Monday, November 30, 2015

Tamil saying --- Makkal Therapu , Mahasan Therpu -- means voice of people is voice of God (28-Nov-2015) No.3

November 28, 2015 No.3

https://www.facebook.com/mehtarahulc/posts/10153150879661922

Tamil saying --- Makkal Therapu , Mahasan Therpu -- means voice of people is voice of God
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Urdu / Farsi / Arabic saying --- awaaz e kalq , nagada e khuda --- again, means --- voice of people is voice of god
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Latin saying --- Vox populi , vox dei -- voice of people is voice of god
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Is there any such saying in Sanskrit?:

am reading a magazine which says , that Yajurvedsays that "dhan kisi rashtra ka nahi , kintu sampurna rashtra ka hei" (28-Nov-2015) No.2

November 28, 2015 No.2

https://www.facebook.com/mehtarahulc/posts/10153150933871922

am reading a magazine which says , that Yajurvedsays that "dhan kisi rashtra ka nahi , kintu sampurna rashtra ka hei" !! i.e. "wealth doesnt belong to a person, but it belongs to whole nation" !!
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Does Yajurved say so? If yes, which shloka number? And whats the exact snaskrit text?

Pls wiki/google on . Quorum sensing in bacteria , ants . Quorum quenching (28-Nov-2015) No.1

November 28, 2015 No.1

https://www.facebook.com/mehtarahulc/posts/10153150970736922

Pls wiki/google on 
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Quorum sensing in bacteria , ants
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Quorum quenching

301.H006, भाग- २ ; राइट टू रिकॉल प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री आदि के विरूद्ध दिए जाने वाले तर्कों का जवाब (29-Nov-2015) No.1

November 29, 2015 No.1

https://www.facebook.com/mehtarahulc/posts/10153152242326922

301.H006, भाग- २ ; राइट टू रिकॉल प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री आदि के विरूद्ध दिए जाने वाले तर्कों का जवाब

301.H006, भाग- २ ; राइट टू रिकॉल प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री आदि के विरूद्ध दिए जाने वाले तर्कों का जवाब
( राईट टू रिकॉल पार्टी का घोषणा पत्र - अध्याय - 6 : इस अध्याय का मूल अंग्रेजी संस्करण https://www.facebook.com/groups/righttorecallparty/10152114637883103/ पर देखा जा सकता है)
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नोट* - राईट टू रिकॉल प्रक्रियाओं का विस्तृत विवरण इसी अध्याय के बिंदु (6.1 से 6.21) में किया गया है। अध्याय 6 का पहला भाग इस लिंक पर देखें -- https://web.facebook.com/notes/pawan-kumar-jury/844143269037244
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अध्याय
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(6.22) राइट टू रिकॉल के विरूद्ध दिए जाने वाले तर्कों का जवाब। . (6.23) उन पदों की सूची जिन पर राइट टू रिकॉल ग्रुप ने राइट टू रिकॉल का प्रस्ताव किया है। . (6.24) राईट टू रिकाल के विरोधी एवं नकली राईट टू रिकाल -समर्थको के लक्षण, चिन्ह और चालें। . (6.25) कृपया प्रक्रियाओं और क़ानून-ड्राफ्ट पर ध्यान केंद्रित करें ना कि कानूनों के नाम या व्यक्तियों पर जिसने ये क़ानून-ड्राफ्ट बनाएँ हैं, क्योंकि नाम धोखा दे सकते है। . (6.26) प्रजा अधीन राजा/राईट टू रिकाल अगले जन्म में ! . (6.27) समीक्षा प्रश्न . (6.28) अभ्यास .
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(6.22) राइट टू रिकॉल के विरूद्ध दिए जाने वाले तर्कों का जवाब
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पश्चिमी देशों की व्यवस्था में सुधार आये क्योंकि वहाँ निष्कासन प्रक्रिया (ज्यूरी तथा रिकॉल विधि) तथा जनता को भरपूर हथियार देकर ताकतवर बनाया गया था। पश्चिमी नागरिकों के विकास के केवल ये ही दो प्रमुख कारण थे। भारत के बुद्धिजीवियों ने इन दोनों ही बातों का विरोध किया है। अर्थात उन्होंने भारत में जनता के सशस्त्र होने का विरोध किया। साथ ही साथ रिकॉल और ज्यूरी प्रक्रियाओं का भी विरोध किया। दूसरे शब्दों में, भारत के बुद्धिजीवियों ने यह सुनिश्चित किया है कि भारत की जनता कमजोर, विनम्र तथा गरीब बनी रहे तथा इसके बाद वे इनकी दुर्दशा का आरोप ‘राजनैतिक सभ्यता’ की झूठी कहानीयों पर मढ़ते रहें। . अब मैं पाठकों से अनुरोध करता हूँ कि वे ध्यान दें कि, किस प्रकार ये भारतीय “बुद्धिजीवी” छात्रों को झूठों का पुलिन्दा थमाते हैं या फिर आधा-अधूरा सच बताते हैं |
(1) भारत के बुद्धिजीवी छात्रों को इस बारे में कोई जानकारी नहीं देते कि यूरोप में कोरोनर ज्यूरी सिस्टम आने के बाद से ही वहाँ की पुलिस में सुधार आया, जिससे आम नागरिकों क्रूर अधिकारियों को उनके पदों से हटा सकते थे। केवल इसी ज्यूरी सिस्टम के आने के बाद ही पुलिसकर्मियों की क्रूरता/उत्पीड़न तथा जनता को लूटने की घटनाओं में कमी आई तथा अमेरिका में समृद्धि आनी शुरू हुयी।
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(2) भारत के बुद्धिजीवियों ने छात्रों को इस तथ्य के बारे में कोई जानकारी नहीं दी कि ज्यूरी और रिकॉल के तरीके का अधिक से अधिक प्रयोग किया जाना ही अमेरिकी जिला तथा राज्य प्रशासन में कम भ्रष्टाचार के पीछे सबसे प्रमुख कारण है।
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(3) भारत के बुद्धिजीवियों ने छात्रों/कार्यकर्ताओं को इस तथ्य से वंचित रखा कि 1930 के दशक में अमेरिका की संघीय सरकार ने कल्याणकारी राज्य का निर्माण केवल इस कारण से किया कि वहां की जनता पूर्ण रूप से अस्त्र शस्त्र सुसज्जित थी। इसके बजाय भारत के बुद्धिजीवियों ने ये अफवाह फैलाई कि 1930 के दशक में कल्याण राज्य का उदय इस कारण हुआ कि वहाँ के नागरिकगण अनुभवी और समझदार थे। इस प्रकार गरीबी का सारा आरोप वे भारत के गरीबों पर ही डाल देते हैं।
सार ये है कि भारत के बुद्धिजीवी भारतीय लोकतंत्र को बौना ही बनाये रखने पर जोर देते हैं – जिसमें कोई रिकॉल प्रणाली न हो, ज्यूरी प्रणाली न हो, प्रशासनिक तथा न्यायतंत्र के लिए कोई चुनाव न हो तथा हम आम नागरिको के पास हथियार न हो। और जब लोकतंत्र न होने की कमी की वजह से गरीबी से मौतें होती हैं, भ्रष्टाचार बढ़ता है तथा सैन्य कमजोरी बढ़ती है तो वे तुरंत हम आम जनता पर, हमारी राजनैतिक संस्कृ्ति पर तथा धर्म पर दोष मढ़ देते है।
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(6.23) उन पदों की सूची जिन पर राइट टू रिकॉल ग्रुप ने राइट टू रिकॉल (भ्रष्ट को बदलने का अधिकार) का प्रस्ताव किया है। (* का अर्थ है - नए पद)
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1. प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, महापौर, जिला सरपंच, तहसील सरपंच, ग्राम सरपंच
2. उच्चतम न्यायलय के मुख्य जज, मुख्य उच्च न्यायलय के मुख्य जज, जिला न्यायलय प्रमुख जज
3. उच्चतम न्यायलय के चार वरिष्ठम जज, उच्च न्यायलय के चार जज, चार वरिष्ठतम जिला जज
4. भारतीय जूरी प्रशासक*, राज्य जूरी प्रशासक*, जिला जूरी प्रशासक*
5. राष्ट्रीय भूमि किराया अधिकारी*, राज्य भूमि किराया अधिकारी*
6. सांसद, विधायक, पार्षद, जिला पंचायत सदस्य, तहसील पंचायत सदस्य, ग्राम पंचायत सदस्य
7. गवर्नर, भारतीय रिजर्व बैंक, राज्य मुख्य लेखाकार, जिला मुख्य लेखाकार
8. अध्यक्ष, भारतीय स्टेट बैंक, अध्यक्ष, राज्य सरकार बैंक
9. सालिसिटर जनरल ऑफ इंडिया, (भारत की सरकार की तरफ से अदालतों में स्वयं या सहायक द्वारा हाजिर होने वाला वकील ; सरकारी न्यायिक एजेंट या महा न्यायाभिकर्ता), भारत का महान्यायवादी (भारत सरकार का मुख्य कानूनी सलाहकार), सालिसिटर जेनरल ऑफ स्टेट (राज्य महान्यायवादी), जिला मुख्य दण्डाधिकारी, जिला सिविल अधिवक्ता (न्यायालय आदि में नागरिकों के पक्ष का समर्थन करनेवाला)
10. अध्यक्ष, भारतीय चिकित्सा परिषद्, अध्यक्ष, राज्य चिकित्सा परिषद्
11. गृह मंत्री-भारत, निदेशक-सी बी आई, गृह मंत्री-राज्य, निदेशक-सी आई डी, जिला पुलिस आयुक्त
12. वित्त मंत्री-भारत, वित्त मंत्री-राज्य
13. शिक्षामंत्री-भारत ,राष्ट्रीय पाठ्यपुस्तक अधिकारी, शिक्षामंत्री, राज्य पाठ्यपुस्तक अधिकारी, जिला शिक्षा अधिकारी
14. भारत-स्वा्स्थ्य मंत्री, राज्य स्वास्थ्य मंत्री, जिला स्वास्थ्य अधिकारी
15. अध्यक्ष-यूजीसी, विश्वविद्यालय कुलपति, प्रधानाचार्य-वार्ड स्कूल
16. कृषि मंत्री-भारत, कृषि राज्य मंत्री
17. भारतीय नागरिक आपूर्ति मंत्री, राज्य नागरिक आपूर्ति मंत्री, जिला आपूर्ति अधिकारी
18. भारत के नियंत्रक एवं महालेखाकार (CAG), राज्य मुख्य लेखा-परीक्षक, जिला मुख्य लेखा-परीक्षक
19. नगर आयुक्त/कमिश्नर
20. राष्ट्रीय बिजली मंत्री, राज्य बिजली मंत्री, जिला विद्युत –आपूर्ति अधिकारी
21. अध्यक्ष-केन्द्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड, अध्यक्ष-केन्द्रीय अप्रत्य्क्ष कर बोर्ड, राज्य टैक्स वसूली अधिकारी, जिला कराधान अधिकारी
22. रेल मंत्री, राज्य परिवहन मंत्री, नगर परिवहन अधिकारी
23. दूरसंचार नियामक
24. केन्द्रीय बिजली नियामक, राज्य विद्युत नियामक
25. केन्द्रीय संचार मंत्री, राज्य संचार मंत्री (*), जिला संचार केबल अधिकारी (*)
26. जिला जलापूर्ति अधिकारी (*)
27. केन्द्रीय चुनाव आयुक्त /कमिश्नर, राज्य चुनाव आयुक्त
28. राष्ट्रीय पेट्रोलियम मंत्री, राज्य पेट्रोलियम मंत्री
29. राष्ट्रीय कोयला मंत्री, राष्ट्रीय खनिज मंत्री, राज्य कोयला मंत्री, राज्य खनिज मंत्री
30. अध्यक्ष, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, अध्यंक्ष-राज्य पुरातत्व सर्वेक्षण
31. अध्यक्ष-राष्ट्रीय इतिहास परिषद्, अध्यक्ष-राज्य इतिहास परिषद्
32. अध्यक्ष-लोक सेवा आयोग, अध्यक्ष-राज्य लोक सेवा आयोग
33. अध्यक्ष-केन्द्रीय भर्ती बोर्ड, अध्यक्ष-राज्य भर्ती बोर्ड, जिला भर्ती बोर्ड अध्यक्ष
34. अध्यक्ष-राष्ट्रीय महिला आयोग, अध्यक्ष-राज्य महिला आयोग, अध्यक्ष-जिला महिला आयोग
35. अध्यक्ष-राष्ट्रीय दलित अत्याचार रोकथाम संस्था (दलित मतदातागण इन्हें हटा सकते हैं), अध्यक्ष-राज्य दलित उत्पीड़न निवारण आयोग, अध्यक्ष-जिला दलित उत्पीड़न निवारण आयोग
36. राष्ट्रीय पूर्ती आयुक्त (जरूरतमंद लोगों के लिए सरकारी संस्था ), राज्य पूर्ती आयुक्त
37. अध्यक्ष-राष्ट्रीय बार समुदाय परिषद्, राज्य बार समुदाय परिषद् अध्यक्ष, जिला बार समुदाय परिषद् अध्यक्ष
38. राष्ट्रीय लोकपाल, राज्य लोक आयुक्त, जिला लोक आयुक्त
39. राष्ट्रीय सूचना कमिश्नर/आयुक्त, राज्य सूचना आयुक्त, जिला सूचना आयुक्त
40. राज्य- अपमिश्रण नियंत्रक अधिकारी, जिला अपमिश्रण नियंत्रक अधिकारी
41. संपादक, राष्ट्रीय समाचारपत्र संपादक, राज्य समाचारपत्र संपादक, जिला समाचारपत्र
42. संपादक, राष्ट्रीय महिला समाचारपत्र (महिला मतदाताओं द्वारा हटाया जा सकता है), संपादक-राज्य महिला समाचारपत्र (महिला मतदाताओं द्वारा हटाया जा सकता है), संपादक-जिला महिला समाचारपत्र (महिला मतदाताओं द्वारा हटाया जा सकता है)
43. दूरदर्शन-अध्यक्ष, राज्य दूरदर्शन अध्यक्ष, जिला चैनल अध्यक्ष
44. अध्यक्ष-आकाशवाणी, अध्यक्ष-राज्य रेडियो चैनल, अध्यक्ष-जिला रेडियो चैनल
45. अध्यक्ष-राष्ट्रीय पहचान पत्र प्रणाली, अध्यक्ष-राज्य पहचान पत्र प्रणाली
46. अध्यक्ष-राष्ट्रीय जमीन-रिकॉर्ड सिस्टम, अध्यक्ष-राज्य भूमि अभिलेख प्रणाली, अध्यक्ष-जिला भूमि अभिलेख प्रणाली
47. अध्यक्ष-लोक सभा, अध्यक्ष-राज्य सभा, अध्यक्ष-विधान सभा, अध्यक्ष-विधान परिषद्, अध्यक्ष-जिला पंचायत, अध्यक्ष-तहसील पंचायत
48. अध्यक्ष-तेल एवं प्राकृतिक गैस आयोग, अध्यक्ष-हिन्दुस्तान पेट्रोलियम कारपोरेशन लिमिटेड, अध्यक्ष-राज्य पेट्रोल निगम
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यह सूची 7 मई, 2010 की तिथि के अनुसार है। यह सूची केवल बढ़ेगी ही, घटेगी नही।
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(6.24) राईट टू रिकाल के विरोधी एवं नकली राईट टू रिकाल -समर्थको के लक्षण, चिन्ह और चालें
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कार्यकर्ता मित्रों , . कृपया ध्यान दें कि अभी राईट टू रिकाल/प्रजा अधीन-राजा नाम लोगों में बढ़ता जा रहा है | इससे नेताओं पर राईट टू रिकाल के बारे में बात करने के लिए कार्यकर्ताओं द्वारा दबाव बन रहा है | इसीलिए, नेता राईट टू रिकाल के बारे में बात करने पर मजबूर हो जाते हैं | लेकिन 'आम-नागरिक-विरोधी' लोग असल में भ्रष्ट को नागरिको द्वारा बदलने/सज़ा देने की प्रक्रियाएँ नहीं चाहते | उनको परवाह नहीं है कि देश विदेशी कंपनियों और विदेशी लोगों के हाथ बिक जायेगा और 99% देशवासी लुट जाएँगे | पिछले 65 सालों से लोग ऐसी प्रक्रियाएँ मांग रहे हैं, जिसके द्वारा आम नागरिक भ्रष्ट को बदल सकते हैं/सज़ा दे सकते हैं। कार्यकर्ता ऐसी पारदर्शी शिकायत प्रणाली की भी मांग कर रहे है, जो शिकायत किसी के भी द्वारा, कभी भी और कहीं भी देखी जा सके और कभी भी जाँची जा सके। ताकि कोई नेता, बाबू, कोई जज या मीडिया उसे दबा नहीं सके | . लेकिन राईट टू रिकाल के विरोधी इन मांगो को दबाते आ रहे हैं | इसके लिए वे जिन तरीकों का इस्तेमाल करते हैं, उन में से कुछ की लिस्ट यहाँ नीचे दी गयी है।
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(1) क़ानून-ड्राफ्ट लिखना तो दूर की बात है, वे अपने कार्यकर्ताओं को क़ानून-ड्राफ्ट की बात करने और क़ानून-ड्राफ्ट पढ़ने के लिए भी मना करते है !!
वे हवा में बात करते है। ना तो वो किस देश और जगह की प्रक्रिया की बात कर रहे है यह बताते है, ना ही उसका नाम बताते है, और न ही उसका ड्राफ्ट देते है | क़ानून-ड्राफ्ट को पढ़ना और लिखना वकीलों का काम नहीं है, ना ही जजों का, ना ही सांसदों का, लेकिन नागरिकों का काम है !! जी हाँ, नागरिकों को ही क़ानून-ड्राफ्ट सांसदों को देना होता है ताकि सांसद क़ानून-ड्राफ्ट पास करवा सके | वकीलों का काम क़ानून-ड्राफ्ट बनाना नहीं है, उनका काम मामले लड़ना है, जजों का काम क़ानून बनाना नहीं, उनका काम फैसले देना है | 'प्रजा अधीन-राजा' के विरोधी बुद्धिजीवी नागरिको को क़ानून-ड्राफ्ट पढ़ने से रोकते हैं तथा कार्यकर्ताओं को स्कूल चलाना, योग सीखाना, विपक्ष के पार्टियों या अन्य नेताओं के खिलाफ नारे लगाना ,किसी उम्मीदवार के लिए चुनाव प्रचार-अभियान करना ,चरित्र विकास आदि अनुपयोगी गतिविधियाँ करने के लिए प्रेरित करते है। लेकिन एक बार भी कार्यकर्ताओं को क़ानून-ड्राफ्ट पढ़ने के लिए नहीं कहते , उन पर चर्चा करना तो दूर की बात है| . मेरा सुझाव है कि आप क़ानून-ड्राफ्ट पढ़ना शुरू कर दें और उन पर अपनी राय भी दें | कुछ क़ानून-ड्राफ्ट पढ़ने के बाद और उन पर राय देने के बाद आप ड्राफ्ट लिख भी पायेंगे | यदि आम नागरिक अपने इस कर्तव्य का पालन शुरू कर दें तो कोई भी गलत और जन-विरोधी क़ानून जनता पर नही थोपा जा सकेगा |
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(2) प्रजा अधीन-राजा के विरोधी और जाली प्रजा अधीन-राजा समर्थक कभी भी सही तुलना और विश्लेषण नहीं करेंगे | वे कुछ ऐसे दो मुश्किल शब्दों का इस्तेमाल करते हैं, जिससे दूसरा व्यक्ति चकरा जाये और निराश हो जाये और फिर कभी भी क़ानून-ड्राफ्ट को ना तो पढ़े , न ही चर्चा करे !!
वे हमेशा एक-तरफ़ा चर्चा करेंगे | कृपया उनको किसी भी मानी गयी परिस्थिति के लिए तुलना करने के लिए कहें। पहले वर्त्तमान क़ानून के अनुसार उस पारिस्थि को देखें , फिर यदि उनका पसंद का क़ानून-ड्राफ्ट लागू होता है, या फिर जब `प्रजा-अधीन-राजा` के क़ानून-ड्राफ्ट या अन्य ड्राफ्ट लागू होते हैं उस पारिस्थि की तुलना करें और फैसला करें कि कौन से ड्राफ्ट देश के लिए फायदा करेंगे और कौन से देश को नुकसान करेंगे |
उदाहरण के लिए --- जाली 'प्रजा अधीन राजा-समर्थक' अक्सर कहते हैं कि यदि राईट टू रिकॉल प्रक्रियाएं लागू होती है तो करोड़ों लोगों को ख़रीदा जा सकता है, लेकिन वे कभी भी इसकी तुलना अपने पसंद के क़ानून-ड्राफ्ट या आज के क़ानून–ड्राफ्ट या तरीकों से नहीं करते। क्योंकि उनके द्वारा सुझाई गयी प्रक्रियाओं में शक्ति कुछ ही लोगो के पास केंद्रित होती हैं। इससे विदेशी कंपनियों और धनिकों के लिए प्रशासन को काबू में रखना आसान हो जाता है।
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(3) वे हमेशा कहते हैं कि वे राईट टू रिकाल का समर्थन करते है, लेकिन कभी भी यह नहीं बताते कि कौन से पद के लिए वे 'प्रजा अधीन राजा' का समर्थन करते हैं ?
प्रजा अधीन-सरपंच, प्रजा अधीन-महापौर जैसे चिल्लर पदों के लिए या प्रजा अधीन-प्रधानमंत्री, प्रजा अधीन-लोकपाल या प्रजा अधीन-मुख्यमंत्री जैसे महत्त्वपूर्ण पदों के लिए। वे छोटे पदों के लिए अभी राईट टू रिकाल लाना चाहेंगे और ऊपर के पदों के लिए अगले जन्म में राईट टू रिकाल लाने की बात करेंगे | उनसे यह साफ़ करने के लिए कहें कि वो कौन से पद पर राईट टू रिकाल का समर्थन करते हैं और उसका क़ानून-ड्राफ्ट देने को कहे जिसका वे समर्थन करते हैं | हम उच्च-पदों के लिए आज और अभी राईट टू रिकाल चाहते है।
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(4) वे कहते है कि, वे राईट टू रिकाल का समर्थन करते है, लेकिन उसे 'बाद में' लायेंगे (मतलब अगले जन्म में) |
इसके लिए कुछ बहाने जो वो बोलते है - क) अभी सरकार इसको पास नहीं करेगी --- 'प्रजा अधीन-राजा' के विरोधियों से पूछें कि क्या हमें सरकार की इच्छा के हिसाब से चलना चाहिए कि करोड़ों लोगों की इच्छा के अनुसार ? ख) सभी क़ानून सुधार एक साथ नहीं आ सकते ----- प्रजा अधीन-राजा के विरोधियों से कहें कि लोग 50-100 सालों के लिए इन्तजार नहीं करना चाहते, सभी कानूनों में सुधार अभी चाहिए | यदि देश में पारदर्शी शिकायत प्रणाली आ जाये तो सभी सुधार कुछ ही महीनों में आ जाएँगे |
ग) हमारी एकता भंग हो जायेगी --- उनसे कहें कि हम एकता ही चाहते है, इसीलिए ये जन-हित की धाराएं आपके ड्राफ्ट में जोड़ने के लिए कह रहे है | और यदि वे एकता चाहते है, तो पारदर्शी शिकायत प्रणाली को क्यों नहीं लागू करवाते ,जो देश के लोगों को एक होने में मदद करता है | घ) हम पहले सांसद चुन कर सरकार लायेंगे फिर 'प्रजा अधीन-सांसद' के ड्राफ्ट बनायेंगे और ये क़ानून लायेंगे ---- उनसे कहें कि कभी नागरिकों के नौकर, सांसद, मंत्री, प्रधानमंत्री आदि अपने ऊपर अपने 120 करोड़ मालिकों की लगाम आने देंगे ? वे तो सत्ता में आने के बाद विदेशी कंपनी से रिश्वत के पैसे लेकर राईट टू रिकाल को रद्दी में डाल देंगे | ये क़ानून तो केवल देश के करोड़ों नागरिकों द्वारा जनता के नौकरो पर दबाव बना कर ही लाये जा सकते है | इसीलिए उनसे कहें कि अभी सांसदों से या अपनी पार्टी से कहें कि अपनी पार्टी के घोषणा-पत्र में 'प्रजा अधीन-सांसद' आदि के ड्राफ्ट डालें |
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(5) प्रजा अधीन-राजा के विरोधी कहेंगे कि, एक नेता को समर्थन करो, जो क़ानून-ड्राफ्ट को लागू कराएगा और वो बोलते हैं कि उस नेता के सार्वजनिक काम पर कोई भी न बोले क्योंकि उन्हें लगता है कि इससे उनके पसंद के नेता की बदनामी हो रही है |
कृपया उनको बताएं कि ड्राफ्ट हमारा नेता है | बिना ड्राफ्ट के, सरकारी सिस्टम में कोई भी बदलाव संभव नहीं है | उनसे पूछें कि क़ानून-ड्राफ्ट पर अपना रुख बताएं, कि क्या वे उसको समर्थन करते हैं या विरोध करते हैं | यदि वे हमारे नेता-ड्राफ्ट का समर्थन करते हैं, तो उनको कहें कि हमारे नेता-ड्राफ्ट को अपने नेता से मिलवाएं और उनके नेता से पूछें कि वो क़ानून-ड्राफ्ट का समर्थन करते हैं या विरोध | हम कोई भी व्यक्तिगत टिपण्णी नहीं करते हैं जैसे 'क.ख.ग' का चरित्र ऐसा है, या 'क.ख.ग' के माता-पिता ऐसे है आदि | हम केवल उनके सार्वजनिक काम पर टिपण्णी करते है, कि वो ईमानदार है या बेईमान। उसी तरह जिस तरह लोग सड़क-बनने के देख-रेख करने वाले निरीक्षक के काम पर बोलते है | अब यदि आप कहते हो कि सड़क-बनाने वाले पर कोई टिपण्णी ना करें ,तो पहले तो आप अपना नागरिक का काम नहीं कर रहे, और हम को भी अपना कर्तव्य करने से रोक रहे हैं, जो कि देश के लिए खतरनाक है |
क्या ये पक्षपात नहीं है कि, यदि मैं उन सरकारी नौकरों पर बात करूँ जो मेरे सम्बन्ध में नहीं हैं, या जिन्हे मैं पसंद नहीं करता और उन सरकारी नौकरों पर नहीं बोलूं जो मुझे अच्छे लगते हैं या मेरे सम्बन्ध में है ? देश ज्यादा जरूरी है या व्यक्ति ?
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(6) प्रजा अधीन-राजा के विरोधी कहते है कि वे प्रजा अधीन-राजा का समर्थन करते हैं, लेकिन कभी भी उसको समर्थन करने या उसके क़ानून-ड्राफ्ट लागू करवाने के लिए कुछ भी नहीं करते |
उनको बोलें कि अपने प्रोफाइल नाम के पीछे लिखें 'प्रजा अधीन-लोकपाल' या 'राईट टू रिकाल नागरिकों द्वारा' आदि | उनको प्रक्रियाएँ/तरीकों के बारे में पर्चे बांटने के लिए कहें। या उनको समाचार-पत्र में विज्ञापन देने के लिए कहें और उनके नेता, सांसद, विधायक आदि से उनके 'प्रजा अधीन-राजा के ड्राफ्ट' के बारे में रुख साफ़ करने के लिए पूछे और इन क़ानून-ड्राफ्ट्स की धाराओं को अपने कानूनों या घोषणा पत्र में जोड़ने के लिए कहे | और उनको बोलें कि अपनी संस्था के लोगों को प्रजा अधीन-राजा के क़ानून-ड्राफ्ट के बारे में बताएं | और उनको पूछें कि वे क्या कर रहे हैं, इन क़ानून-ड्राफ्ट को लागू करने के लिए |
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(7) नकली प्रजा अधीन-राजा -समर्थक कोशिश करेंगे आप को बेकार के, बिना क़ानून-ड्राफ्ट की चर्चा में उलझाने के, और आपका वह समय बरबाद करने के लिए, जो समय आप दूसरे नागरिको को क़ानून-ड्राफ्ट के बारे में बताने में लगा सकते हो |
समय-बरबाद करने वाली बिना क़ानून-ड्राफ्ट की चर्चाओं पर बात करने के लिए साफ़ मना कर दो | प्रजा अधीन-राजा के विरोधी को बोलें कि पहले ड्राफ्ट पढ़ें | उसको क़ानून-ड्राफ्ट दें | और उनको बोलें कि अपनी बात रखते समय धाराओं का जिक्र करे |
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(8) नकली प्रजा अधीन-राजा-समर्थक घंटो-घंटो देश की समस्याओं पर बात करेंगे, लेकिन एक मिनट भी समाधान पर बात नहीं करेंगे और कभी भी वे क़ानून-ड्राफ्ट नहीं देगें जिनसे गरीबी, भ्रष्टाचार आदि समस्याएं कम हो |
वे कुछ प्रस्ताव जरुर देंगे, लेकिन ड्राफ्ट देने से इंकार कर देंगे | उनको कहें कि उनके प्रस्तावों के लिए ड्राफ्ट देवें जो देश की मुख्य समस्याओं जैसे गरीबी, भ्रष्टाचार आदि का समाधान करे। क्योंकि सरकार में लाखों कर्मचारी होते है, और इन कर्मचारियों को प्रस्तावों को लागू करने के लिए आदेश या क़ानून-ड्राफ्ट चाहिए होते है | प्रस्ताव उतने ही अच्छे या बुरे होते हैं जितने कि उनके ड्राफ्ट |
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(9) नकली प्रजा अधीन-राजा-समर्थक स्पष्ट रुख नहीं लेते कि वे प्रजा अधीन-राजा समूह के उन ड्राफ्ट्स का समर्थन या विरोध करते है जो करोड़ों लोगों के हित में है या उन ड्राफ्ट्स का जो कुछ ही विशिष्ट लोगों का फायदा करते है |
उदाहरण -- उनको पूछे कि वे 'बिना राईट टू रिकाल-लोकपाल' क़ानून-ड्राफ्ट का समर्थन करते है या विरोध करते है या वो 'राईट टू रिकाल-लोकपाल' ड्राफ्ट का समर्थन करते है या विरोध करते है | वे कोई साफ़ रुख इसीलिए प्रकट नहीं करते क्योंकि उनका अपना स्वार्थ होता है। क्योंकि यदि वे कहेंगे कि वे 'प्रजा अधीन-लोकपाल' की प्रक्रिया का समर्थन करते है तो उनके प्रायोजक उन्हें पैसे देना बंद कर देंगे और पेड मिडिया उनकी खबरें दिखाना बंद कर देगा | और यदि वे कहते हैं कि 'प्रजा अधीन-राजा' की प्रक्रियाओं का विरोध करते है, तो उनकी पोल खुल जायेगी कि वे आम नागरिक-विरोधी है | इसीलिए वे कोई साफ़ जवाब नहीं देते और टालमटोल करते है | . कभी भी चर्चा में आगे न बढ़ें , जब तक कि प्रजा अधीन-राजा के विरोधी का रुख साफ़ न हो जाये, क्योंकि ऐसी चर्चाएं केवल समय की बर्बादी ही होगी। समय जो आप इस्तेमाल कर सकते हैं दूसरे नागरिकों को 'प्रजा अधीन-राजा' की प्रक्रियाओं के बारे में जानकारी देने के लिए | और एक बार जब अमुक व्यक्ति अपना रुख स्पष्ट कर देता है, तभी चर्चा में आगे बढ़ें। और फिर उनको कहें कि अपनी बात रखने के साथ वे बताएं कि कौन से ड्राफ्ट और धाराओं के बारे में बात कर रहे हैं |
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(10) प्रजा अधीन-राजा के विरोधी बहुत बार ये दावा करते हैं कि भ्रष्ट को नागरिकों द्वारा बदलने`की प्रक्रियाएं “संभव नहीं” है या “संविधान के खिलाफ” है |
उनसे सबसे पहले पूछें कि ये साफ़ करें कि वे कौन सी प्रक्रिया की बात कर रहे है | और उनसे उस धारा को बताने के लिए कहे जो संविधान के विरुद्ध है और अमुक प्रस्तावित धारा संविधान के कौन सी धारा के विरुद्ध है | उनको पूछें कि प्रस्तावित प्रजा अधीन-राजा की प्रक्रिया में से कौन सी धारा लागू करना सम्भव नहीं है और कैसे ? क्या इसीलिए संभव नहीं क्योंकि तब अधिकारी-नेता-जज आदि उतनी रिश्वत नहीं ले पाएंगे इसीलिए वो लागू नहीं हो सकती है। उनसे पूंछे उसे लागू करने में क्या परेशानी आ रही है | उनसे पूछें कि वे हस्ताक्षर आधारित प्रक्रिया और हाजिरी-आधारित भ्रष्ट को नागरिकों द्वारा बदलने की प्रक्रिया (जहाँ लोगों को शिकायत लिखने पटवारी या कलक्टर के दफ्तर खुद जाना पड़ता है) में से किस प्रक्रिया का समर्थन करते है ? उनसे पूछें कि वे सकारात्मक रिकाल की बात कर रहें हैं (जिसमें लोगों को विकल्प ढूँढना होगा वर्त्तमान 'पब्लिक के नौकर' को बदलने के लिए ) या नकारात्मक रिकाल की बात कर रहे हैं (जिसमें लोगों को वर्त्तमान 'पब्लिक के नौकर' के खिलाफ मत डालना होता है, उसे निकालने के लिए) ? सकारात्मक रिकाल अव्यवस्था की स्तिथि कम करता है, जो पद खाली रहने से होती है। और ये भ्रष्ट अधिकारी को नागरिकों द्वारा हटाना भी आसान बना देता है, क्योंकि नकारात्मक रिकाल में नागरिक भ्रष्ट अधिकारी को नहीं हटाएंगे क्योंकि उन्हें डर होता है कि अगला अधिकारी इससे भी बुरा हो सकता है | . उनसे पूछें कि वो 'राईट टू रिजेक्ट' की जो बात कर रहे हैं, वो एक बटन है जो हर पांच साल में एक बार दबा सकते है या 'राईट टू रिजेक्ट' किसी भी दिन ? 'राईट टू रिजेक्ट हर पांच साल' से कोई भी बदलाव नहीं आएगा | क्यों ? क्योंकि ज्यादातर वोट वैसे भी किसी पार्टी के खिलाफ होते हैं ,जैसे जो कांग्रेस से नफरत करता है, उनके लिए और कोई चारा नहीं कि वे भा.ज.पा. के लिए वोट डालें ताकि कांग्रेस न जीत पाए और ऐसे ही भा.जा.पा से नफरत करने वाले कांग्रेस को वोट देंगे, 'इनमें से कोई भी नहीं' बटन होने के बावजूद | इसीलिए 'राईट टू रिजेक्ट हर पांच साल' कोई भी बदलाव नहीं लाएगा | उनको पूछें कि पूरी परिस्स्थिति बताएं अपना दावा समझाने के लिए, क़ानून-ड्राफ्ट और धाराएं बताते हुए |
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(11) ज्यादातर प्रजा अधीन-राजा के विरोधी लोग विदेशी कंपनियों और अन्य कंपनियों के मालिकों की तरफदारी करते हैं |
कम्पनियाँ 'काम के समझौते' बनाती हैं जिसमें 'मर्जी पर कभी भी' निकाल देने की शर्त लिखी होती है। वो भी बिना कोई सबूत दिए। कोई कारण-अच्छा, बुरा, या बिना कोई कारण दिए। इसके अलावा एक 'परखने का समय' भी होता है, जिसमें मालिक अपने मजदूरों को कभी भी निकाल सकता है, बिना कोई कारण दिए | लेकिन सबूत-भगत (सबूतों की मांग करने वाले) अपनी सबूत की मांग सिर्फ आम नागरिकों के लिए करते हैं | वे कहते हैं कि ये अनैतिक है कि किसी को बिना सबूत के निकालना | वो बड़े आराम से ये मुद्दा ही गोल कर देते हैं, जब कंपनियों के मालिकों के अधिकारों की बात होती है| तब वे कहते हैं ,कि कोई भी सबूत देने की मालिकों को जरूरत नहीं है और वो अपने कर्मचारी को निकाल सकता है ,बिना कोई सबूत के !! क्या ये खुला भेद-भाव नहीं है ? क्या ये संविधान के खिलाफ नहीं है ?
हम आम नागरिक कंपनी मालिकों के समान अधिकार की मांग करते हैं | जैसे कंपनी मालिकों को बिना कोई सबूत के अपने कर्मचारियों को निकालने का अधिकार है। हम 120 करोड़ इस देश के मालिको के पास हमारे द्वारा देश को चलाने के लिए रखे गए नौकरो -- प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, लोकपाल, जज, और अन्य जरूरी अधिकारी को निकालने का अधिकार होना चाहिए। वो भी बिना किसी सबूत के। सिर्फ बहुमत साबित करके | हमारे पास 'राईट टू रिकाल बिना कोई सबूत के' होना चाहिए |
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(12) एक और चीज जो प्रजा अधीन-राजा के विरोधी बोलते हैं कि 'हमें सेना को मजबूत बनाने के लिए क्यों विरासत कर, संपत्ति कर आदि के रूप में पैसा देना चाहिए ?
असल में वे अपने बारे में अधिक सोचते हैं, बजाय कि देश के | अरे, यदि वे ये सब टैक्स नहीं देंगे तो देश की सेना, पोलिस और कोर्ट विदेशी कंपनियों और दुश्मन देश की सेना से देश की सुरक्षा नहीं कर पाएंगी। तब सबसे पहले पैसे-वाले ही लूटे जाएँगे | और यदि कोई अपना धन-संपत्ति की सुरक्षा खुद करने की कोशिश करता है तो मिलकर धन की सुरक्षा करने पर जो खर्च होगा, उसकी तुलना में उसको कहीं ज्यादा धन खर्च करना होगा। इसीलिए आर्थिक और अच्छे-बुरे दोनों के नजरिये से कम पैसे और संपत्ति वालों कि तुलना में ज्यादा पैसे-संपत्ति वालों को ज्यादा टैक्स देना चाहिए | सच्चाई जानने के बाद कुछ प्रजा अधीन-राजा के समर्थक भी बन जाते है लेकिन ज्यादातर जाली प्रजा अधीन-राजा-समर्थक अपने अंधे स्वार्थवश अपने रुख पर जमे रहते है |
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लेकिन यदि व्यक्ति, क़ानून-ड्राफ्ट पर बात करने से मना कर दे, अपना रुख स्पष्ट करने से मना कर दे, तो उसके साथ आगे चर्चा बंद कर दें, क्योंकि ये केवल समय की बरबादी ही होगी, वो समय जो दूसरों को 'प्रजा अधीन-राजा' के क़ानून-ड्राफ्ट की जानकारी देने के लिए हम इस्तेमाल कर सकते | उन लोगों को बोलना चाहिए कि 'हमें तुमसे चर्चा नहीं करनी क्योंकि तुम क़ानून-ड्राफ्ट ना पढ़ कर अपना नागरिक का कर्तव्य भी पूरा नही कर रहे हो | हमें और दूसरों को को तो कम से कम अपना कर्तव्य पूरा करने दो' |
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(6.25) कृपया प्रक्रियाओं और क़ानून-ड्राफ्ट पर ध्यान केंद्रित करें ना कि कानूनों के नाम या व्यक्तियों पर जिसने ये क़ानून-ड्राफ्ट बनाएँ हैं, क्योंकि नाम धोखा दे सकते है।
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पेड मीडिया ये कहता है कि “नीतिश कुमार राईट टू रिकाल के प्रति अत्यंत प्रतिबद्ध है" | 1975 से वो राईट टू रिकाल का समर्थन कर रहा है | ऐसा है !!!
वे 1975 से कई बार सांसद रहे है, और उनकी पार्टी में भी कई सांसद हैं | नितीश कुमार या उनके किसी भी सांसद ने कभी भी संसद में प्रजा अधीन सांसद के क़ानून-ड्राफ्ट का प्रस्ताव नहीं किया | उनने कभी भी प्रजा अधीन प्रधानमंत्री, सुप्रीम कोर्ट जज के लिए कोई प्रक्रिया या क़ानून-ड्राफ्ट का प्रस्ताव नहीं किया | नितीश 6 सालों से मुख्यमंत्री है | उनके राज्य के किसी भी जिले में प्रजा अधीन पुलिस कमिश्नर या प्रजा अधीन जिला शिक्षा अधिकारी नहीं है | फिर भी वो ये दावा करते है कि वो 'प्रजा अधीन राजा प्रक्रियाओं' का समर्थक है !! . और अंत में, नितीश कुमार ने राईट टू रिकाल कानून पार्षद के लिए स्वीकार किया | इसके कुछ विवरण देखते है :
“...यदि दो तिहाई वोटर अपने चुनाव क्षेत्र से पार्षद के खिलाफ एक हस्ताक्षर वाली याचिका शहरी विकास विभाग को देते है, तो शहरी विकास विभाग उस याचिका की योग्यता पर गौर करेंगे और यदि शहरी विकास विभाग आश्वस्त हो जाता है कि पार्षद ने दो तिहाई वोटरों को खो दिया है तो उस पार्षद के निष्कासन के लिए कदम उठाएंगे”
ये किस तरह की अव्यवहारिक और मजाकिया प्रक्रिया है !! अब बताइये, शहरी विकास विभाग का प्रभारी हस्ताक्षर की जांच कैसे करेगा ? बैंक में, चेक एक दस्तावेज है जो बैंक द्वारा जारी किया जाता है | चेक स्वयं एक अर्ध-सबूत है | और बैंक क्लर्क के पास हस्ताक्षर का नमूना है और ग्राहक जब भी पासबुक अपडेट करवाता है तो उसके पास एस.एम.एस द्वारा सूचना भी आ जाती है या वह खुद बैंक जाकर खाते की जांच कर सकता है | इसीलिए हस्ताक्षर आधारित दस्तावेज बैंक-चेक काम करता है | लेकिन शहरी विकास अधिकारी के पास 1 % नागरिकों का भी हस्ताक्षर का नमूना नहीं है, तो वो उचित समय में हजारों हस्ताक्षरों की जांच कैसे करेगा ? और कैसे उसको पता लगेगा कि एक ही व्यक्ति ने सौ बार हस्ताक्षर नहीं किये हैं ? और कोई नागरिक कैसे जांच कर पायेगा कि उसके हस्ताक्षर किसी अन्य नागरिक ने नही कर दिए है ? सबसे जरुरी बात यह कि , जबकि बिहार में जहाँ साक्षरता दर 60 % से अधिक नहीं है, 67% नागरिको का हस्ताक्षर कैसे लिया जा सकता है ?
उपरोक्त क़ानून-ड्राफ्ट केवल ये ही दिखाता है कि नितीश एक सुधारवादी के वेश में बदमाश और चोर आदमी है | कोई भी असली सुधारवादी ऐसा बेकार क़ानून-ड्राफ्ट नहीं देगा | लेकिन बिका हुआ मीडिया कहेगा है कि ये भारत में सबसे अच्छे सुधारों में से एक है !!!
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इसी श्रेणी के अन्य धूर्त पुरुष अन्ना और केजरीवाल है। महात्मा अरविन्द गांधी कहते है कि राईट टू रिकॉल लोकपाल होना चाहिए। लेकिन जिस लोकपाल का ड्राफ्ट वे प्रस्तुत करते है, उसमें से राईट टू रिकॉल की धाराएं वे हटा देते है। मतलब वे राईट टू रिकॉल का जबानी समर्थन करने को कहते है लेकिन उसे लागू करने का विरोध करते है। . वहीँ महा महात्मा अन्ना का कहना है कि राइट टू रिकॉल पार्षद पर होना चाहिए लेकिन प्रधानमन्त्री, मुख्यमंत्री और पुलिस प्रमुख पर बिल्कुल नहीं होना चाहिए !! और जब उनसे पूछा जाता है कि वे जिस राइट टू रिकॉल पार्षद की बात कर रहे है उसकी प्रक्रिया का ड्राफ्ट देवें तो वे नाराज हो जाते है और ड्राफ्ट के बारे में 'बाद में' यानी 2027 में बात करने को कहते है !!!
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(6.26) प्रजा अधीन राजा/राईट टू रिकाल अगले जन्म में !
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केवल प्रजा अधीन राजा का क़ानून-ड्राफ्ट या पारदर्शी शिकायत प्रणाली के क़ानून-ड्राफ्ट का नाम ही नेताओं को बेचैन कर देता है | वे इनका ना तो विरोध कर सकते हैं क्योंकि इससे उनकी कार्यकर्ताओं के सामने पोल खुल जायेगी कि वे आमजन विरोधी हैं | और यदि इसका समर्थन करते हैं तो उनके प्रायोजक धन देना बंद कर देंगे | इसीलिए वे ऊटपटांग बातें कहकर 'भ्रष्ट को निकालने के अधिकार' को टालने का प्रयत्न करते है। जैसे पहले हमें ये या वो करना चाहिए और इसको अगले जनम में लाना चाहिए | या इस अधिकार को देने के लिए संविधान में बद्लाव चाहिए जिसके लिए बहुत समय चाहिए और इसीलिए अगले जन्म में आएगा | कोई एक-आध नेता ही इसका समर्थन करेंगे लेकिन अधिकतर नेता तो इसे अगले जन्म के लिए टालते ही रहेंगे । लेकिन नेताओ के उलट अधिकतर कार्यकर्ता इसका समर्थन करेंगे | इसीलिए हमें सीधे कार्यकर्ताओं से संपर्क करना चाहिए |
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(6.27) समीक्षा प्रश्न
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1. मान लीजिए किसी राज्य में 7 करोड़ रजिस्टर्ड मतदाता है। मान लीजिए, मुख्यमंत्री को 200 विधायकों का समर्थन प्राप्त है तथा मुख्यमंत्री को लगभग 1.5 करोड़ नागरिकों का सीधा अनुमोदन प्राप्त है। तब प्रस्तावित सरकारी अधिसूचना के अनुसार हम लोगों द्वारा मुख्यमंत्री को बदलने के लिए कितने अनुमोदनों की आवश्यकता होगी ?
2. मान लीजिए, किसी राज्य में 7 करोड़ रजिस्टर्ड मतदाता है। मान लीजिए, मुख्यमंत्री को 200 विधायकों का समर्थन प्राप्त है जिन्हें कुल 2 करोड़ मत मिले हैं तथा मुख्यमंत्री को 2.2 करोड़ जनता का अनुमोदन है। तब मुख्यमंत्री को हटाने के लिए कितने अनुमोदनों की आवश्यकता होगी ?
3. नागरिकों और सेना के लिए खनिज रॉयल्टी सरकारी अधिसूचना के अनुसार कितने लोगों को एक नागरिक अपना अनुमोदन दे सकता है ?
4. मान लें, 3 करोड़ नागरिक अपना अनुमोदन फाइल करते हैं। इसके बाद उनमें से 50 लाख लोग अपना अनुमोदन रद्द करवा देते हैं। कुल जमा हुई फीस कितनी होगी ?
5. मुख्यमंत्री के पद के लिए नाम दर्ज करने की फीस कितनी है ?
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(6.28) अभ्यास
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1. जय प्रकाश नारायण ने अपने सहयोगियों को राईट टू रिकॉल का जो क़ानून-ड्राफ्ट संसद में जमा करने के लिए दिया था, कृपया उसे प्राप्त करें।
2. प्रजा अधीन राजा/राइट टू रिकॉल के वे क़ानून-ड्राफ्ट जो अरुण शौरी अथवा अन्य बी.जे.पी के सांसदों ने संसद में जमा किए, कृपया उन्हें प्राप्त करें।
3. प्रजा अधीन राजा/राइट टू रिकॉल के वे क़ानून-ड्राफ्ट जो कांग्रेस सांसदों ,येचुरी अथवा अन्य सी पी एम सांसदों ने संसद में जमा किए है, कृपया उन्हें प्राप्त करें।
4. क्या आप इन सांसदों द्वारा संसद में जमा किये गए उपर्युक्त किसी क़ानून-ड्राफ्ट से सहमत हैं ?
5. बताएं कि आपके अनुसार क्यों भारत के बुद्धिजीवी, प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री आदि प्रजा अधीन राजा/राइट टू रिकॉल के क़ानून-ड्राफ्ट का विरोध करते हैं ?
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Friday, November 27, 2015

Only activists , such as Roshan Shah and Khemraj Kosthi are filing PILs on IMPORTANT issue of over 1 lakh voters whose names were marked as "DELETED" on voter list just 2 days before the poll !!! (26-Nov-2015) No.1

November 26, 2015 No.1

https://www.facebook.com/mehtarahulc/posts/10153147486571922

Only activists , such as Roshan Shah and Khemraj Kosthi are filing PILs on IMPORTANT issue of over 1 lakh voters whose names were marked as "DELETED" on voter list just 2 days before the poll !!! 
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Congress , BJP and AAP are all silent on this issue !!!

राइट टू रिकॉल महापौर का प्रस्तावित क़ानून-ड्रॉफ्ट (27-Nov-2015) No.1

November 27, 2015 No.1

https://www.facebook.com/mehtarahulc/posts/10153149020911922

राइट टू रिकॉल महापौर का प्रस्तावित क़ानून-ड्रॉफ्ट
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भारत के नागरिको,
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अगर आप चाहते है कि जिले के आम नागरिको के पास सभापति/मेयर को नौकरी से निकालने की प्रक्रिया हो तो अपने विधायक को एस.एम.एस. द्वारा ये आदेश भेजे :
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माननीय सांसद मैं आपको आदेश करता हूँ कि, इस क़ानून को गैजेट में प्रकाशित किया जाए। मतदाता संख्या : ######
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प्रिय सांसद/विधायक,
अगर आपको एस.एम.एस. के द्वारा यू.आर.एल. मिला है तो उसे वोटर का आदेश माना जाये जिसने यह मैसेज भेजा है न कि जिसने ये लेख लिखा है।
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=====ड्राफ्ट का आरम्भ=======
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1. नागरिक शब्द का मतलब रजिस्टर्ड मतदाता है।
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2. [नगर आयुक्ता/कमिश्नर के लिए निर्देश]
30 वर्ष से अधिक उम्र का कोई भी नागरिक जो महापौर बनना चाहता हो वह नगर आयुक्त (Municipal comissioner) के कार्यालय में उपस्थित होकर शपथपत्र प्रस्तुत कर सकता है। नगर आयुक्त विधायक के चुनाव के लिए जमा की जाने वाली वाली धनराशि के बराबर शुल्क‍ लेकर उसे एक सीरियल नम्बर जारी करेगा।
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3. [नागरिक केन्द्र (सीविक सेन्टर ) क्लर्क के लिए निर्देश]
यदि उस जिले का कोई भी नागरिक चाहे तो वह नगर केन्द्र (Civic Center) में जाकर 3 रूपए का भुगतान करके अधिक से अधिक 5 व्यक्तियों को महापौर के पद के लिए अनुमोदित कर सकता है। नगर केन्द्र /सीविक सेन्टर क्लर्क उसके अनुमोदन को कम्युटर में डाल देगा और उसे उसके मतदाता पहचान-पत्र, दिनांक, समय, और जिन व्यक्तियों के नाम उसने अनुमोदित किए है, उनके नाम के साथ रसीद देगा। यदि कोई नागरिक अपने अनुमोदन रद्द करने के लिए आता है तो वह क्लर्क उसके एक या अधिक अनुमोदनों को बिना कोई शुल्क लिए बदल देगा।
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4 [नागरिक केन्द्र क्लर्क के लिए निर्देश]
सीविक सेन्टर क्लर्क नागरिकों की पसंद/प्राथमिकता को नगर की वेबसाइट पर उनके मतदाता पहचान-पत्र संख्या को उसकी प्राथमिकताओं के साथ डाल देगा।
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5. [नगर आयुक्त के लिए निर्देश]
प्रत्येक सोमवार को नगर आयुक्त हरेक उम्मीसदवार के अनुमोदन की गिनती को प्रकाशित करेगा।
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6. [महापौर के लिए निर्देश]
पदासीन महापौर अपनी अनुमोदनो/गिनती को निम्नलिखित दो में से किसी एक को उच्चतर मान सकता है –
• नागरिकों की संख्या जिन्होंने उसका अनुमोदन किया है।
• समर्थन करने वाले कारपोरेटरों/पार्षदों द्वारा प्राप्त किए गए मतों का योग
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7 [महापौर के लिए निर्देश]
यदि किसी व्यक्ति को मौजूदा महापौर के मुकाबले सभी रजिस्टर्ड मतदाताओं के 2 प्रतिशत से ज्यादा अनुमोदन प्राप्त है तो वर्तमान महापौर इस्ती्फा दे सकता है और पार्षदों से अनुरोध कर सकता है कि वे सबसे अधिक अनुमोदन प्राप्त व्यक्ति को महापौर नियुक्त कर दें।
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8. [पार्षद के लिए निर्देश]
पार्षदगण खंड 7 में उल्लिखित प्रक्रिया के अनुसार सबसे अधिक अनुमोदन प्राप्त व्यक्ति को नया महापौर नियुक्त कर सकते है।
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9. [जिला कलेक्टर के लिए निर्देश]
यदि कोई नागरिक इस कानून में कोई बदलाव चाहता है तो वह जिलाधिकारी के कार्यालय में जाकर एक एफिडेविट जमा करा सकता है और डी सी या उसका क्लर्क उस एफिडेविट को 20 रूपए प्रति पृष्ठ का शुल्क लेकर मुख्यामंत्री की वेबसाईट पर डाल देगा।
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10. [तलाटी/पटवारी के लिए निर्देश]
यदि कोई नागरिक इस कानून या इसकी किसी धारा के विरूद्ध अपना विरोध दर्ज कराना चाहे अथवा वह उपर के खंड में प्रस्तुत किसी एफिडेविट पर हां – नहीं दर्ज कराना चाहे तो वह अपने वोटर आई कार्ड के साथ तलाटी के कार्यालय में आकर 3 रूपए का शुल्क देगा। तलाटी हां-नहीं दर्ज कर लेगा और उसे एक रसीद जारी करेगा। यह हां – नहीं मुख्यमंत्री की वेबसाईट पर डाला जाएगा।
सैक्शन- सी.वी.(जनता की आवाज़)
सी वी – 1 [जिला कलेक्टर के लिए निर्देश]
यदि कोई गरीब, दलित, महिला, वरिष्ठ नागरिक या कोई भी नागरिक मतदाता इस कानून में बदलाव चाहता हो तो वह जिला कलेक्टर के कार्यालय में जाकर एक शपथपत्र प्रस्तुत कर सकता है और जिला कलेक्टर या उसका क्लर्क इस ऐफिडेविट को 20 रूपए प्रति पृष्ठ का शुल्क लेकर प्रधानमंत्री की वेबसाईट पर डाल देगा।
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सी वी – 2 [तलाटी/पटवारी के लिए निर्देश]
यदि कोई गरीब, दलित, महिला, वरिष्ठ नागरिक मतदाता या कोई भी नागरिक मतदाता इस कानून अथवा इसकी किसी धारा पर अपनी आपत्ति दर्ज कराना चाहता हो अथवा उपर के खण्ड में प्रस्तुत किसी भी शपथपत्र पर हां/नहीं दर्ज कराना चाहता हो तो वह अपना मतदाता पहचान पत्र लेकर तलाटी के कार्यालय में जाकर 3 रूपए का शुल्क जमा कराएगा। तलाटी हां/नहीं दर्ज कर लेगा और उसे इसकी रसीद देगा। इस हां/नहीं को प्रधानमंत्री की वेबसाईट पर डाल दिया जाएगा।

Wednesday, November 25, 2015

Poverty in Philippines is much below India. But yet, quality of maths / science education in top 5% is "lower" than India (though education in bottom 50% is much better ). (5-Nov-2015) No.1

November 5, 2015 No.1

https://www.facebook.com/mehtarahulc/posts/10153115757226922

Poverty in Philippines is much below India. But yet, quality of maths / science education in top 5% is "lower" than India (though education in bottom 50% is much better ).
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Why is it so?
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Likewise, you will find several countries which have much lesser poverty than India, and per capita GDP is higher. But the maths \ science level of that countries' top 5% is below ours. Why is it so?
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Pls give your theories , reasons etc

A govt school in Karnataka appointed a Dalit as cook for mid-day meal scheme. .(7-Nov-2015) No.1

November 7, 2015 No.1

https://www.facebook.com/mehtarahulc/posts/10153118103541922

A govt school in Karnataka appointed a Dalit as cook for mid-day meal scheme. .
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Since appointment of Dalit cook, 100 students' parents has stopped sending their children to the school !!!
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Every day Radhamma takes out a diary she is required to maintain as part of the mid-day meal scheme in government schools in Karnataka and writes four words, “No one ate today.” Every day for the past five months.
Radhamma is a Scheduled Caste, and the condition that she not make food is the only way she can retain her job of head cook at the Government Higher Primary School in Kagganahalli village in Kolar district of Karnataka. In January 2014, there were 118 students at the school, from Classes I to VIII. Since her appointment in February 2014, 100 have left. The remaining 18 continue on the condition, laid down by their parents, that Radhamma not make the mid-may meal.
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http://indianexpress.com/…/every-day-she-writes-in-midday-…/

This combined with CCTVs every 100 feet reduce crimes and harassment (8-Nov-2015) No.5

November 8, 2015 No.5

https://www.facebook.com/mehtarahulc/posts/10153121537051922

This combined with CCTVs every 100 feet reduce crimes and harassment

NaMo = NDA got almost same % votes , around 30% , in may-2014-Loksabha elections as now (8-Nov-2015) No.4

November 8, 2015 No.4

https://www.facebook.com/mehtarahulc/posts/10153121632591922

NaMo = NDA got almost same % votes , around 30% , in may-2014-Loksabha elections as now. But in may-2014 LS elections , it got 31/40 seats and this time, it got say 88/243 seats. Thats because Congress + Nitish + Laloo united this time , while they were divided in may-2014
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That is one. Another is that --- NaMo could NOT convince non-voters to vote , and vote for BJP and NaMo could not convince Congress / Nitish / Laloo voters to vote for BJP. Let me explain.
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NaMo has been PM for 520 days. He commands some 30 lakh civilian Central Govt staff (plus soldiers, CRPF, which I wont count). Plus BJP has CMs in several states. And there are lakhs of BJP / RSS activists who gave him crores of activist-hours in these 520 days. He could not bring much positive change in Bihar that could convince crores of Bihar "not voting" voters to vote , and vote for him, And NAMo could not convince voters of Congress / Nitish / Laloo to vote for NaMo. So status quo copied itself. 
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IOW, what changes NaMo brought after jun-2014 , if at all he has brought changes, hasnt impressed voters. Even after becoming PM, and even after getting crores of hours from activists, if NaMo cant defeat Laloo / Nitish / Congress , then IMO, NaMo cant even bend hairs of MNC-owners and Missionaries, who are 10 times more powerful than (Congress + ArGandhi + Nitish + .... ) . Only thing we will see is that --- with US supprt, NaMo will destroy Dawood (who is anyway a spent bullet now). And the price India will have to pay to US will be huge.
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Sp my suggestion to activists to end this SoMoKe-andhbhakti and focus on law-drafts which can bring REAL change , and decrease inefficiencies of factory owners , businessmen etc in India. The links to law-drafts I have proposed, namely RTR ( = RTR + multi-elections) , TCP = referendum , Jury System, remove VAT \ GST \ Excise, impose wealth tax, abolish tax benefits to SEZs, hire-fire labor laws etc etc. The Links to these law-drafts are at https://www.facebook.com/notes/10152774660951922 . I request activists to read these law-drafts, and publicize them, and not waste time in SoMoKe-andhbhakti .

Today is LKA's birthday !!! LKA is distributing sweets to celebrate ---- his birthday? !!!! (8-Nov-2015) No.3

November 8, 2015 No.3

https://www.facebook.com/mehtarahulc/posts/10153121677791922

Today is LKA's birthday !!! LKA is distributing sweets to celebrate ---- his birthday? !!!!

बिहार ही नही , यूपी पंचायतिराज चुनाव में वाराणसी (मोदीजी की सीट) में बीजेपी 58 में से 50 सीटों पे हारी। (8-Nov-2015) No.2

November 8, 2015 No.2

https://www.facebook.com/mehtarahulc/posts/10153121713741922

बिहार ही नही , यूपी पंचायतिराज चुनाव में वाराणसी (मोदीजी की सीट) में बीजेपी 58 में से 50 सीटों पे हारी। 

http://www.ibtimes.co.in/uttar-pradesh-panchayat-election-r

इतना ही नहीं वाराणसी में ही मोदीजी द्वारा गोद लिए गए एक गांव जयापुर में भी बीजेपी हार गयी। 

इसके अतिरिक्त बीजेपी के पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंहजी के लॉकसभा क्षेत्र लखनऊ में भी बीजेपी हार गयी। लखनऊ में बीजेपी 28 में से 24 सीटों पे हारी। 

http://www.ibtimes.co.in/uttar-pradesh-panchayat-election-r

Caste based voting plays a role , but NOT when activists have sound proposals , or the leader they support is PROVEN non-casteist / non-nepotist . (8-Nov-2015) No.1

November 8, 2015 No.1

https://www.facebook.com/mehtarahulc/posts/10153121839511922

Caste based voting plays a role , but NOT when activists have sound proposals , or the leader they support is PROVEN non-casteist / non-nepotist .
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eg NaMo's caste is ghanchi which is not even 1% in Gujarat. NaMo proved to all in BJP , RSS , general public that NaMo isnt casteist and nepotist. So NaMo in Gujarat got support from all castes. Less from some caste, more from some caste. But NaMo got support across castes.
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But in Bihar, NaMo was NOT going to be CM. And BJP had no proposals / plans , except "vikas , vikas" drumbeating. And most BJP leaders in Bihar are casteist and nepotic. So the fear , that BJP will appoint some casteist leader as CM became real. So most voters went back to caste based voting. 
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As saying goes "mices will play ONLY when cat is away". If there is NON-CASTEIST and NON-NEPOTIC proposals / leaders, then caste becomes lesser issue. In absence of NON-CASTEIST leaders / regime , voters will pay attention to caste.

Assuming no EVM manipulation, Bihar elections prove that NaMo didnt lose BJP-supporters but also didnt gain very many new voters (10-Nov-2015) No.1

November 10, 2015 No.1

https://www.facebook.com/mehtarahulc/posts/10153124069941922

Assuming no EVM manipulation, Bihar elections prove that NaMo didnt lose BJP-supporters but also didnt gain very many new voters. Even after subtracting Bihari voters who have migrated out of state for work, voting % could have gone to 75% , but remained only around 55% to 60%. So NaMo could not gain even fence sitters , forget Nitish / Laloo / Congress supporters.
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So law-drafts which NaMo printed in 520 days as PM have not created any significant difference in lives of people. Otherwise, at least 20% to 25% voters , who could have voted but DELIBERATELY didnt vote in 2010 or 2014, would have voted for NaMo in 2015. 
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Mohan Bhagwat's anti-reservation comments INCREASED BJP votes. How? Many RSS-workers are anti-reservation . And so they worked harder and harder. As per voters, OBCs were unlikely to vote for BJP anyway. If NaMo was CM candidate himself, then OBCs could have voted for NaMo. But NaMo was NOT a CM candidate. And Bihar BJP doesnt have any state leader , that people can trust as 100% non-nepotic and non-casteist. And BJP also opposed law-drafts which can reduce nepotism / casteism in administration and courts. If BJP had projected OBC as state CM, then many upper caste leaders and workers in Bihar BJP and Bihar RSS would have become inactive. So NaMo refused to disclose CM candidate. And so OBC voters went to Nitish / Laloo / Congress . Bhagwat's comments ensured that upper caste voters and workers stay with BJP and work harder. So Mohan Bhagwat's anti-reservation comments INCREASED BJP votes.
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As far as reservation issue goes, BJP-leaders and RSS-leaders including NaMo have no conviction , no principles and no direction, They just go with flow. They see which statements will increase votes and make such statements. They have no stand on this issue

PM's silence on Dadri, Award vapasi , fake claims of "rising intolrance (11-Nov-2015) No.4

November 11, 2015 No.4

https://www.facebook.com/mehtarahulc/posts/10153125463511922

PM's silence on Dadri, Award vapasi , fake claims of "rising intolrance" , and now attacks from LKA / MMJ / Shourie etc and assorted nonsenses is welcome. I am serious ---- such people deserve no answer.
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But PM's silence on NJAC's cancellation by Supreme judges is criminal. Supreme judges are running amock like drunk elephants, and PM is silently allowing SCjs to work like self reproducing oligarchy. PM should NOT have allowed judges to admit petition against Constitution and Constitutional amendments. 
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I was hoping that PM will atleast make some statements after Bihar elections' campaigning ends. But it has been 5 days since campaign ended. And PM is still silent on NJAC issue.
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IMO , PM doesnt have courage to beat nepotism etc in judiciary. Those who want to cleanse courts better start looking for alternatives.
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The alternative I propose are
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1. Activists should end SoMoKe-andhbhakti 
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2. Activists should publicize law-drafts such RTR-Supreme-judges, RTR-High-judges, RTR-District-judges,
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3. Jury System in Lower Court, Jury Sys in High Court and Jury Sys in Supreme Court
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4. RTR District Public Prosecutor , Grand Jury System in prosecution
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5. RTR District Police Chief , Jury System over Policemen. 
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The links to the drafts for above proposed law-drafts are inhttps://www.facebook.com/notes/10152774660951922 . 
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Pls look at the drafts and decide.