ता है। और प्रक्रियांए इतनी जटिल होती है कि कई बार पुनर्भुगतान प्राप्त करना बहुत मुश्किल हो जाता है।
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दूसरे शब्दों में, ज्वेलरी पर 1% उत्पाद शुल्क डालने का मोदी साहेब का प्रस्ताव सेज से बाहर काम कर रहे मझौले स्तर के निर्यातकों के निर्यात अवसरों को सिकोड़ देगा।
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समाधान ?
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हमारे इस सम्बन्ध में दो प्रस्ताव है :
१) सेज को दी जा रही सभी राहतो को समाप्त किया जाए।
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२) उत्पाद शुल्क के क़ानून को रद्द करके संपत्ति कर आरोपित किया जाए।
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संपत्ति कर के बारे में अधिक विवरण के लिए 'मेनिफेस्टो ऑफ़ राईट टू रिकॉल पार्टी' पुस्तक में 25 वां अध्याय देखें --
https://www.facebook.com/groups/righttorecallparty/10152114637883103/ ( for english )
https://web.facebook.com/permalink.php?story_fbid=745231492261756&id=100003247365514&_rdr (हिन्दी )
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और कृपया ध्यान दें कि सोनिया-मोदी-केजरीवाल का प्रत्येक अंधभगत आभूषणो पर 1% उत्पाद शुल्क लगाने का समर्थन कर रहा है। अत: यदि आप ज्वेलरी पर उत्पाद शुल्क का विरोध करते है तो सोनिया-मोदी-केजरीवाल और उनके अंध भगतो के साथ लग कर अपना समय नष्ट न करें। सोनिया-मोदी-केजरीवाल एक ही थाली के चट्टे बट्टे है, और इनके अंध भगत इनकी भक्ति के वश होकर इनकी चाटुकारिता करते है।
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हमारा आग्रह है कि -- विभिन्न समस्याओं के समाधान के लिए अच्छे कानूनों जैसे ज्यूरी सिस्टम, राईट टू रिकॉल, वेल्थ टैक्स आदि को देश में लागू करवाने के लिए राईट टू रिकॉल ग्रुप के कार्यकर्ताओ के साथ काम करें। 

कैसे मॉरीशस रुट ने भारत के ईमानदार कारोबारियों और उद्योगपतियों को बेईमान बनने पर बाध्य किया, और कैसे स्वदेशी उद्योगपति इससे प्रभावित होंगे ? (25-Apr-2016) No.6

April 25, 2016 No.6

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कैसे मॉरीशस रुट ने भारत के ईमानदार कारोबारियों और उद्योगपतियों को बेईमान बनने पर बाध्य किया, और कैसे स्वदेशी उद्योगपति इससे प्रभावित होंगे ?

मोरार देसाई अमेरिका-ब्रिटेन का कठपुतली था, अत: अमेरिका-ब्रिटेन ने मोरार देसाई को प्रधानमन्त्री बनने में मदद की। अमेरिका-ब्रिटेन चाहते थे कि भारत एक ऐसी संधि पर साइन करे जिसमें यह लिखा हो कि, 'यदि मॉरीशस की कोई कंपनी भारत में मुनाफ़ा कमाती है तो उसे कोई टैक्स नहीं चुकाने होंगे' !! मोरार देसाई ने उनकी इस मांग को पूरी करने के लिए सभी औपचारिकताएं पूरी की और इस संधि को साइन करने के लिए भारत सरकार की और से वादा किया। 

लेकिन इसी दौरान मध्यावधि चुनाव हुए, जिसमे मोरार देसाई कुर्सी से बेदखल हो गए और देवी इंदिरा अम्मा सत्ता में लौट आई। वे इस संधि को रद्द कर सकती थी, लेकिन मामला काफी आगे जा चुका था। अत: देवी इंदिरा अम्मा ने इस संधि पर हस्ताक्षर किये लेकिन इसका प्रभाव समाप्त करने के लिए एक राजपत्र अधिसूचना प्रकाशित करके विदेश से आने वाले सभी विदेशी निवेश प्रस्तावों को केबिनेट से अनुमति लेना अनिवार्य कर दिया, और मॉरीशस से आने वाले सभी निवेश प्रस्तावों को रद्द कर दिया। और इस प्रकार मॉरीशस रुट सिर्फ कागज पर ही सीमित रह गया। 

लेकिन 1991 में अमेरिका-ब्रिटेन फिर से अपनी दो कठपुतलियों पीवी नरसिम्हा राव को प्रधानमंत्री और मनमोहन सिंह को वित्त मंत्री बनाने में सफल हो गए। और दोनों ने मॉरीशस से आने वाले निवेश को हरी झंडी देना शुरू कर दिया। 
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ऐसी स्थिति में अमेरिकी-ब्रिटिश कम्पनियों ने मॉरीशस में अपनी छद्म कम्पनियां शुरू की, और इन कम्पनियों को भारत में कोई टैक्स नहीं चुकाने थे। जाहिर है भारतीय कम्पनियां इन कर मुक्त कम्पनियों से प्रतिस्पर्धा करने में सक्षम नहीं रह गयी थी। तब बाजार में टिके रहने के लिए उन्होंने अपने धन को हवाला इत्यादि से मॉरीशस पहुंचाया और मॉरीशस रुट के माध्यम से भारत में पुन: निवेश करने लगे। और जब पनामा की तरह मॉरीशस इन भारतीय कम्पनियों के बारे में खुलासा करेगा तो ये बुरी तरह से फंस जाएंगे !!!

भारतीय उद्योगपतियों ने 1996 के आम चुनावों में वाजपेयी का समर्थन किया और वे प्रधानमंत्री बने। चूंकि वाजपेयी अमेरिकी-ब्रिटिश धनिको से रार नहीं ठानना चाहते थे अत: उन्होंने इस संधि को रद्द करने का जोखिम नहीं उठाया। लेकिन उनके कार्यकाल में मॉरीशस रुट को ख़त्म करने सम्बन्धी कुछ कदम उठाये जाने की चर्चा बनी हुयी थी। मॉरीशस रुट तथा कुछ अन्य कारणों के चलते अमेरिका-ब्रिटेन ने पाकिस्तान को कारगिल पर चढ़ाई करने के लिए रणनीतिक-सैन्य मदद दी, और भारत को कारगिल युद्ध झेलना पड़ा। युद्ध में पाकिस्तान और भारत दोनों की हार व अमेरिका की विजय हुयी, परिणामस्वरूप वाजपेयी ने मॉरीशस रुट जारी रखने की अमेरिका-ब्रिटेन की मांग मान ली। 

और अब एक तरफ जहां सोनिया-मोदी-केजरीवाल "काला धन...काला धन...काला धन" के नारे लगाकर कोलाहल मचा रहे है, वहीं दूसरी तरफ ये सभी नेता मॉरीशस रुट पर चुप्पी साधे हुए है !! इतना ही नहीं हालात को और भी बदतर बनाने के लिए सोनिया घांडी ने 2013 में सिंगापुर के साथ और मोदी साहेब ने 2015 में फिजी के साथ मॉरीशस रुट की तर्ज पर ही अन्य संधियों पर हस्ताक्षर कर दिये है !!! और भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई लड़ने का दम भरने वाले अरविन्द गांधी इन तीनो इन तीनो संधियों का खुले आम समर्थन कर रहे है !!! 

कुल मिलाकर इन तीनो संधियों का परिणाम यह होगा कि ज्यादा से ज्यादा भारतीय उद्योगपति मॉरीशस, सिंगापुर और फिजी में गैर कानूनी कम्पनियां शुरू करने के लिए बाध्य हॉग=होंगे और जब वे पकडे जाएंगे तो ख़त्म हो जाएंगे !!!

समाधान ?

इस समस्या के समाधान के लिए हम राइट टू रिकालिस्ट्स कार्यकर्ताओ से यह आग्रह कर रहे है कि 85 करोड़ नागरिकों द्वारा अपने सांसदों को एसएमएस द्वारा यह आदेश भेजा जाना चाहिए कि मॉरीशस-सिंगापुर-फिजी समझौतों को रद्द किया जाए। और इस समस्या के समाधान के लिए आरएसएस और कांग्रेस कार्यकर्ताओ द्वारा प्रस्तावित समाधान क्या है ?

संघ के स्वयसेवक समाधान के लिए 9 बार "भारत माता की जय" के नारे लगाते है !!! और जब हम रिकालिस्ट्स उनसे दुबारा पूछते है कि मॉरीशस रुट को समाप्त करने के लिए क्या किया जाना चाहिए, तो वे चार गुना ऊँची आवाज में पूरी ताकत के साथ गला फाड़ कर 18 बार "भारत माता की जय" का नारा चीखते है !!!! ऐसे हालात में उनसे इस बारे में तिबारा पूछने की हमारी हिम्म्त नहीं है। 

कांग्रेस के कार्यकर्ता समाधान के लिए "सेकुलरिज़्म जिन्दाबाद" का नारा 10 बार लगाने की सलाह देते है, और बीजेपी के कार्यकर्ता मॉरीशस रुट के बारे में पूछने उल्टे हमसे ही यह सवाल पूछते है कि, "तुम लोग 60 साल तक कहाँ थे" ?? इन्होने इस सवाल पर पेटेंट करवा लिया है, और कोई भी सवाल पूछने पर ये हमसे 60 बार यह सवाल करते है कि , "60 साल तक तुम सब कहाँ थे, 60 साल तक तुम सब कहाँ थे, 60 साल तक तुम सब कहाँ थे.... * 60 !!!! और अरविन्द गांधी के कार्यकर्ता हमसे कहते है कि -- जब कांग्रेस और बीजेपी मॉरीशस रुट का समर्थन कर रही है तो तुम राईट टू रिकॉल ग्रुप के कार्यकर्ता मॉरीशस रुट के बारे में आम आदमी पार्टी पर क्यों सवाल खड़े कर रहे हो ? और भारत स्वाभिमान ट्रस्ट के कार्यकर्ताओ का मॉरीशस रुट को खत्म करने का अपना अलग ही ढंग है। वे हमसे कहते है कि --- "योग करो, प्राणायाम करो, अपनी हाथो के दोनों नाखूनों को दिन में 1084 बार आपस में रगड़ो, पतंजलि के तेल-साबुन का इस्तेमाल करो, आचार्यकुलम के लिए चंदा इकट्ठा करो, और इससे मॉरीशस रुट अपने आप गायब हो जाएगा" !!! और वे इतने पर भी नहीं रूकते। अपना समर्पण दिखाने के लिए फिर वे "काला धन वापिस आएगा, काला धन वापिस आएगा" का नारा ऊँची आवाज में 100 बार लगाते है !!! 

तो अब आप कार्यकर्ताओ को इस बारे में फैसला करना चाहिये कि मॉरीशस रूट को खत्म करने के लिए उन्हें राईट टू रिकॉल ग्रुप के साथ कार्य करना चाहिए या कांग्रेस-बीजेपी-आम आदमी पार्टी और भारत स्वाभिमान ट्रस्ट के कार्यकर्ताओ के साथ नारे लगाने चाहिए। 
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बहरहाल, मॉरीशस रुट को खत्म करना आसान नहीं है। क्योंकि यदि हमने मॉरीशस रुट को रद्द करने की कोशिश की तो यह लगभग तय है कि अमेरिका फिर से पाकिस्तान को भारत पर हमला करने के लिए सैन्य मदद देगा। इसीलिए हमें भारत की सेना को मजबूत बनाने के लिए स्वदेशी हथियारों के निर्माण उद्योग की तकनिकी क्षमता में सुधार करने की जरुरत है। और इसके लिए हमारे पास राईट टू रिकॉल, ज्यूरी सिस्टम, टीसीपी, वेल्थ टैक्स आदि कानूनों को गैजेट में प्रकाशित करने के अलावा अन्य कोई विकल्प नहीं है। और इस समय देश में सिर्फ राईट टू रिकॉल ग्रुप ही ऐसा समूह है जिसने भारत की सेना को मजबूत बनाने, स्वदेशी इकाइयों को सरंक्षण देने, निर्माण प्रौद्योगिकी को बढ़ावा देने आदि के लिए आवश्यक क़ानून ड्राफ्ट्स का प्रस्ताव किया है। शेष पार्टियों और समूहों के कार्यकर्ताओ के पास नारे आदि लगाने से फुर्सत नहीं है। 

इसीलिए देश के सभी राष्ट्रवादी कार्यकर्ताओ से हमारा आग्रह है कि वे राईट टू रिकॉल ग्रुप द्वारा प्रस्तावित ज्यूरी सिस्टम, वेल्थ टैक्स, राईट टू रिकॉल, टीसीपी, एम आर सी एम आदि क़ानून ड्राफ्ट्स को देश में लागू करवाने के लिए प्रयास करें। 
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आप 'मॉरीशस-सिंगापुर-फिजी रुट' को रद्द करवाने के लिए क्या कर सकते है ?

१) इस लिंक को देखें ----https://web.facebook.com/ProposedLawsHindi/posts/565918486919683

इस लिंक में वह प्रारूप रखा गया है जिसे गैजेट में प्रकाशित करके इन समझौतों को रद्द किया जा सकता है। 

२) यदि आप इस प्रारूप को गैजेट में प्रकाशित करने का समर्थन करते है तो इस ड्राफ्ट को अपने नोट्स सेक्शन में रखें, तथा अपने सांसद को एसएमएस द्वारा आदेश भेजे कि इस ड्राफ्ट को गैजेट में प्रकाशित किया जाए।