April 29, 2016 No.1
https://www.facebook.com/mehtarahulc/posts/10153453786806922
[ राष्ट्रीय हिन्दू देवालय प्रबंधक ट्रस्ट के लिए प्रस्तावित कानूनी ड्राफ्ट ]
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भारत के सभी नागरिकों,
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यह स्तम्भ हिन्दू धर्म के प्रशासन को मजबूत बनाने के लिए आवश्यक प्रस्तावित प्रक्रिया का विवरण प्रस्तुत करता है।
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यदि आप इस कानूनी ड्राफ्ट का समर्थन करते है तो अपने सांसद को एसएमएस द्वारा इस पोस्ट का लिंक भेजें। तथा इस स्तम्भ के कमेंट बॉक्स में 'I support' या 'मैं समर्थन करता हूँ' दर्ज करें।
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इस कानूनी ड्राफ्ट की जानकारी देश के नागरिको तक पहुंचाने के लिए इस स्तम्भ को शेयर करें, समाचार पत्रो में विज्ञापन दें, इस मुद्दे पर चुनाव लड़ें तथा इस पोस्ट के पहले कमेंट में सुझायी गयी अन्य गतिविधियों में भाग लें। यदि आप इस पोस्ट के पहले तथा दूसरे कमेंट को नहीं देख पा रहे है तो, इस पेज के विवरण खंड (डिस्क्रिप्शन कॉलम) को देखें। वहाँ इस पेज के सभी पोस्ट्स तथा शेष पांच कमेंट्स के लिंक की सूची दी गयी है।
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यदि करोड़ो नागरिक अपने सांसदो को अपने मोबाईल फोन से एसएमएस द्वारा आदेश भेजते है तो देश की वर्तमान व्यवस्था में क्या परिवर्तन आयेंगे ? इस प्रश्न तथा ऐसे ही अक्सर पूछे जाने वाले अन्य प्रश्नो के जवाब इस पोस्ट के दूसरे कमेंट में देखें जा सकते है। अन्य सम्बंधित जानकारी के लिए इस समुदाय का विवरण खंड देखें।
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टिप्पणी -- इस क़ानून ड्राफ्ट की विश्वसनीयता बनाएं रखने के लिए, इस पोस्ट को एक बार लिखे जाने के बाद संपादित नही किया गया है। वर्तनी या व्याकरण आदि की अशुद्धियों के सम्बन्ध में कृपया इस पोस्ट का छठा कमेंट देखें।
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सांसद को भेजे जाने वाले SMS का प्रारूप --
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"Hon MP, I order you to --
https://web.facebook.com/ProposedLawsHindi/posts/570764579768407, voter ID : #####"
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माननीय सांसद,
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यदि आपको इस पोस्ट का लिंक एसएमएस द्वारा प्राप्त होता है तो, ऐसा एसएमएस आपके लिए मतदाता द्वारा भेजा गया आदेश है। इस पोस्ट के लेखक का भेजे गए ऐसे आदेश या एसएमएस से कोई लेना देना नहीं है। आपको भेजा गया ऐसा आदेश इस कानूनी ड्राफ्ट को भारत के राजपत्र में प्रकाशित करने के लिए दिया गया है।
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(टिप्पणी -- इस कानूनी ड्राफ्ट के मूल अंग्रेजी संस्करण का लिंक इसी पोस्ट के दसवें कमेंट में दर्ज किया गया है।)
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सैक्शन A. संक्षेपण
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300 ईस्वी पूर्व से हिंदूवाद का विस्तार थम गया था, तथा 700 ई.पू. से यह लगातार सिमटना शुरू हो गया। 300 ई. पू. में हिंदूवाद का प्रसार अफगानिस्तान से लेकर फिलीपींस तक था। 1600 ई.पू. तक आते आते लगभग 35% जनसँख्या तथा 50% भूमि दूसरे धर्मों के अधीन चली गयी।
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सिखों तथा मराठा ने इस क्षति को काफी हद तक रोका तथा बहुत सारी भूमि फिर से प्राप्त कर ली। लेकिन धर्म-परिवर्तित लोगों को फिर से जोड़ नहीं सके। इनकी यह पुनर्विजय स्पेन की धार्मिक पुनर्विजय (जिसमें पहले ईसाई बहुल रहे स्पेन ने अपनी खोई हुई धार्मिक स्वतंत्रता को मुस्लिमों के हाथों से दोबारा प्राप्त कर लिया था ), की तुलना में काफी कमजोर रही। यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न है कि यह इतनी कमजोर क्यों थी ? फिर 1947 ईस्वी में हिंदुओं ने अपनी भूमि का बड़ा हिस्सा पाकिस्तान के रूप में गवाँ दिया तथा बाद में इसी का एक बड़ा हिस्सा बांग्लादेश बना और 1947 से लेकर अब तक उत्तर-पूर्व तथा कश्मीर का लगभग आधा हिस्सा हम गँवा चुके है।
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1700 ईस्वी से लेकर अब तक हिन्दुत्व से धर्म-परिवर्तन करके लोग ईसाई बन रहे है। और पिछले 20 वर्षों में ये धर्म-परिवर्तन की प्रवृत्ति तेजी से बढ़ी है। किसी अन्य लेख में हम उन कारणों पर भी लिखेंगे कि भूतकाल में हिन्दुत्व को यह क्षति क्यों हुई। यह लेख वर्तमान एवं भविष्य की संभावनाओ के सम्बन्ध में है।
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हमारे विचार से वर्तमान में मिशनरियों के हाथों हिन्दुत्व की लगातार होती हानि के निम्नलिखित मुख्य कारण है :
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1. मिशनरियों का गठबंधन बहुराष्ट्रीय कंपनियों के मालिकों के साथ है। बहुराष्ट्रीय कंपनियों के पास भारत की तुलना में ज्यादा अच्छी तकनीक तथा सेना है। उनके पास ज्यादा अच्छी तकनीक होने का कारण है पश्चिमी देशों में राइट टू रिकॉल पुलिस प्रमुख, राइट टू रिकॉल न्यायाधीश, ज्यूरी सिस्टम , संपत्ति कर आदि क़ानून प्रक्रियांए है । जबकि हमारे पास भारत मे ऐसे कानून नहीं है ; इसलिए मिशनरी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के सहयोग से बढ़त बना रहे है |
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2. चर्च में नियुक्तियों तथा धन को सामुदायिक समूहों में बांटने की प्रक्रियाएं मंदिरों की तुलना में ज्यादा अच्छी है। इसके ज्यादा अच्छे होने के निम्नलिखित कारण हैं :
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(2a) चर्च ऑफ़ इंग्लैण्ड नामक एक प्रोटेस्टेंट संप्रदाय में चर्च के पैसों के वितरण सम्बन्धी सभी निर्णय पादरी (priests) लेते है। परन्तु ये पादरी प्रधानमंत्री/सांसदों के द्वारा नियुक्त होते है तथा कोई भी आपराधिक कार्य करने पर नागरिकों की ज्यूरी के नियंत्रण में होते है। साथ ही चर्च की संपत्ति पर उनका कोई उत्तराधिकार नही होता।
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(2b) अन्य सभी प्रोटेस्टेंट सम्प्रदायों में स्थानीय बुजुर्गों द्वारा पादरी नियुक्त किया जाता है। चर्च के पैसों पर उत्तराधिकार लागू नही होता, और इसलिए प्रोटेस्टेंट चर्चों में धन इकठ्ठा करने की ओर झुकाव नही पाया जाता। अत: वे इस धन का उपयोग समुदाय के निर्माण व विकास में करते है।
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(2c) कैथोलिक में चर्च के पैसों के समाज में बांटने सम्बन्धी निर्णय पादरी द्वारा लिए जाते है, जो कि पोप के अधीन होता है। अगले पोप को नौकरी पर रखने के लिए 100-200 सर्वाधिक पुराने पादरी जिन्हें कार्डिनल्स कहते हैं, वोट करते हैं। चूँकि पादरी शादी नहीं कर सकता तथा उनमें गुरु प्रथा भी नही होती, अत: उत्तराधिकार यहाँ भी लागू नही होता। मतलब वर्तमान पादरी द्वारा अगले पादरी की नियुक्ति नहीं की जाती है। इसीलिए कैथोलिक चर्चों में भी संपत्ति संग्रह नही होता, तथा ये भी दान में मिले पैसों को समुदाय के निर्माण व विस्तार पर खर्च करते है।
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3. प्राचीन हिंदूवाद के अंतर्गत "मंदिरों" का प्रशासन :
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रामायण एवं महाभारत में एक भी ऐसे मंदिर की चर्चा नही मिलती जिसके पास प्रचुर मात्रा में स्वर्ण और धन हो !! इस सम्बन्ध में जो कुछ भी हमें पढ़ने को मिलता है उससे पता चलता है कि उस समय में मंदिरों की जगह आश्रम होते थे। इन आश्रमों को दान के रूप में मिले धन का उपयोग गायों की सेवा, सबको गायों का दूध उपलब्ध कराने, अमीर-गरीब का भेद किये बिना सभी बच्चों को गणित, विज्ञान, कानून, भाषा तथा अस्त्र-शस्त्र (हथियार चलने) की शिक्षा देने, गरीबों को दवाई दिलवाने तथा उनके भलाई के लिए किया जाता था। इसलिए आश्रम-प्रमुख को "पुरोहित" कहते थे जो दो शब्दों से बना है- "पर" तथा "हित", अर्थात ऐसा व्यक्ति जो दुसरो के कल्याण की चिंता करे। आश्रम उत्तराधिकार (वारिस) द्वारा नही चलता था। तथा जरूरी नही था कि आश्रम-प्रमुख के पुत्र को हीं आश्रम की बागडोर सौंपी जाये। आश्रम की यह बागडोर एक संत से दूसरे ऐसे संत को दी जाती थी जो कि समाज में सम्मानित होते थे। इनका कार्यकाल भी स्थायी नही होता था। संत बहुधा यात्रा पर रहते थे और मुक्त विचरण करते थे। यह व्यवस्था अब बहुत ही कम हिन्दू समुदायों में बची हुई है।
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4. वर्तमान हिन्दू मंदिरों का प्रशासन -
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वर्तमान हिन्दू मंदिरों में धन के समाज में बांटने सम्बन्धी निर्णय मंदिर प्रमुख (ट्रस्टी) या संप्रदाय प्रमुख (गुरु) द्वारा लिए जाते है, तथा इनका ही मंदिरों की संपत्ति के उपयोग पर पूर्ण नियंत्रण होता है। ट्रस्टी का पद उत्तराधिकार तथा गुरु प्रथा द्वारा हस्तांतरित होता है। मतलब आज का गुरु ही अगला गुरु नियुक्त करता है। अतः यहाँ संपत्ति इकठ्ठा करने की ओर झुकाव होता है, तथा इसका उपयोग तड़क-भड़क, दिखावे एवं ऐशो आराम में भी किया जाता है।
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इसका समाधान सिक्ख गुरुओं ने, खासकर 10 वें सिक्ख गुरु श्री गोविन्द सिंह जी ने ढूंढ निकाला था तथा इसे सभी सिक्ख गुरुद्वारों में लागू किया। किन्तु दुर्भाग्य से यह कभी भारत के सभी मंदिरों में लागू नही हो सका। हमारे विचार से हमें इसे आज ही लागू करवाने के प्रयास करने चाहिए। समस्या का समाधान यह है कि सभी हिन्दू मंदिरों के लिए सिक्ख गुरुद्वारा प्रबंधक कमिटी (एसजीपीसी) जैसा कानून बनाया जाये। तथा इस प्रकार इस कानून के माध्यम से हम मंदिरों में संपत्ति को इकठ्ठा करने की प्रवृति को कम करके हिंदूवाद का पतन रोक सकते है।
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सैक्शन B. किस प्रकार पूरे जीवन के कार्यकाल और वारिसान (उत्तराधिकार) से मंदिरों में जमाखोरी को बढ़ावा मिलता है ?
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पाठक हमसे असहमत होकर यह कह सकते है कि यदि मंदिरों में पूरे जीवन के कार्यकाल तथा उत्तराधिकार प्रणाली (वारिस प्रथा) है तो इसमें बुराई क्या है ? और गुरू प्रथा में गलत क्या है, जिससे आज के गुरू ही अपने शिष्यों में से किसी एक को अगला गुरू चुनते है ? यह एक जायज प्रश्न है।
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आइये, हम दो परिस्थितियों की तुलना करके देखें - पहला, जिसमें मंदिर प्रमुख A का कार्यकाल मात्र 2 वर्षों का है, और दूसरी परिस्थिति जिसमें मंदिर प्रमुख B का कार्यकाल पूरे जीवन का है। मान लीजिये प्रमुख A तथा प्रमुख B दोनों हीं अलग-अलग मामलों में 1-1 करोड़ रूपये प्राप्त करते है। ऐसी स्थिति में B, जिसका कार्यकाल पूरे जीवन का है, उस 1 करोड़ रूपये को खर्च करने की बजाय लम्बे समय तक अपने पास रखना चाहेगा। लेकिन चूंकि A का कार्यकाल कुछ वर्षों के लिए निश्चित है, इसीलिए A इस पैसे को जितना सम्भव हो सकेगा, सामुदायिक कार्यों और धर्म के उत्थान में हीं लगाएगा, ताकि उसे नाम मिले और उसके फिर से चुने जाने की सम्भावना भी बढ़ जाये। इस प्रकार पूरे जीवन के कार्यकाल से खर्च की इच्छा घटती है, और जमाखोरी की इच्छा बढ़ती है। जबकि कुछ वर्षों के निश्चित कार्यकाल से जमाखोरी की सम्भावना घटती है, और समाज के कार्यों में खर्च करने की इच्छा बढ़ती है।
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भारत में मंदिरों के प्रशासन में बहुधा उत्तराधिकार और पूरे जीवन का कार्यकाल दोनों हीं साथ-साथ पाये जाते हैं। प्रत्येक ऐसी संस्था जिसमें पूरे जीवन का कार्यकाल होता है, वहाँ उत्तराधिकार (वारिस प्रथा) भी होता है। इसी प्रकार उत्तराधिकार प्रथा वहीँ होती है जहाँ कि पुरे जीवन का कार्यकाल भी होता है। निश्चित समय का कार्यकाल होने से पूरे जीवन का कार्यकाल तथा गुरु प्रथा दोनों हीं अपने आप रद्द हो जाते है।
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सैक्शन C. किस प्रकार मंदिरों में पूरे जीवन के कार्यकाल एवं उत्तराधिकार से समाज की रक्षा पंक्ति कमजोर होती चली जाती है ?
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सैक्शन B में दिए गये उदाहरण में प्रमुख B अपने उत्तराधिकारी के लिए धन इकठ्ठा करना चाहेगा और उत्तराधिकारी भी उस पर जितना सम्भव हो कम खर्च करने के लिए दबाव बनाएंगे। इसीलिए जमाखोरी आगे बढ़ते हीं जायेगी, समाज के लिए कार्यों में गिरावट आएगी, और समस्या बद से बदतर होती जायेगी। समाज के लिए कार्यों में धन खर्च करने की जगह धन इकठ्ठा करने के झुकाव से समाज की रक्षा क्षमता कमजोर पड़ती है।
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उदाहरण के लिए मान लीजिये दो समुदाय A तथा B हैं। समुदाय A में मंदिर प्रमुख का कार्यकाल निश्चित है, तथा प्रमुख का चुनाव अनुयायियों (चेलों) द्वारा किया जाता है। समुदाय B में मंदिर प्रमुख का कार्यकाल पूरे जीवन का है, तथा उत्तराधिकार प्रथा भी है। मान लीजिए कि समुदाय B पर कोई बाहरी आक्रमण होता है, जिसमें समुदाय के 1000 में से लगभग 100 सदस्यों ने युद्ध में जाने का निर्णय लिया। मान लीजिये युद्ध में उनमें से 10 मारे गये तथा 10 बुरी तरह घायल हो गये। अब यदि घायलों तथा मारे गये व्यक्तियों के रिश्तेदारों को मंदिर कोई सहायता नही देते, तो अगली बार हमले में बहुत कम व्यक्ति लड़ने जायेंगे। इसका परिणाम ये होगा कि समुदाय का नियंत्रण हमला करने वालों के हाथों में चला जायेगा।
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यदि समुदाय A के साथ भी समान परिस्थिति की कल्पना करें तो चूँकि यहाँ धन इकठ्ठा करने की प्रवृति नहीं होती इसलिए मंदिर प्रमुख घायलों एवं मृत तथा घायल व्यक्तियों के रिश्तेदारों की सहायता करेंगे। इसलिए अगली बार भी युद्ध छिड़ने पर बड़ी संख्या में लोग अपनी जान जोखिम में डाल कर लड़ने जायेंगे।
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इस प्रकार निम्नलिखित बातें स्पष्ट होती है कि यदि मंदिर में धन के इकट्ठे करने की ओर झुकाव है तो :
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1. मंदिर की तरफ से घायलों तथा मरने वालों के रिश्तेदारों को मिलने वाली सहायता में कमी आती है।
2. इसलिए समुदाय की सुरक्षा के लिए लड़ने की इच्छा रखने वाले सदस्यों की संख्या में कमी आती है।
3. इसका परिणाम ये होता है कि समुदाय को युद्ध में पराजय का सामना करना पड़ता है।
सिक्ख प्रशासन में उत्तराधिकार परम्परा नहीं होने से गुरूद्वारे प्रमुखों में धन संग्रह की प्रवृति नहीं थी और यही कारण है कि गैर सिक्ख हिन्दू पराजित हुए जबकि सिखों ने आक्रमणकारियों को युद्धों में कड़ी टक्कर दी। गैर सिक्ख हिन्दूओं में मंदिर प्रमुख आजीवन तथा उत्तराधिकार द्वारा नियुक्त होते हैं, इसलिए उनमें धन को इकठ्ठा करने की ओर झुकाव होती है, तथा वे घायलों व मृतकों के परिवार वालों की बहुत कम मदद कर पाते हैं या करते हीं नही। जबकि सिख गुरुद्वारा प्रबंधक का चुनाव निश्चित समय के कार्यकाल के लिए होता है, इसलिए उनमें धन को इकठ्ठा करने की ओर झुकाव नहीं पाया जाता, इसलिए वे घायलों और मरने वालों के रिश्तेदारों की मदद करते हैं। इसलिए सिक्ख समुदाय में धर्म के लिए लड़ने का जोश बना रहता है, तथा लगातार बढ़ता हीं जाता है। और इस कारण सिक्ख अपने आप को और हिंदुओं को मुगलों व अफगानों के हिंसक आक्रमणों में सुरक्षा दे पाये।
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सैक्शन D. मंदिरों की संपत्ति पर मिशनरियों के कब्जे में उत्तराधिकार प्रथा किस प्रकार सहायक हुई ?
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मंदिरों में उत्तराधिकार व्यवस्था ने एक लम्बे समय तक बने रहने वाली समस्या को जन्म दिया। हम यहाँ एक मंदिर का उदाहरण बिना उसका नाम लिए देना चाहेंगे। यह मंदिर लगभग 1000 वर्ष पूर्व बनाया गया था तथा उसका एक महंत था। उसके 5 बेटे थे जो कि उसके बाद महंत बने। उनमें से हरेक कुछ समय के समय के लिए महंत की गद्दी पर बैठता था। फिर उन 5 में से हरेक को 2 या 3 पुत्र हुए, यानी कुल मिलकर लगभग 12 पुत्र। उन पाँचों के मरने के बाद उनके ये 12 पुत्र, यानी प्रथम महंत के पोते वारिस बने। अब ये 12 भी बारी बारी से कुछ समय से चक्रीय क्रम से (बारी-बारी से) महंत की गद्दी पर बैठते थे।
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लेकिन उनकी भागीदारी समान नहीं रहती। जैसे- यदि A के 2 पुत्र A1 तथा A2 थे एवं B के 4 पुत्र B1, B2, B3 तथा B4 थे। ऐसी स्थिति में A1 या A2 की भागीदारी B1, B2, B3 या B4 की तुलना में ठीक दोगुनी हो जायेगी। अक्सर ऐसा भी होता है कि किसी महंत का कोई पुत्र न हो और उसकी मृत्यु हो जाये। अब ऐसे में यदि उसने पुत्र गोद लिया है या पुत्र का जन्म उसकी मृत्यु के बाद हुआ हो तो ऐसे में वह महंत बनेगा या नहीं इस पर कानूनी विवाद चल सकता है। साथ हीं भागीदारी पर भी विवाद हो सकता है। इसलिए इस तरह लगभग 20-30 पीढ़ियों के बाद अमुक मंदिर के लगभग 500 महंत हैं। साथ हीं उत्तराधिकार सम्बन्धी 50 से अधिक अनसुलझे मुकदमे भी कोर्ट में चल रहे हैं । इन मुकदमों का बहाना बनाकर भारत सरकार मंदिरों का अधिग्रहण कर सकती है। चूँकि भारत के प्रमुख राजनीतिक दल मिशनरी के दलाल हैं, इसीलिए मंदिरों की दान द्वारा प्राप्त पैसा मिशनरियों द्वारा चलायी जा रही धर्मार्थ संस्थाओं के पास चला जाता है। इस प्रकार मिशनरियों को मंदिरों से पैसे प्राप्त होते हैं जिसका उपयोग वे हिन्दूओं का धर्मपरिवर्तन कर उन्हें ईसाई बनाने में करते हैं।
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इस प्रकार मंदिरों में उत्तराधिकार के चलते दर्जनों विवाद खड़े होते हैं जिससे कि सरकार द्वारा मंदिरों की संपत्ति पर कब्ज़ा करना आसान हो जाता है।
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सैक्शन E. प्रस्तावित समाधान संक्षेप में
हिन्दू मंदिरों के लिए हम यहाँ सिक्ख गुरुद्वारा प्रबंधक समिति अधिनियम जैसा एक ढांचा प्रस्तावित कर रहे हैं। समस्या यह है कि हिन्दू धर्म में अनेक संप्रदाय हैं तथा इनमें से हरेक स्वयं को दूसरे से अलग रखना चाहता है। साथ हीं एक मुख्य समस्या करों से सम्बंधित है। धार्मिक ट्रस्टों पर कॉर्पोरेट के समतुल्य हीं परन्तु कुछ छूट के साथ कर लगाये जाने चाहिए। यदि ट्रस्टों पर कर नहीं लगाया जाये तो लोग ट्रस्ट बनाकर उसके माध्यम से करों से बचने लगेंगे। एक अन्य मुद्दा राज्य- केंद्र सम्बन्ध तथा भाषा का है। भाषा की समस्या के चलते सभी राज्य अपने सभी मंदिरों का प्रबंधन केंद्र के अधिकार में नहीं देना चाहेंगे।
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हम जो समाधान प्रस्तावित कर रहे हैं उसमें तीन प्रकार के HMPC = हिन्दू मंदिर प्रबंधक समितियों की स्थापना होगी - एक राष्ट्रीय स्तर पर, प्रत्येक राज्य के लिए एक, और प्रत्येक संप्रदाय के लिए एक। प्रत्येक समिति में एक प्रमुख तथा 4 ऐसे सदस्य होंगे जिनका निर्वाचन मतदाताओं द्वारा 2 वर्ष के लिए होगा। लेकिन किसी भी दिन मतदाता एस.एम.एस./ए.टी.एम द्वारा या पटवारी के कार्यालय में स्वयं जाकर उन्हें बदलने का वोट देकर बदल भी सकते हैं। प्रत्येक हिंदू मंदिर प्रबंधक समीति (HMPC) को धार्मिक ट्रस्ट की श्रेणी प्राप्त होगी। एक व्यक्ति इसके चुने गए सदस्य के तौर पर अपने पूरे जीवनकाल में अधिकतम 4 वर्ष हीं रह सकता है। साथ हीं पुजारी तथा कर्मचारियों को नौकरी लिखित परीक्षा द्वारा मिलेगी तथा ज्यूरी सिस्टम का उपयोग करके इन्हें बदला जा सकेगा।
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नागरिकों की जूरी द्वारा आपराधिक मामलों की सुनवाई होगी। प्रत्येक हिंदू मदिर प्रबंधक समीति (HMPC) की सम्पत्ति पर कर लगेगा जिस पर 100 रूपये (या एक निश्चित रकम) प्रति सदस्य प्रति वर्ष छूट का नियम लागू होगा। प्रत्येक नागरिक 5 ट्रस्टों को करों में राहत या छूट प्रदान कर सकता है। टैक्स के नियम सभी ट्रस्टों के लिए समान होंगे, चाहे वे हिन्दू, क्रिस्चियन, सिख, जैन, मुस्लिम, बौद्ध या कोई अन्य दान संस्था अथवा ट्रस्ट हों। एक नागरिक कितने भी ट्रस्टों का सदस्य हो सकता है। सदस्य दो प्रकार के हो सकते हैं- मतदाता सदस्य तथा गैर-मतदाता सदस्य। सिर्फ मतदाता सदस्य हीं सीमिति सदस्यों का चुनाव कर सकते हैं।
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इसकी विस्तृत जानकारी इस प्रकार है -
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1. NHDPT = ( राष्ट्रीय हिन्दू देवालय प्रबंधन ट्रस्ट):
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प्रत्येक हिन्दू, सिख, जैन, बौद्ध आदि इस ट्रस्ट के जन्म से सदस्य होंगे, जब तक कि वे स्वयं अपनी सदस्यता नहीं छोड़ देते (नागरिक मताधिकार का प्रयोग मतदाता सूची में नाम दर्ज होने पर ही कर सकेंगे), इस ट्रस्ट को अपनी ओर से करों (टैक्स) में छूट का लाभ वे दे भी सकते हैं और नहीं भी दे सकते है, लेकिन प्रत्येक स्थिति में उनका मतदान का अधिकार बना रहेगा। मुस्लिम तथा क्रिश्चियन इस ट्रस्ट के सदस्य नहीं बन सकेंगे। ट्रस्ट के प्रमुख का चुनाव सभी सदस्य मिलकर करेंगे तथा सदस्यों के पास मंदिर प्रमुख को किसी भी दिन बदलने का अधिकार भी होगा।
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प्रमुख द्वारा 4 व्यवस्थापकों को नौकरी दी जाएगी, जिन्हें मतदाता सदस्य चाहें तो किसी भी दिन बदल सकते हैं। ट्रस्ट को आय-कर तथा सम्पत्ति-कर देना होगा, तथा इसे करों में छूट उसी अनुपात में मिलेगी जितने छूट के यूनिट उसे सदस्यों द्वारा प्राप्त होंगे। शुरू में राष्ट्रीय हिंदू देवालय प्रबंधक ट्रस्ट (NHMPT) मात्र 4 मंदिरों की देख-रेख करेगा -- कश्मीर का अमरनाथ देवालय, राम जन्म भूमि देवालय, कृष्ण जन्म भूमि देवालय तथा काशी विश्वनाथ देवालय। आगे चलकर यह अन्य मंदिरों की देख-रेख भी कर सकता है, यदि सम्बंधित संप्रदाय स्वेच्छा से मंदिर को इसके सुपुर्द कर दे।
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2. RHDPT= ( राज्य हिन्दू देवालय प्रबंधक ट्रस्ट) :
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प्रत्येक राज्य में एक राज्य हिंदू देवालय प्रबंधन ट्रस्ट (RHDPT) होगा, जिसके सदस्य उस राज्य के प्रत्येक हिन्दू, सिख, जैन, बौद्ध आदि मतदाता होंगे, तथा वे तब तक सदस्य बने रहेंगे जब तक कि वे स्वयं अपनी सदस्यता न छोड़ना चाहें। वे चाहें तो अपनी ओर से ट्रस्ट को टैक्स (करों) में छूट का लाभ दे सकते हैं और नही भी दे सकते, इससे उनका मतदान का अधिकार प्रभावित नही होगा। मुस्लिम तथा क्रिश्चियन इस ट्रस्ट के सदस्य नहीं बन सकते। ट्रस्ट के प्रमुख का चुनाव सभी सदस्य मिलकर करेंगे, तथा सदस्यों के पास प्रमुख को किसी भी दिन बदलने का अधिकार भी होगा।
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प्रमुख द्वारा 4 व्यवस्थापकों की नियुक्ति की जायेगी, जिन्हें कि मतदाता सदस्य चाहें तो किसी भी दिन बदल सकते हैं। ट्रस्ट को आय कर तथा सम्पत्ति कर देना होगा, तथा इसे करों में छूट उसी अनुपात में मिलेगी जितने छूट के यूनिट उसे सदस्यों द्वारा प्राप्त होंगे। शुरू में राज्य हिंदू देवालय प्रबंधन ट्रस्ट (RHDPT) राज्य के उन्हीं मंदिरों की व्यवस्था करेगा जिन्हें कि सम्बंधित संप्रदाय उस राज्य के सम्पूर्ण हिन्दू समुदाय के सुपुर्द करना चाहेगा।
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3. RT = ( रिलिजियस ट्रस्ट अथवा धार्मिक ट्रस्ट) :
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जितने भी हिन्दू ट्रस्ट बने हैं, उनमें से हरेक को इस श्रेणी में रखा जाएगा। शुरू में सिर्फ ट्रस्टी हीं VM= वोटिंग मेंबर (मतदाता सदस्य) होंगे, तथा NVM= नॉन वोटिंग मेंबर्स (गैर मतदाता सदस्य) की संख्या शून्य होगी। फिर आज के मतदाता सदस्य 67% के बहुमत के साथ और मतदाता सदस्यों तथा गैर मतदाता सदस्यों को जोड़ सकते हैं। कोई एक नागरिक कितने भी धार्मिक ट्रस्टों में मतदाता सदस्य तथा गैर मतदाता सदस्य हो सकता है, बशर्ते उस धार्मिक ट्रस्ट को भी अपने सदस्यों के अन्य ट्रस्टों के सदस्य बनने से कोई एतराज न हो।
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प्रमुख की नियुक्ति मतदाता सदस्यों (VMs) द्वारा होती है जो कि 4 व्यवस्थापकों की नियुक्ति करता है। मतदाता सदस्य प्रमुख या किसी भी व्यवस्थापक को किसी भी दिन बदल सकते हैं। ट्रस्ट को आय कर तथा सम्पत्ति कर देना होगा, तथा इसे करों में छूट उसी अनुपात में मिलेगी जितने छूट के यूनिट उसे सदस्यों द्वारा प्राप्त होंगे। यदि इस ट्रस्ट (RT) में ऐसा कोई आतंरिक कानून है कि मतदाता सदस्यों के बच्चे भी मतदाता सदस्य बन सकेंगे तो अपने आप वे बच्चे मतदाता सदस्य बन जायेंगे। और एक बार यदि कोई धार्मिक ट्रस्ट इस अधिनियम के अंतर्गत आने की सहमति दे देता है तो फिर वह इस अधिनियम से बाहर नहीं हो सकेगा।
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4. मुस्लिम तथा क्रिश्चियन धार्मिक ट्रस्टों की व्यवस्था आज के कानूनों के अनुसार हीं होगी :
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टैक्स के लिए इन ट्रस्टों पर भी दूसरे ट्रस्ट के समान नियम लागू होंगे। तथा करों में उन्हें प्राप्त होने वाली छूट भी उनके सदस्यों द्वारा प्राप्त होने वाले कर छूट के यूनिटों के अनुपात में होगी।
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वर्तमान में भारत में धार्मिक ट्रस्ट कोई आय कर तथा संपत्त-कर नहीं देते, अत: इस क़ानून के आने से इस व्यवस्था मे बदलाव आएगा। इस कानून के लागू होने पर सभी ट्रस्टों को अपने स्वामित्व वाले प्लाट/इमारतों तथा सोना/चांदी के बाजार मूल्य के अनुसार तथा अपनी आय तथा प्राप्त होने वाले दान के अनुसार कर चुकाने होंगे। करों में छूट इस बात पर निर्भर करेगी कि नागरिकों से कर छूट के कितने यूनिट उन्हें प्राप्त होते हैं। आज के ट्रस्टों के लिए ट्रस्टी हीं मतदाता सदस्य माने जायेंगे, तथा उन्हें गैर मतदाता सदस्यों की आवश्यकता नहीं होगी।
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सैक्शन F. राष्ट्रीय हिन्दू देवालय प्रबंधक ट्रस्ट के ड्राफ्ट का विवरण
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इस स्तम्भ में 'राष्ट्रीय देवालय प्रबंधक ट्रस्ट' का ड्राफ्ट दिया गया है। विभिन्न सम्प्रदायों के प्रबंधन के लिए प्रस्तावित क़ानून ड्राफ्ट की जानकारी के लिए कमेंट बॉक्स देंखे।
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प्रधान मंत्री द्वारा निम्नलिखित ड्राफ्ट को राजपत्र में छापने के बाद राष्ट्रीय हिन्दू देवालय प्रबंधक ट्रस्ट (NHDPT) लागू हो जायेगा
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======ड्राफ्ट का प्रारम्भ=====
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व्यक्ति, जिसके पद का नाम कोष्ठ [ ] में दिया गया है, वह अधिकारी होगा जो कि सम्बंधित निर्देशों को लागू करेगा।
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[परिभाषाएं]
• ‘ट्रस्ट’ शब्द से मतलब ‘राष्ट्रीय हिन्दू देवालय प्रबंधक ट्रस्ट' (NHDPT) से है।
• ‘अध्यक्ष’ शब्द का मतलब है ट्रस्ट का अध्यक्ष।
• ‘ट्रस्टी’ शब्द का मतलब है ट्रस्ट का ट्रस्टी।
• ‘हिन्दू नागरिक’ शब्द का मतलब एक पंजीकृत मतदाता से है जो कि हिन्दू, सिख, बौद्ध, या जैन है, अथवा जिसे अध्यक्ष द्वारा हिन्दू कहकर सम्बोधित किया जाये, जब तक कि उस नागरिक ने स्वयं को गैर हिन्दू नहीं कहा हो।
• शब्द ‘सकता है’ (May) का मतलब है 'सम्भावना है' अथवा 'जरूरी नही है।' तथा साफ़ तौर पर इसका मतलब है 'कोई बाध्यता नही है'।
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(राष्ट्रीय हिन्दू देवालय प्रबंधक ट्रस्ट)
खण्ड -1 : अध्यक्ष तथा ट्रस्टी को नौकरी पर रखना एवं बदलाव
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1.1 [ प्रधान मंत्री ]
प्रधानमंत्री राष्ट्रीय हिन्दू देवालय प्रबंधक ट्रस्ट (NHDPT) का गठन करेगा, जिसका कार्यकारी अध्यक्ष प्रधानमंत्री स्वयं अथवा उसके द्वारा अपनी पसंद का कोई हिन्दू मन्त्री होगा, तथा उसी की पसंद के 4 हिन्दू मंत्री ट्रस्टी के रूप में होंगे।
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1.2 [ कलेक्टर ]
यदि 30 वर्ष से अधिक उम्र का कोई भी भारतीय नागरिक इस ट्रस्ट का अध्यक्ष बनना चाहे तो वह कलेक्टर के सामने उपस्थित होगा। कलेक्टर उससे सांसद चुनाव के लिए जमा की जाने वाली जमा राशि की तरह ही एक निश्चित रकम लेकर एक क्रम संख्या जारी करेगा, तथा उसका नाम प्रधानमंत्री की वेबसाइट पर रखेगा।
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1.3 [ तलाटी/पटवारी, ग्राम अधिकारी ]
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(1.3.1) यदि कोई नागरिक स्वयं पटवारी के कार्यालय आता है, 3 रूपये का शुल्क चुकाता है, तथा अधिकतम 5 व्यक्तियों के नामों का अनुमोदन अध्यक्ष के पद के लिए करता है, तो तलाटी उसके अनुमोदन को कम्प्यूटर में वेबसाइट पर दर्ज करेगा तथा उसे एक रसीद देगा, जिसमें उसका मतदाता पहचान पत्र संख्या, तिथि, समय, तथा उसके द्वारा अनुमोदित (पसंद किये गए) व्यक्तियों के नाम होंगे। बी.पी.एल कार्ड धारकों के लिए यह फीस मात्र 1 रूपये होगी।
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(1.3.2) यदि कोई नागरिक अपना अनुमोदन रद्द करना चाहता है तो वह पटवारी के कार्यालय जायेगा, तथा तलाटी उसके कहने पर बिना कोई शुल्क लिए उसके एक या एक से अधिक अनुमोदन रद्द कर देगा।
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(1.3.3) कलेक्टर मतदाता को एस.एम.एस द्वारा फीडबैक भेजने के लिए एक सिस्टम बना सकता है।
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(1.3.4) कलेक्टर मतदाता के उँगलियों के निशान तथा तस्वीर लेकर उन्हें रसीद पर डालने का सिस्टम भी बना सकता है।
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(1.3.5) मतदाता एस.एम.एस द्वारा अपना अनुमोदन दर्ज करा सकें, ऐसा सिस्टम प्रधानमंत्री बनवा सकता है। प्रधानमंत्री ऐसा सिस्टम बनवा सकता है, जिसमें मतदाता अपना अनुमोदन ए.टी.एम द्वारा दर्ज करा सके।
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1.4 [ पटवारी ]
पटवारी नागरिक की पसंद को जिले की वेबसाइट पर उसके मतदाता पहचान पत्र संख्या तथा पसंद को दर्ज करेगा।
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1.5 [ कलेक्टर ]
प्रत्येक सोमवार को कलेक्टर हरेक उम्मीदवार को प्राप्त अनुमोदनों की कुल संख्या सार्वजनिक रूप से दर्शायेगा।
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1.6 [ प्रधानमंत्री ]
यदि किसी उम्मीदवार को हिन्दू नागरिकों की कुल संख्या में से 35% का अनुमोदन प्राप्त हो जाता है, तथा यदि यह संख्या आज के अध्यक्ष को प्राप्त अनुमोदन से 1 करोड़ अधिक हो, तो प्रधानमंत्री उसे नया अध्यक्ष नियुक्त कर सकते हैं।
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1.7 [ कलेक्टर ]
यदि 30 वर्ष से अधिक उम्र का कोई भी भारतीय नागरिक ट्रस्टी बनना चाहे तो वह कलेक्टर के सामने उपस्थित होगा। कलेक्टर उससे सांसद चुनाव के लिए जमा की जाने वाली जमा राशि की तरह ही एक निश्चित रकम लेकर एक क्रम संख्या जारी करेगा, तथा उसका नाम प्रधानमंत्री की वेबसाइट पर रखेगा।
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1.8 [ तलाटी/पटवारी, ग्राम अधिकारी ]
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(1.8.1) यदि एक नागरिक स्वयं पटवारी के कार्यालय आता है, 3 रूपये का शुल्क चुकाता है, तथा अधिकतम 5 व्यक्तियों के नामों का अनुमोदन ट्रस्टी के पद के लिए करता है, तो तलाटी उसके अनुमोदन को कम्प्यूटर में वेबसाइट पर दर्ज करेगा तथा उसे एक रसीद देगा, जिसमें उसका मतदाता पहचान पत्र संख्या, तिथि, समय तथा उसके द्वारा अनुमोदित व्यक्तियों के नाम होंगे। बी.पी.एल कार्ड धारकों के लिए यह शुल्क 1 रूपये होगा।
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(1.8.2) यदि कोई नागरिक अपना अनुमोदन रद्द करना चाहता है तो वह तलाटी के कार्यालय जायेगा तथा तलाटी उसके कहने पर बिना कोई शुल्क लिए उसके एक या एक से अधिक अनुमोदन रद्द कर देगा।
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(1.8.3) कलेक्टर मतदाता को एस.एम.एस द्वारा फीडबैक भेजने के लिए एक सिस्टम बना सकता है।
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(1.8.4) कलेक्टर मतदाता के उँगलियों के निशान तथा तस्वीर लेकर उन्हें रसीद पर डालने कि पद्धति भी बना सकता है।
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(1.8.5) मतदाता एस.एम.एस द्वारा अपना अनुमोदन दर्ज करा सकें, ऐसा सिस्टम प्रधानमंत्री बनवा सकता है। प्रधानमंत्री ऐसा सिस्टम बनवा सकता है जिसमें मतदाता अपना अनुमोदन ए.टी.एम द्वारा दर्ज करा सके।
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1.9 [ प्रधानमंत्री ]
यदि किसी उम्मीदवार को हिन्दू नागरिकों की कुल संख्या में से 35% का अनुमोदन प्राप्त हो जाता है, तथा यदि यह संख्या आज के ट्रस्टी को प्राप्त अनुमोदन से 1 करोड़ अधिक हो, तो प्रधानमंत्री उसे नया ट्रस्टी बना सकते हैं, तथा आज के ट्रस्टी को हटा सकते हैं।
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1.10 [ प्रधानमंत्री ]
एक ही व्यक्ति ट्रस्टी के साथ साथ अध्यक्ष पद के लिए भी उम्मीदवार हो सकता है।
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1.11 [ प्रधानमंत्री ]
यदि किसी व्यक्ति ने ट्रस्टी या अध्यक्ष के पद पर 1000 दिनों तक कार्य कर लिया है तो प्रधानमंत्री उसे हटा कर अधिकतम अनुमोदन प्राप्त करने वाले व्यक्ति को उसकी जगह रख सकेंगे।
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1.12 [ ट्रस्टी ]
अध्यक्ष तथा ट्रस्टी मिलकर ट्रस्ट को चलाने तथा कर्मचारियों की व्यवस्था के लिए जरुरी नियम बनाएंगे।
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1.13 [प्रधानमंत्री]
यदि कोई ट्रस्टी अथवा अध्यक्ष किसी अन्य धार्मिक ट्रस्ट का ट्रस्टी या कर्मचारी बन जाता है तो ऐसी स्थिति में प्रधानमंत्री उसे हटा कर उसकी जगह ट्रस्टी या अध्यक्ष पद के ऐसे उम्मीदवार को रखेगा जिसे अधिकतम व्यक्तियों का अनुमोदन प्राप्त हो।
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खण्ड - 2 : ट्रस्ट की व्यवस्था तथा सदस्यता
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2.1 [ अध्यक्ष ]
ट्रस्ट की व्यवस्था अध्यक्ष करेगा। पुजारी तथा अन्य कर्मचारियों को अध्यक्ष द्वारा लिखित परीक्षा करवाकर 1000 दिनों के समय-काल के लिए नौकरी दी जायेगी, जो 2000 दिनों तक बढ़ाई जा सकती है।
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2.2 [ अध्यक्ष ]
कर्मचारियों के खिलाफ शिकायतों की सुनवाई के लिए अध्यक्ष जूरी प्रणाली का निर्माण करेगा। अर्थात वह जूरी प्रणाली का प्रारूप तैयार कर उसे लागू करेगा तथा इसकी व्यवस्था के लिए अधिकारियों की नियुक्ति एवं भूमिका तय करेगा।
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2.3 [ अध्यक्ष ]
यदि कोई सरकारी कर्मचारी ट्रस्टी या कर्मचारी बन जाता है तो जूरी द्वारा सुनवाई के बाद अध्यक्ष उसे पद से हटा देगा।
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2.4 [ अध्यक्ष ]
यदि किसी कर्मचारी ने 2000 दिनों से अधिक कार्य कर लिया है तो अध्यक्ष जूरी द्वारा सुनवाई के बाद उसे सेवा से हटा सकता है। उसके बाद वह कर्मचारी फिर से ट्रस्टी अथवा अध्यक्ष के तौर पर 1000 दिनों तक कार्य कर सकता है।
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खण्ड -3 : राष्ट्रीय मंदिर
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3.1 [ प्रधानमंत्री ]
भूमि के उपलब्ध होने पर प्रधानमंत्री निम्नलिखित 4 भूखण्ड ट्रस्ट के हवाले कर देंगे -- कश्मीर में अमरनाथ देवालय, राम जन्मभूमि देवालय, कृष्ण जन्मभूमि देवालय तथा काशी विश्वनाथ देवालय। इन 4 देवालयों की देखरेख तथा व्यवस्था ट्रस्ट करेगा।
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3.2 [अध्यक्ष]
यदि कोई सम्प्रदाय अपने किसी देवालय को ट्रस्ट के हवाले करता है तो उसकी देखरेख भी ट्रस्ट करेगा। अगले 15 वर्षों के अंदर वह संप्रदाय चाहे तो अपने उस देवालय को वापस ले सकता है। 15 वर्ष का समय पूरी होने पर ट्रस्ट उस संप्रदाय से लिखित में पूछेगा कि क्या वह देवालय को वापस लेना चाहता है या नही। यदि उस समय संप्रदाय ऐसा करने के लिए मना करता है तो वह देवालय हमेशा के लिए ट्रस्ट के देखरेख में हीं चलाया जायेगा।
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खण्ड - 4 : सदस्यता एवं मताधिकार
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4.1 [ अध्यक्ष/प्रधानमंत्री ]
हरेक व्यक्ति जो हिन्दू है तथा ट्रस्ट का गठन होने की तिथि को 18 वर्ष से अधिक उम्र का है, इस ट्रस्ट का स्वत: ही मतदाता सदस्य होगा। ट्रस्ट के गैर-मतदाता सदस्य नहीं होंगे। "हिन्दू" शब्द का मतलब हिन्दू धर्म के सभी संप्रदाय, सिख, जैन, बौद्ध आदि से है। फिर भी यदि कोई व्यक्ति किसी भी माध्यम से यह स्पष्ट करता है कि वह हिन्दू कहलाया जाना नहीं चाहता तो इस मतदाता सूची से उसका नाम हटा दिया जायेगा। बाद में जब वह फिर से हिन्दू कहलाया जाना चाहेगा तो उसका नाम फिर से इस सूची में शामिल कर लिया जायेगा।
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4.2 [ प्रधानमंत्री ]
यदि कोई हिन्दू व्यक्ति स्वयं को गैर हिन्दू कहता है तो उसका अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति का स्थान इस कानून से प्रभावित नहीं होगा। यदि कोई अन्य कानून उसकी इस सामाजिक स्थिति को प्रभावित कर रहा हो, केवल तभी यह प्रभावित हो सकता है।
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4.3 [ अध्यक्ष अथवा अध्यक्ष द्वारा नियुक्त अधिकारी ]
यदि कोई व्यक्ति धर्म परिवर्तन कर मुस्लिम या क्रिश्चियन बन जाता है तो अध्यक्ष उसका नाम मतदाता सूची से 1 वर्ष के बाद हमेशा के लिए हटा देगा, यदि वह इस समय के अंदर फिर से धर्म परिवर्तन कर के हिन्दू नहीं बनता। उस 1 वर्ष के समय में वह मतदान नहीं कर सकता। फिर से हिंदू बनने के बाद व्यक्ति दोबारा अपना नाम इस मतदाता सूची में डलवाने की अर्जी दे सकता है | साथ हीं यदि वह दोबारा धर्म परिवर्तन करता है तो ऐसी स्थिति में उसका नाम मतदाता सूची से बिना 1 वर्ष बीतने की प्रतीक्षा किये हमेशा के लिए हटा दिया जायेगा। किसी प्रकार के विवाद की स्थिति में जूरी का निर्णय ही अंतिम होगा।
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4.4 [ अध्यक्ष ]
यदि कोई क्रिश्चियन या मुस्लिम व्यक्ति धर्म परिवर्तन कर हिन्दू बनना चाहता है तो जूरी द्वारा उसकी पहचान की पुष्टि तथा अनुमोदन के बाद तथा सभी ट्रस्टियों के अनुमोदन के बाद अध्यक्ष उसका नाम मतदाता सूची में शामिल करेगा।
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खण्ड - 5 : दान, आय तथा टैक्स
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5.1 ट्रस्ट किसी व्यक्ति अथवा अवैयक्तिक संस्था अथवा विदेशी व्यक्ति या संस्था से दान प्राप्त कर सकता है। साथ ही ट्रस्ट किसी भी व्यावसायिक गतिविधि में भी किसी भी कॉर्पोरेशन की तरह हीं भाग ले सकता है।
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5.2 [ प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री ]
प्रधान मंत्री तथा मुख्यमंत्री आय कर, संपत्ति कर तथा अन्य कर जो ट्रस्ट पर लागू हो रहे हैं, उनसे ले सकते हैं।
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5.3 [ सभी ]
दान पर टैक्स : चंदे की रकम पर लगने वाला टैक्स अधिकतम टैक्स की दर में से दानकर्ता द्वारा पिछले वर्ष चुकाया गया अधिकतम टैक्स की दर को घटाने पर प्राप्त दर के अनुसार होगा। नकद दान तथा विदेशी दान पर टैक्स अधिकतम दर से लगाया जायेगा।
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(स्पष्टीकरण - ये एक प्रकार से टैक्स देने वाले व्यक्तियों के लिए टैक्स की छूट है ताकि लोगों को टैक्स चुकाने की प्रेरणा मिले | उदहारण - यदि अधिकतम टैक्स की दर 30% है और भारतीय दानकर्ता ने चेक से पिछले वर्ष 20% अपनी आय पर टैक्स दिया था, तो उसे दिए गए दान पर 10% टैक्स लगेगा)
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5.4 [ सभी ]
करों में छूट : नागरिकों द्वारा दी गयी छूट की यूनिटों को प्रति यूनिट वित्त मंत्री द्वारा निर्णय की गयी रकम में गुना करने पर जो रकम प्राप्त होगी, ट्रस्ट को टैक्स में उतनी हीं छूट मिलेगी । नागरिक ट्रस्ट को कर-राहत यूनिट तलाटी के कार्यालय में स्वयं उपस्थित होकर अथवा एस.एम.एस या ए.टी.एम द्वारा दे सकता है, तथा यह वित्त मंत्री द्वारा निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार होगा।
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खण्ड - 6. जनता की आवाज
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6.1 [जिला कलेक्टर]
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यदि कोई नागरिक इस कानून में परिवर्तन चाहता हो तो वह जिला कलेक्टर के कार्यालय में जाकर एक शपथपत्र प्रस्तुत कर सकता है और जिला कलेक्टर या उसका क्लर्क इस ऐफिडेविट को नागरिक के वोटर आई.डी. नंबर के साथ 20 रूपए प्रति पृष्ठ की दर से फ़ीस लेकर प्रधानमंत्री की वेबसाईट पर स्कैन करके डाल देगा ताकि कोई भी व्यक्ति उस एफिडेविट को बिना लॉग-इन देख सके।
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6.2. [ तलाटी/पटवारी/लेखपाल ]
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यदि कोई नागरिक इस कानून अथवा इसकी किसी धारा पर अपनी आपत्ति दर्ज कराना चाहता हो अथवा ऊपर के खण्ड में प्रस्तुत किसी भी शपथपत्र पर हां/नहीं दर्ज कराना चाहता हो तो वह अपना मतदाता पहचान पत्र के साथ तलाटी के कार्यालय में जाकर 3 रूपए का शुल्क जमा कराएगा। तलाटी नागरिक की हां/नहीं दर्ज कर लेगा और उसे इसकी रसीद देगा। इस हां/नहीं को प्रधानमंत्री की वेबसाईट पर नागरिक के वोटर आई.डी. नंबर के साथ डाल दिया जाएगा।
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=======ड्राफ्ट की समाप्ति=========
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सैक्शन G. राज्य हिन्दू देवालय प्रबंधक ट्रस्ट (RHDPT) :
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ये अधिनियम तब लागू होगा जब मुख्यमंत्री इस ड्राफ्ट को राजपत्र में छापेंगे। यदि मुख्यमंत्री इसे छापने से मना करते हैं तो प्रधानमंत्री राष्ट्रपति शासन की घोषणा कर सकते हैं तथा फिर राज्यपाल के माध्यम से इस अधिनियम को राजपत्र में छपवा सकते हैं।
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यह ड्राफ्ट राष्ट्र हिंदू देवालय प्रबंधक ट्रस्ट (NHDPT) की तरह हीं है, अंतर सिर्फ इतना है कि इसके अंतर्गत सदस्य वैसे हिन्दू होंगे जो सम्बंधित राज्य की सीमा के अंदर 6 माह से अधिक से निवास कर रहे हों अथवा मूल रूप से उस राज्य के निवासी हों। अर्थात प्रत्येक हिन्दू व्यक्ति के पास चयन का विकल्प होगा कि वह दोनों में से किस 'राज्य हिंदू देवालय प्रबंधक ट्रस्ट' (RHDPT) का सदस्य बनना चाहता है। लेकिन एक व्यक्ति एक ही समय में दो राज्यों के 'राज्य हिंदू देवालय प्रबंधक ट्रस्ट' (RHDPT) का सदस्य नहीं हो सकता। तथा यदि वह सदस्यता बदलता है तो नयी सदस्यता 6 माह के बाद हीं चालू होगी।
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इस ट्रस्ट के अंदर वे मंदिर आयेंगे जो उस राज्य सरकार के पास हैं या वे ट्रस्ट जो उस राज्य के 'राज्य हिंदू देवालय प्रबंधक ट्रस्ट' के अधीन आना चाहते हैं |
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