Tuesday, March 29, 2016

आखिर क्यों बीजेपी के नेता हिन्दुओ को ‘होली पर पानी बचाने’ तथा ‘जल विहीन होली’ मनाने के लिए प्रोत्साहित कर रहे है ? (29-Mar-2016) No.3

March 29, 2016 No.3

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आखिर क्यों बीजेपी के नेता हिन्दुओ को ‘होली पर पानी बचाने’ तथा ‘जल विहीन होली’ मनाने के लिए प्रोत्साहित कर रहे है ?
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होली पर रंग खेलने में प्रति व्यक्ति कितने पानी कि खपत होती है ? 100 लीटर प्रति व्यक्ति से भी कम. और मांस के उत्पादन पर कितना पानी खर्च किया जाता है ? ज्वार/बाजरे के प्रति किलोग्राम उत्पादन पर 50 लीटर जबकि भैस के एक किलो मांस के उत्पादन पर 5000 लीटर पानी की आवश्यकता होती है !!! लेकिन होली वर्ष में सिर्फ एक बार एक दिन के लिए ही आती है --- जबकि भैंस के मांस का उत्पादन पूरे वर्ष किया जाता है. 

कहने का मतलब यह है कि ----- हर व्यक्ति अपनी इच्छानुरूप चलने के लिए स्वतंत्र है, जब तक कि जल को व्यर्थ करना अपराध की श्रेणी में नही आता हो. भैंस का मांस खाना अपराध की श्रेणी में नहीं आता, अत: जो कोई व्यक्ति एक किलो मांस का भक्षण करके अप्रत्यक्ष रूप से 5000 लीटर पानी का उपभोग कर रहा है, तो उसे ऐसा करने देना चाहिए ---- क्योंकि कीमत भी उपभोक्ता ही चुका रहा है. इसीलिए यदि कोई होलिकात्सव पर 100 लीटर पानी रंग खेलने में खर्च करना चाहता है तो उसके ऐसा करने पर भी किसी को कोई आपत्ति नही होनी चाहिए. मैं विरोध नही करूँगा. लेकिन मैं उन तरीको के खिलाफ हूँ जिनमे होली खेलने के लिए 10 हजार किलो टमाटरो का इस्तेमाल किया जाता है !!! (हाँ, ऐसा अहमदाबाद में होता है ---- यहाँ किसी पार्टी या क्लब में कुछ 10 हजार टमाटरो को एक दुसरे पर फेंक कर होली खेली जाती है !!) इस प्रकार से होली खेलना अपराध की श्रेणी में आता है. लेकिन होली खेलने पर 100 लीटर पानी खर्च करना अपराध नही है.
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और होली खेलने के सूखे रंगों के निर्माण में ‘टेसू के फूलो के घोल’ से ज्यादा पानी की आवश्यकता होती है !!!
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जल संकट का कारण जलाभाव नही बल्कि सप्लाई लाइन की अनुपलब्धता है. उदाहरण के लिए अहमदाबाद में 100 लीटर पानी बचाने से भी महाराष्ट्र जैसे राज्य के अभावग्रस्त इलाको में जल की एक बूँद भी नही पहुंचेगी --- क्योंकि अहमदाबाद से महाराष्ट्र के उन इलाको में पानी पहुंचाने का कोई नेटवर्क नही है. मांस, चिकेन और गेहू/चावल को दिए जा रहे अनुदान समाप्त करना, अनिवार्य रूप से पानी के मीटर लगाना तथा ज्यूरी प्रक्रियाएं लागू करना आदि जल संकट से निपटने का सही तरीका है. ज्यूरी प्रक्रियाएं आने से जल शोधन उपकरण और बिजली कि दरें सस्ती होगी.

लेकिन जैसी कि उम्मीद थी, मिशनरीज़ द्वारा प्रायोजित पेड-बुद्धिजीवी जो कि मांस भक्षण का समर्थन करते है, हिन्दुओ को जल विहीन होली मनाने की नसीहतें दे रहे है.
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दुःख का विषय है कि अब तक बीजेपी के एक भी नेता ने ‘जल विहीन होली’ कि इस बेतुकी सलाह का विरोध नही किया है. यहाँ तक कि किसी भी बीजेपी नेता ने अपने परिवार और मित्रो पर रंगों का पानी फेंकते हुए दिखाने का सांकेतिक वीडियो या तस्वीरे तक सार्वजनिक नही की है. 
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बीजेपी के नेता हिन्दू परम्पराओं को नष्ट करने में अब कोंग्रेस/आम आदमी पार्टी से भी बेहतर काम कर रहे है. उदाहरण के लिए बीजेपी के सांसद और मंत्री हर्षवर्धन ने दिल्ली चुनाव जीतने पर कार्यकर्ताओं को आतिशबाजी करने के निर्देश दिए. और इसमें कोई गलत बात भी नही है. लेकिन इन्ही हर्षवर्धन ने दीपावली पर आतिशबाजी करने का विरोध किया !!! और मोदी साहेब ने भी दीपावली पर आतिशबाजी का विरोध प्रदर्शित करने के लिए एक फुलझड़ी तक चलाते हुए फोटो खिंचाने से भी इनकार कर दिया !!! वे नही चाहते थे कि लोग उन्हें दीपावली पर आतिशबाजी करते हुए देख कर प्रेरित हो. दुसरे शब्दों में बीजेपी के सभी नेताओ ने तब दीपावली पर आतिशबाजी करने का विरोध किया और अब ये लोग होली पर पानी से रंग खेलने का विरोध कर रहे है. 
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हम राईट टू रिकॉल ग्रुप के कार्यकर्ता दीपावली पर अहानिकर आतिशबाजी चलाने का समर्थन करते है और हम होली पर पानी से रंग खेलने के भी समर्थन में है. दरअसल, दीपावली पर आतिशबाजी और होली पर पानी से रंग खेलने का विरोध सिर्फ हिन्दू परम्पराओं को नष्ट करने और मिशनरीज को खुश करने के लिए किया जा रहा है. इसीलिए हमारा आग्रह है कि बीजेपी नेताओं समेत उन सभी व्यक्तियों का विरोध करें जो दीपावली पर आतिशबाजी और पानी से होली खेलने का विरोध करते है.

Needs modification. eg postcard should be replaced by SMS. But still worth a read (29-Mar-2016) No.2

March 29, 2016 No.2

https://www.facebook.com/mehtarahulc/posts/10153388220106922

Needs modification. eg postcard should be replaced by SMS. But still worth a read

H301.13A - हफ्ते में सिर्फ दो से चार घंटे का समय देकर आप राईट टू रिकॉल प्रक्रियाएं लाने में सहयोग कर सकते है।
( राईट टू रिकॉल पार्टी का घोषणा पत्र - अध्याय - 13A : इस अध्याय का मूल अंग्रेजी संस्करण https://web.facebook.com/notes/10150423122501922 पर देखा जा सकता है )
. अध्याय . (13.1) क्या यह एक और मजाक है ? . (13.2) पैसा, समाचारपत्र विज्ञापनों के अलावा अन्य मद में लगाना बेकार है -- मुझे केवल आपका समय और आपके समाचार पत्र विज्ञापन चाहिए। . (13.3) प्रस्तावित काम करने का तरीका राईट टू रिकाल कार्यकर्ताओं के लिए -- वायरस अकेला एक दल के रूप में काम करता है। . (13.4) प्रजा अधीन-राजा क़ानून-ड्राफ्ट के प्रचार के तरीकों का कोई तय सेट या मॉडल क्यों नहीं है ? . (13.5) कार्यकलाप की सूची, कारण, और वह समय जो इनमें लगेगा : सेट-1- मतदाताओं के लिए . (13.6) पोस्ट-कार्ड, इनलैंड/अंतर्देशीय जैसी छोटी चीज भेजनी क्यों जरूरी है ? . (13.7) ये कदम कैसे मदद करते हैं- इन्टरनेट के द्वारा प्रचार . (13.8) ये कदम कैसे मदद करते हैं - बिना इन्टरनेट के प्रचार . (13.9) दान और सदस्यता-शुल्क जमा करने के बिना प्रचार के खर्चे कैसे पूरे होंगे और बिना संगठन के प्रचार कैसे होगा ? . ============ . (13.1) क्या यह एक और मजाक है ?
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मेरी प्रारंभिक लाइन थी, “तीन लाइन का 'जनता की आवाज-पारदर्शी शिकायत प्रणाली' (टीसीपी) कानून गरीबी से होने वाली मौतों और पुलिस में व्याप्त भ्रष्टाचार को केवल चार महीनों में ही कम कर सकता है” और यदि वह असंभव अथवा मजाक लगा हो तो यहां एक और मजाक है "यदि भारत में आर्थिक रूप से सबसे संपन्न शीर्ष 5 करोड लोगों में से मात्र 2,00,000 लोग मेरे द्वारा बताए गए उपायों पर मात्र दो से चार घंटा प्रति सप्ताह का समय दें तो 1 वर्ष के भीतर उन कार्रवाईयों से एक व्यापक आंदोलन पैदा होगा जो प्रधानमंत्री को 'जनता की आवाज - पारदर्शी शिकायत प्रणाली' कानून पर हस्ताक्षर करने को बाध्य कर देगा"। क्यों इतनी कम संख्या में लोगों की जरूरत है ? क्योंकि, मैं 'जनता की आवाज-पारदर्शी शिकायत प्रणाली' प्रारूपों का प्रचार क्लोन-पॉजिटिव तरीके से करने का प्रस्ताव कर रहा हूँ।
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यह क्लोन-पॉजिटीव आखिरकार क्या बला है ? मैं अगले पाठ में इसे विस्तार से बताऊंगा। यह सक्रिय रूप से काम करने के लिए सबसे महत्वपूर्ण संकल्पना/विचार है, और दुख की बात है कि भारत में अधिकांश कार्यकर्ताओं ने आज तक इसे नकारा है।
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(13.2) पैसा, समाचारपत्र विज्ञापनों के अलावा अन्य मद में लगाना बेकार है -- मुझे केवल आपका समय और आपके समाचार पत्र विज्ञापन चाहिए।
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मेरा विश्वास या कहें अन्धविश्वास है कि, ये शब्द “प्रजा-अधीन राजा” प्रत्येक वैसे व्यक्ति का हृदय छू लेगा जो गरीबी और भ्रष्टाचार कम करना चाहता है। और यह वाक्य “राजा को प्रजा अधीन होना चाहिए, वरना वह जनता को लूट लेगा और राष्ट्र का विनाश होगा” हरेक उस व्यक्ति के मन में बस जाएगा जो इसे एक बार सुन लेगा। वे लोग जो प्रजा-अधीन राजा की संकल्पना को पसंद करते हैं, उन्हें केवल एक बार यह सुनिश्चित करना है कि लोग एक बार इसके बारे में सुन लें। हमें किसी बाजारू चालबाजी की जरूरत नहीं है। हमें लोगों को प्रभावित करने के लिए किसी तमाशे अथवा ताकत दिखाने की भी जरूरत नहीं है। ये शब्द ही लोगों को 1000 बाजारू चालबाजी और खेल तमाशों से कहीं ज्यादा प्रभावित करेंगे। .
अब मेरा उद्देश्य 'जनता की आवाज-पारदर्शी शिकायत प्रणाली' , प्रजा अधीन राजा, नागरिकों और सेना के लिए खनिज रॉयल्टी (एम. आर. सी. एम.) कानूनों के ड्राफ्टों को पारित करवाना है। और पहली बार में एक मात्र उद्देश्य केवल यह सुनिश्चित करना है कि करोड़ों नागरिक शब्द “प्रजा अधीन राजा” और इससे जुड़े दोनों वाक्य सुन सकें, और अगले दौर में मैं 'जनता की आवाज-पारदर्शी शिकायत प्रणाली' कानून पारित करवाना चाहता हूँ। और मेरा यह विश्वास है कि यदि 'जनता की आवाज-पारदर्शी शिकायत प्रणाली' कानून पास हो जाता है तो लोग इस कानून का उपयोग करके अन्य कानून कुछ ही महीने में पारित करवा लेंगे।
सभी मौजूदा पार्टियों से अलग, चुनाव जीतना हमारे ऐजेंडे का सबसे बड़ा या सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा नहीं है। चुनाव लड़ना बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि किसी प्रस्तावित कानून के प्रस्तावित प्रारूप के बारे में नागरिकों को बताने के लिए चुनाव सबसे तेज माध्यम है। यदि मैं और राइट टू रिकॉल समूह के सभी लोग चुनाव हार भी जाते हैं तब भी हम भारत में सुधार ला सकते है। यदि हम नागरिकों को इस बात पर राजी कर सकें कि वे 'जनता की आवाज-पारदर्शी शिकायत प्रणाली' कानून पर हस्ताक्षर करने के लिए प्रधानमंत्री पर दबाव बनाने में राइट टू रिकॉल कार्यकर्ताओं के “साथ मिलकर” काम करें।
अब “साथ मिलकर” काम करने का क्या अर्थ है ?
क्या इसका अर्थ चन्दा इकट्ठा करना है ? नहीं। मैं दान के बिलकुल खिलाफ हूँ। मैं लोगों से राइट टू रिकॉल समूह के कानूनों के प्रचार के लिए समाचारपत्रों में विज्ञापन देने के लिए अवश्य कहता हूँ, लेकिन इसमें पैसा सीधे समाचारपत्र को जाता है। लोग मुझे या किसी राइट टू रिकॉल स्वयंसेवी को पैसा नहीं देंगे। और राइट टू रिकॉल समूह के सदस्यों के लिए समाचारपत्र में विज्ञापन देना उनकी मर्जी है। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण चीज, (समाचार पत्र के विज्ञापनों के अलावा) जिसकी मुझे जरूरत है - वह है आप का समय। अब मुझे आखिर आपका कितना समय चाहिए ? और आपके दिए समय के दौरान मैं आपसे क्या करवाना चाहता हूँ ? इस अध्याय में इसी बात को विस्तार से बताया गया है। कृपया इस पाठ का एक प्रिन्ट आउट ले लें।
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(13.3) प्रस्तावित काम करने का तरीका राईट टू रिकाल कार्यकर्ताओं के लिए -- वायरस अकेला एक दल के रूप में काम करता है।
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कई लोग कहते हैं कि सबसे ताकतवर प्राणी शेर है, कोई कहता है हाथी और कोई व्हेल। लेकिन मैं सोचता हूँ कि उन सबसे अधिक ताकतवर वायरस है| तो वायरस को क्या इतना ताकतवर बनाता है ?
मैं सभी कारण तो नहीं गिना सकता | लेकिन कुछ कारण मेरे अनुसार ये है --- हरेक वायरस अपने आप में पूरा है | हरेक वायरस के पास सारी सूचना है, जो उसे चाहिए| वायरस कभी भी दूसरे वायरस के साथ मुकाबला नहीं करता और कभी भी दूसरे वायरस से बचने की कोशिश नहीं करता| वायरस केवल दो चीजें करता है ---- संपर्क करने पर अपनी नकलें बनाता है, और संपर्क करने पर बदल जाता है| यदि 1000 वायरस हैं, तब 1000 वायरसों का एक दल नहीं है, लेकिन 1000 दल हैं, जिसमें हरेक में एक-एक वायरस है|
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ज्यादातर संस्थाएं, जिनको मैं मिलता हूँ , अपने कार्यकर्ताओं को सारी जानकारी लेने से रोकते हैं जबकि मैं अपने साथियों को सारी जानकारी लेने के लिए बढ़ावा देता हूँ| ज्यादातर संस्थाएं इस पर जोर देती हैं कि छोटे कार्यकर्ताओं को आँख बंद करके बड़े कार्यकर्ताओं के आदेश मानने चाहियें, लेकिन मैं खुले आम इस बात पर जोर देता हूँ कि किसी भी छोटे कार्यकर्ता को अपने बड़े कार्यकर्ताओं का आदेश नहीं मानना चाहिए, बल्कि उसे एक साथी की विनती के जैसे मानना चाहिए। और सबसे ज्यादा जरूरी, मैं हरेक को एक-एक के दल में काम करने के लिए कहता हूँ|
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ज्यादातर संस्थाएं बदलाव से इंकार करती है, और यहाँ तक कि उसके लिए सज़ा भी देती है। लेकिन मैं खुले आम सभी बदलावो का समर्थन करता हूँ| और बदलाव, यानी कि हर कोई अपने हिसाब से प्रधानमन्त्री को मजबूर करे कि प्रधानमंत्री 'पारदर्शी शिकायत प्रणाली' के क़ानून-ड्राफ्ट को भारतीय राजपत्र में डालें। मैं ये सुझाव देता हूँ कि 'प्रजा अधीन-राजा समूह' के कार्यकर्ता को अपने आसपास के सभी पार्टियों/समूहों के सभी कार्यकर्ताओं को क़ानून-ड्राफ्ट के बारे में जानकारी देनी चाहिए। और मेरे विचार से, 'प्रजा अधीन-राजा समूह' के कार्यकर्ताओं को क़ानून-ड्राफ्ट की जानकारी फैलाने के लिए एक संस्था , दफ्तर और पद-अधिकारीयों का ढांचा बनाने की जरूरत नहीं है।
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कार्यकर्ताओं को अन्य निस्वार्थ कार्यकर्ताओं को भी इन लोकतांत्रिक कानूनों का समर्थक बनने के लिए राजी करना चाहिए। ऐसा वे किस तरह कर सकते हैं ?
कार्यकर्ता, अन्य निस्वार्थ कार्यकर्ताओं को राजी करने की कोशिश कर सकते है कि, उनके दफ्तर और ढांचे का इस्तेमाल करके 'प्रजा अधीन-राजा' के क़ानून-ड्राफ्ट का प्रचार करना एक नेक काम है, तथा इन कानूनो से भारत को विदेशी देशों और कंपनियों के आक्रमण और विदेशी देशों और कंपनियों की गुलामी से बचाने में मदद मिलेगी। हर बार जब कोई 'प्रजा अधीन-राजा' कार्यकर्ता दूसरे कार्यकर्त्ता के संपर्क में आता है, तो वो संपर्क प्रस्तावित क़ानून-ड्राफ्ट में बदलाव और प्रचार के तरीकों में भी बदलाव लाएगा| जो बदलाव बेकार हैं, वे आगे नहीं बढेंगे और जो बदलाव बेहतर हैं, वे ही आगे बढेंगे| और अच्छे बदलाव प्रस्तावित क़ानून-ड्राफ्ट और प्रचार के तरीकों को और अच्छा बनाने और जानकारी अच्छे से फैलाने में मदद करेंगे| असल में, अभी के क़ानून-ड्राफ्ट और प्रचार के तरीके भी कई बदलावो के नतीजे है।
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(13.4) प्रजा अधीन-राजा क़ानून-ड्राफ्ट के प्रचार के तरीकों का कोई तय सेट या मॉडल क्यों नहीं है ?
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मैं विविधता को बढ़ावा देता हूँ, तथा सिवाय नाम, शर्तों और परिभाषा के अनुरूप होने के एकरूपता से कार्य करने पर जोर नहीं देता। यदि कोई व्यक्ति वैकल्पिक तरीके पर चलना चाहता है तो मैं उससे विनती करूंगा कि वह अपने तरीके पर चलने के साथ-साथ इस दस्तावेज में बताए गए तरीके पर भी चले। मैं विभिन्नता को बढ़ावा देता हूँ, क्योंकि कोई व्यक्ति जो किसी अन्य तरीके से सोचता है मेरे तरीके से अच्छा हो सकता है। और यदि वो तरीका अच्छा हुआ तो अधिक लोग उन्हें अपनाएंगे और जल्दी ही उन तरीकों को लोग इतनी अच्छी तरह से जान जाएंगे कि मुझे उन्हें अपनी सूची में जोड़ना पड़ेगा। साथ ही, मैं स्वयंसेवकों से अनुरोध करता हूँ कि वे कम से कम हर सप्ताह 60 मिनट का समय उन कार्यकलापों पर दें जिनका प्रस्ताव मैंने किया है। क्योंकि इस बात की संभावना है कि कार्यकलापों की मेरी सूची उसके कार्यकलापों की सूची से ज्यादा बेहतर हो।
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सेट-1 में दिए गए कार्यकलापों के लिए प्रति सप्ताह केवल एक से चार घंटे समय देने की जरूरत है और ये मतदाताओं के लिए है। प्रत्येक कतार में पहले कार्य-कलाप में उतना समय लगेगा जितना बताया गया है। लेकिन ‘अथवा’ भाग में बताए गए वैकल्पिक कार्य-कलाप में इससे ज्यादा समय लगेगा जो आपकी इच्छा‍ पर होगा।
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सेट-2 कार्यकर्ताओं के लिए है।
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सेट-3 ,केवल उनके लिए है जो नगर-निगम, पंचायत, विधानसभा या संसद के चुनाव लड़ना चाहते है।
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(13.5) कार्यकलाप की सूची, कारण, और वह समय जो इनमें लगेगा : सेट-1- मतदाताओं के लिए
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केवल एक से चार घंटे प्रति सप्ताह समय की जरूरत है। और इसमें बताया गया समय ही लगेगा। लेकिन वैकल्पिक कार्यकलापों में ज्यादा समय लग सकता है। वैकल्पिक कार्य कलापों जिनका उल्लेख “अथवा” भाग में किया गया है, उनमें ज्यादा समय लगेगा लेकिन वे वैकल्पिक होंगे, यानि आपकी इच्छा पर निर्भर करेंगे।
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सेट – 1 का कार्यकलाप : मतदाताओं के लिए। लगने वाला अनुमानित समय - एक से चार घंटे प्रति सप्ताह।
(1.1)
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(1) चार पृष्ठ के दस्तावेज डाउनलोड करें या कार्यकर्त्ता से कॉपी लें। http://righttorecall.info/001.pdf अथवा हिन्दी रूपान्तर -http://righttorecall.info/001.h.pdf अथवा गुजराती रूपान्तर - http://righttorecall.info/001.g.pdf अथवा बंगला रूपान्तर - www.righttorecall.info/001.b.pdf
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2.) कृपया ऊपर के दस्तावेज में दिए गए पहले प्रस्तावित 'जनता की आवाज-पारदर्शी शिकायत प्रणाली' कानून के प्रारूप को जोर से बोलकर पढ़ें अथवा/और कृपया ऐसे किसी भी कानून के प्रारूप का पता करें, डाउनलोड करें और पढ़ें, जो आप समझते है कि कुछ ही महीने में गरीबी से होने वाली मौतों और पुलिस में भ्रष्टाचार को कम कर सकता है।
अथवा/और
उन कानूनों के क़ानून-ड्राफ्ट लिखिए और इंटरनेट पर पोस्ट कीजिए जो आप समझते हैं कि गरीबी से होने वाली मौतों और पुलिस में व्याप्त भ्रष्टाचार कुछ ही महीने या कुछ वर्षों में कम कर देगा।
समय -- 30 मिनट (एक बार)
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(1.2) प्रजा अधीन राजा और 'जनता की आवाज़' कानून पर प्रायः पूछे जाने वाले प्रश्न – यहाँ से डाउनलोड करें – www.righttorecall.info/004.h.pdf , और इन्हें पढ़ने के लिए बांटें।
यदि आपके पास प्रस्तावित नए कानून 'जनता की आवाज पारदर्शी शिकायत प्रणाली' पर कोई प्रश्न है तो कृपया अपने प्रश्न http://forum.righttorecall.info पर डालें या किसी प्रजा अधीन-राजा कार्यकर्ता से पूछें।
समय -- 30-60 मिनट (एक बार)
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(1.3) सबसे जरूरी -
हर हफ्ते 25-30 पोस्ट कार्ड/बुकपोस्ट/इनलैंड नागरिक-वोटरों को भेजें जो वोटर लिस्ट में है। वोटर सूची इंटरनेट से प्राप्त की जा सकती है या आपके स्थानीय पार्टी कार्यकर्ता से प्राप्त की जा सकती है या आप फोन डॉयरेक्ट्री से भी वोटरों की सूची प्राप्त कर सकते है। उनसे विनती करें कि वे प्रधानमन्त्री/मुख्यमंत्री को एक तीन लाइन के क़ानून, जो कुछ ही महीनों में भ्रष्टाचार समाप्त कर सकता है, पर हस्ताक्षर करने के लिए चिट्टी लिखें।
'पोस्ट कार्ड नागरिक अभियान' का नमूना (एक पन्ना) - http://www.righttorecall.info/901.pdf
'बुक पोस्ट नागरिक अभियान' का नमूना (आठ पन्ने)- http://www.righttorecall.info/902.pdf
'इनलैंड (अंतर्देशीय) नागरिक अभियान' का नमूना (दो पन्ने) -www.righttorecall.info/903.pdf
समय - 60 मिनट हर हफ्ते
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(1.4)
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हस्ताक्षर अभियान - कृपया 'जनता की आवाज पारदर्शी शिकायत प्रणाली' कानून प्रार्थना-पत्र के लिए अपने क्षेत्र में हस्ताक्षर अभियान चलायें। इन्टरनेट पर http://www.petitiononline.com/rti2en/ पर हस्ताक्षर करें।
कैसे यह 'राइट टू रिकॉल', 'नागरिकों और सेना के लिए खनिज रॉयल्टी' कानूनों को लाने में हमारी मदद करेगा ?
इस याचिका का कोई राजनैतिक, कानूनी महत्व नहीं है। यह केवल एक प्रचार है। इस पर हस्ताक्षर करने वालो की संख्या जितनी अधिक होगी, इसकी परवाह करने वाले अन्य नागरिकों का ध्यान इसकी ओर खीचना हमारे लिए उतना ही आसान होगा। प्रधानमंत्री अवश्य ही इसे महत्व नहीं देंगे और इसलिए वह ऐसा अवश्य सोंचेगे कि इंटरनेट पर दिए गए हस्ताक्षर जाली हो सकते है, लेकिन यह संख्या निश्चित रूप से अधिक से अधिक जागरूक नागरिकों के सामने विज्ञापन करने और इसके बारे में बताने में उपयोगी होगी। याचिका पर आपके हस्ताक्षर करने से इसका महत्व बढ़ेगा, जिससे अधिक से अधिक लोग इन हस्ताक्षरों पर ध्यान देंगे और सबसे अच्छी बात कि इसमें आपका 2 मिनट से ज्यादा समय नहीं लगेगा।
अथवा/और
1.ऐसी किसी भी याचिका जो जनता की आवाज पारदर्शी शिकायत प्रणाली कानून की मांग करती हो अथवा किसी भी ऐसे अन्य कानून के क़ानून-ड्राफ्ट का प्रचार करें जिससे, आप समझते हैं कि गरीबी से होने वाली मौतें और पुलिस में भ्रष्टाचार कुछ ही महीनों में कम हो जाएगा।
2. किसी ऐसी पार्टी के समुदाय में शामिल हो जाएं जो उस कानून के ड्राफ्ट का समर्थन करती हो, जो आप समझते हैं, कि गरीबी से होने वाली मौतें और पुलिस में भ्रष्टाचार कुछ ही समय में कम कर सकती है।
अथवा/और आप, 'जनता की आवाज-पारदर्शी शिकायत प्रणाली' कानून की मांग करने वाली अपनी याचिका लिखिए।
समय --10 मिनट(एक बार)
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यदि आप नहीं जानते कि कैसे इंटरनेट का उपयोग किया जाता है तो , कृपया अपने किसी नजदीकी रिश्तेदार से कहिए कि -
1. आपके लिए एक ई-मेल आई डी बना दें|
2. www.forum.righttorecall.info पर आपका अकाउंट बना दें|
3. आपके लिए एक ट्विटर एकाउन्ट बना दें।
4. उपर्युक्त जनता की 'आवाज पारदर्शी शिकायत प्रणाली' याचिका पर हस्ताक्षर करें| 5. आपके लिए फेसबुक आई डी बना दें।
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(1.5) दूसरा सबसे जरूरी काम।
हर महीने या हर साल मतदाताओं को मतदाता सूची से 1000 पर्चे भेजना -
मैं कार्यकर्ता से विनती करता हूँ कि ऐसे व्यक्ति से बात कर के सेटिंग कर ले , जिसके पास छोटी पत्रिका है और अपनी 'प्रजा अधीन-राजा' पत्रिका शुरू करे। 32 पन्नों के पत्रिका की हज़ार कॉपियां की कीमत अखबारी कागज़ पर लगभग 3 रू तथा अच्छे कागज पर 6 रू होगी। और मतदाताओं को बांटने का खर्चा 25 पैसा आएगा। क्योंकि यदि पत्रिका पंजीकृत है तो डाक 25 पैसे में पहुंच जायेगी। ये चरण महँगा है और सभी के लिए नहीं है। केवल उन्ही के लिए है जो रु. 1000 हर महीने खर्च कर सकते है। यदि पत्रिका रजिस्ट्रीकृत नहीं है तो इसे अपने आस-पास कार्यकर्ताओं को हाथ से बांटना होगा।
समय - 10 घंटे
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1.6 फोरम, फेसबुक, ऑर्कूट और गूगल समूहों में एक “उपयुक्त” प्रोफाइल बनाएं, जिसके साथ 'Prajaa Adhin Rajaa' या 'Right to recall' जुड़ा हो। ये अंग्रेजी में होना चाहिए भारतीय भाषाओँ में नहीं। क्योंकि अभी इन्टरनेट पर भारतीय भाषाओँ में ढूँढना संभव नहीं है।
1) प्रजा अधीन राजा/राइट टू रिकॉल फोरम (www.forum.rigttorecall.info) और फेसबुक कम्युनिटी(www.facebook.com/rightorecall) में शामिल हो जाएं
2) http://www.righttorecall.info के लिए सूची “फॉलो द ब्लॉग” में स्वयं को शामिल करें।
3) http://www.orkut.co.in/Main#Communi... पर प्रजा अधीन राजा/राइट टू रिकॉल आर्कूट समुदाय में शामिल हो जाएं।
4) http://groups.google.com/group/Righ... पर गूगल समूह में शामिल हो जाएं।
यह मुझे राइट टू रिकॉल कानून लाने में कैसे मदद करेगा ?
आप इंटरनेट पर पोस्ट किए गए लेख का ई-मेल आसानी से प्राप्त कर सकते हैं। और हां जैसे-जैसे इस समुदाय में शामिल होने वाले लोगों की संख्या बढ़ेगी, मेरे लिए जागरूक नागरिकों की विशाल संख्या को आकर्षित करना आसान होता जाएगा।
अथवा/और
किसी फोरम, ब्लॉग, गुगल, ऑरकुट समूह में शामिल हो जाएं , जो प्रजा अधीन राजा/राइट टू रिकॉल को समर्थन देते है। किसी फेसबुक समुदाय में शामिल हो जाएं। किसी ऐसे व्यक्ति के ब्लॉग का अनुसरण करें जो राइट टू रिकॉल कानूनों के लिए प्रचार अभियान चला रहा हो और जिसने प्रजा अधीन राजा को बढ़ावा देने के लिए कम से कम एक विज्ञापन किसी बड़े अखबार में दिया हो, अथवा जिसने कम से कम 50,000 प्रजा अधीन राजा की पर्चियां/पैम्फलेट बांटी हो
अथवा/और
एक अपना ऐसा फोरम, ब्लॉग, ऑर्कूट या गूगल या फेसबुक समुदाय बनाएं जो प्रजा अधीन राजा और पारदर्शी शिकायत/प्रस्ताव प्रणाली अथवा कोई ऐसा क़ानून-ड्राफ्ट जो गरीबी से होने वाली मौतें और पुलिस में भ्रष्टाचार को तेजी से कम कर सके, का समर्थन करता हो और कम से कम 1000 लोगों को उस समुदाय में शामिल होने को कहें।
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(क) अपने राज्यो के राइट टू रिकॉल समूह में शामिल हो जाएं। उदाहरण के लिए, यदि आप उत्तर प्रदेश के निवासी है तो प्रजा अधीन राजा उत्तर प्रदेश समुदाय में शामिल हो जाएं। यदि आपके राज्य के लिए कोई राइट टू रिकॉल समुदाय नहीं है तो आप खुद ही एक ऐसा समुदाय प्रारंभ करें।
(ख) कृपया अपने जिले/शहर के ऑर्कूट, फेसबुक आदि पर 'प्रजा अधीन-राजा समूह' में शामिल हो जाएं। यदि ऐसा समुदाय आपके जिले/शहर में नहीं है तो कृपया एक समुदाय प्रारंभ करें और ऑर्कूट पर इसका प्रचार करें। कृपया यह पक्का करें कि जिला समुदाय का हर सदस्य राज्य व राष्ट्रीय समुदाय का भी सदस्य हो।
समय - 30 मिनिट प्रति हफ्ता
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1.7 बगीचा/बाग बैठक – हर महीने एक बैठक करें।
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कृपया अपने तहसील/वार्ड के राइट टू रिकॉल समूह में शामिल हो जाएं। यदि ऐसा समुदाय आपके तहसील/वार्ड में नहीं है तो कृपया एक समुदाय प्रारंभ करें और ऑर्कूट/फेसबुक पर इसका प्रचार करें। कृपया यह सुनिश्चित करें कि जिला समुदाय का हर सदस्य राज्य व राष्ट्रीय समुदाय का भी सदस्य हो।
समय - 1 घंटे हर महीने
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1.8 राष्ट्रीय स्तर पर तालमेल बनाने के लिए ट्विटर/फेसबुक/ऑर्कूट का अनुसरण करें। और शहर के प्रमुखों के ट्विटर एकाउन्ट का अनुसरण करें। और अपने वार्ड/तहसील व शहर के कम से कम दो सहयोगियों और पड़ोस के वार्ड/तहसील व शहर के दो सहयोगियों का अनुसरण करें। कुल मिलाकर एक व्यक्ति को एक संचार नेटवर्क कायम करने के लिए लगभग 10 एकाउन्ट को फॉलो करना चाहिए।
अथवा/और
किसी राष्ट्रीय/राज्य स्तर के ऐसे व्यक्ति के एकाउन्ट का अनुसरण करें जिसने राइट टू रिकॉल कानूनों को बढ़ावा देने के लिए स्वयं को समर्पित कर दिया हो।
अथवा/और
यदि आप यह समझते हैं कि इनमें से कोई भी अनुसरण करने लायक नहीं है तो कृपया आप स्वयं राइट टू रिकॉल कानूनों के प्रचारक की भूमिका निभाएं और 1000 लोगों को आप अपने ट्विटर का अनुसरण करने के लिए कहें।
समय - 20 मिनट
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1.9. इन्टरनेट द्वारा राजनैतिक पार्टियों या गैर सरकारी संगठनों के कम से कम 5 समुदायों से जुड़ें। ये समूह ऑर्कूट अथवा फेसबुक अथवा किसी सामुदायिक साईट पर हो सकते है। आपको किस समूह से जुड़ना चाहिए ? किसी भी ऐसे समूह से जुड़िए जिसमें आप समझते हैं कि, ऐसे सदस्य है जो राजनीति में रूचि रखते हैं।
समय - 20 मिनट
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1.10. प्रजा अधीन-राजा समूह के विडियो देखें - सी.डी /यू-ट्यूब देखें और दूसरों को भी दिखाएँ। हर हफ्ते एक विडियो देखें। ऐसे सभी कार्यकर्ताओं जिन्होंने राइट टू रिकॉल के विडियो अपलोड किए हैं/कम्प्युटर द्वारा इंटरनेट पर डाले हैं। उनके यू-ट्यूब चैनलों का अनुसरण करें ताकि राइट टू रिकॉल समूह से संबंधित विडियो आपको मिल जाएं।
अथवा/और
किसी ऐसे व्यक्ति के यू-ट्यूब एकाउन्ट का अनुसरण करें जो, आप समझते हैं कि भारत में प्रजा अधीन राजा कानूनों के ड्राफ्टों को लाने के लिए समर्पित हो। कृपया अनुसरण करने का निर्णय उस व्यक्ति द्वारा प्रस्तावित कानूनों के प्रारूपों को पढ़ने के बाद ही करें।
समय - 30 मिनट हर हफ्ते।
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1.11. चुनाव प्रचार में पर्चे बांटना - यदि चुनाव चल रहे हैं, तो कृपया पता लगाएं आप के इलाके में या पास के इलाके में कौन सा उम्मीदवार खड़ा है जिसने प्रजा अधीन-राजा के क़ानून-ड्राफ्ट अपने घोषणा-पत्र में डाले है और उस का प्रचार भी किया है। इन्टरनेट के जरिये या किसी कार्यकर्ता से उसके पर्चे लेकर 10-20-1000 पर्चे बांटें। आपकी इच्छा अनुसार।
अथवा
यदि उम्मीदवार आप के घर से बहुत दूर है, तो कृपया इन्टरनेट से मतदाता-सूची डाउनलोड करें और 10-20 या अधिक , आपकी इच्छा अनुसार उसके चुनाव-क्षेत्र के मतदाताओं को भेजें।
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1.12 एस.एम एस से प्रजा अधीन-राजा का प्रचार करना - पारदर्शी शिकायत प्रणाली, राईट टू रिकाल, नागरिक और सेना के लिए खनिज रोयल्टी आदि के बारें में एस.एम.एस भेजें।
समय - एक घंटा हर महीना।
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1.13 से 1.20 अभी जोड़ना बाकी है।
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1.21. प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री को एक पत्र लिखें जिसमें आप उन्हें जनता की आवाज-पारदर्शी शिकायत प्रणाली कानून पर हस्ताक्षर करने के लिए कहें। इस पत्र में केवल एक लाइन ही लिखें : “यदि आप संतुष्ट हैं या जब भी आप संतुष्ट हों कि भारत के 37 करोड़ नागरिक मतदाता http://petitiononline.c.com/rti2en/ अथवा http://righttorecall.info/002.pdf पर दी गई सरकारी अधिसूचना का समर्थन करते है तो आप कृपया उस अधिसूचना पर हस्ताक्षर कर दें” यदि संभव हो तो अपने पत्र के साथ अपने मतदाता पहचान पत्र की फोटोकॉपी संलग्न कर दें।
ऐसा करने का मकसद : प्रधानमंत्री और उनका स्टॉफ एक पत्र पर ध्यान नहीं देंगे लेकिन एक ही विषय पर लिखे गए सैकड़ों पत्र पर अवश्य ध्यान देंगे।
अथवा/और
किसी ऐसी याचिका पर हस्ताक्षर करें जिसमें आप समझते हैं कि, राइट टू रिकॉल तथा 'जनता की आवाज' कानूनों की मांग की जा रही हो और प्रधानमंत्री को एक पत्र भेजें जिसमें उनसे कहें कि वे प्रस्तावित कानून को पारित कर दें।
अथवा/और
आप अपनी याचिका स्वयं लिखिए और उसमें 'जनता की आवाज-पारदर्शी शिकायत प्रणाली’ अथवा राइट टू रिकॉल कानूनों की मांग करें अथवा वैसे कानूनों की मांग करें जिसे आप समझते हैं कि वह 'जनता की आवाज-पारदर्शी शिकायत प्रणाली’, राइट टू रिकॉल के ही समान है अथवा उससे भी बेहतर है। और कम से कम 1000 लोगों को उन याचिकाओं पर हस्ताक्षर करने के लिए कहें और फिर पत्र प्रधानमंत्री को भेज दें।
समय - एक घंटा (एक बार)
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1.22 स्थांनीय सांसद, विधायक, पार्षद, महापौर, पंचायत के सदस्य को एक पत्र भेजें – जिसमें आप उन्हें प्रधानमंत्री को 'जनता की आवाज-पारदर्शी शिकायत प्रणाली कानून पर हस्ताक्षर करवाने के लिए कहें। इस पत्र में केवल एक लाइन ही लिखें और कुछ नहीं : “जब आप संतुष्ट हो जाएं कि आपके क्षेत्र के नागरिक मतदाताओ का स्पष्ट बहुमत http://petitiononline.c.com/rti2en/ अथवा http://righttorecall.info/002.pdf पर प्रस्तावित सरकारी अधिसूचना का समर्थन करते है तो आप कृपया उस अधिसूचना पर हस्ताक्षर करने के लिए प्रधानमंत्री से कहें”
अथवा/और
किसी ऐसी याचिका पर हस्ताक्षर करें जिसमें आप समझते हैं कि राइट टू रिकॉल तथा जनता की आवाज -पारदर्शी शिकायत प्रणाली कानूनों की मांग की जा रही हो और सांसद को एक पत्र भेजें जिसमें उनसे कहें कि वे प्रस्तावित कानून को पारित कर दें।
अथवा/और
आप अपनी याचिका स्वयं लिखिए और उसमें 'जनता की आवाज- पारदर्शी शिकायत प्रणाली' अथवा राइट टू रिकॉल कानूनों की मांग करें अथवा वैसे कानूनों की मांग करें जिसे, आप समझते हैं कि वह 'पारदर्शी शिकायत प्रणाली', राईट टू रिकाल के ही समान है अथवा या उससे भी अच्छा है। और कम से कम 1000 लोगों को उन याचिकाओं पर हस्ताक्षर करने के लिए कहें और फिर वह पत्र सांसद को भेज दें।
समय - दो घंटे (एक बार)
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1.23 स्थानीय सत्तारूढ़ दल और प्रमुख दलों के सदस्यों को 'जनता की आवाज' और अन्य 'प्रजा अधीन-राजा' समूह द्वारा प्रस्तावित जन-हित के क़ानून का प्रिंट आउट लेकर दें और उनसे कहें कि वे प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री से 'जनता की आवाज' कानून पर हस्ताक्षर करने के लिए कहें और उनके विधायक, सांसद को ये क़ानून तुरंत लाने के लिए कहें। सभी जमीनी कार्यर्ताओं से भी कहे।
समय - दो घंटे हर महीने
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1.24 प्रत्येक उस समाचार पत्र, पत्रिका, टी.वी के चैनल को पत्र लिखें, ई-मेल भेजें और फोन करें, जिन्हें आप देखते हैं। उनसे कहें कि वे 'जनता की आवाज', प्रजा अधीन राजा कानूनों, 'नागरिकों और सेना के लिए खनिज रॉयल्टी' और जूरी प्रणाली अथवा कोई ऐसा क़ानून-ड्राफ्ट जिसे आप समझते हैं कि वह पुलिस वालों और जजों में भ्रष्टाचार कम कर सकता है, इनके विषय में छापें। उन्हें हमारी वेबसाइट से लेख लेकर छापने को कहें या हमारा अथवा किसी प्रजा अधीन राजा समूह का साक्षात्कार लेने के लिए कहें।
समय - एक घंटा हर महीने
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1.25 गैर सरकारी संगठनों की बैठकों में जितना संभव हो सके उतना अधिक से अधिक भाग ले और उनसे पूछे कि क्यों वे 'जनता की आवाज' का समर्थन नहीं करते। प्रत्येक बुद्धिजीवी से पूछें कि वे 'जनता की आवाज' तुरंत लाने का समर्थन करते हैं या विरोध ?
समय - दो घंटे हर महीने
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सेट 1 की उपर्युक्त सूची में दिए गए कार्य को करने में ज्यादा से ज्यादा आपके हर हफ्ते चार घंटे लगेंगे। और यदि आप चाहें तो इस समय को अलग अलग दिनों में बांटकर भी कर सकते है।
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(13.6) पोस्ट-कार्ड, इनलैंड/अंतर्देशीय जैसी छोटी चीज भेजनी क्यों जरूरी है ?
दरअसल राईट-टू-रिकाल जैसे प्रजा हित के कानूनों को कभी भी मीडिया का समर्थन नहीं मिलेगा, और इसीलिए 'प्रजा अधीन-राजा' के कार्यकर्ताओं को बड़े पैमाने पर अपना मास-मीडिया नेटवर्क बनाने की जरुरत है जो क़ानून-ड्राफ्ट के बारे में नागरिकों को जानकारी दे सके। और ऐसे मीडिया पर किसी केंद्रीय शासन या धनिक वर्गों का नियंत्रण नहीं होना चाहिए।
इसके अलावा, कार्यकर्ताओ को चाहिए कि वे मतदाताओं को पोस्टकार्ड, इनलैंड आदि भेजने का अभियान चलाएं। और यह अभियान किसी केंद्रीय इकाई के ऊपरी नियंत्रण में नहीं हो। ऊपरी नियंत्रण को भूल जायें, मैं शून्य नियंत्रण चाहता हूँ—यानी हर एक व्यक्ति जो अपना समय और पैसा देता है उसका अपने संचार माध्यम पर पूरा नियंत्रण होना चाहिए और किसी अन्य व्यक्ति का नहीं। इसीलिए “मतदातों को पोस्टकार्ड, इनलैंड भेजने का अभियान प्रचार का सबसे अच्छा तरीका है।
पोस्ट-कार्ड का खर्चा 50 पैसा आएगा, और यदि इसे किसी अन्य के द्वारा लिखवाते हैं तो 75 पैसे और लगेंगे| इनलैंड के ढाई रूपये लगेंगे और 50 पैसे छापने, लिखने, पता लिखने और मोड़ने के लिए लगेंगे| इनलैंड का फायदा ये है कि कम समय लगेगा, क्योंकि इसे छाप सकते हैं। यदि आप किसी के द्वारा पोस्ट-कार्ड लिखवाते हैं, तो उसे संभालने के लिए थोडा समय लगेगा जबकि इनलैंड प्रिंटर द्वारा छापे जा सकते है।
निचले वर्ग के 95% लोगों तक पहुँचने के लिए पोस्टकार्ड और इनलैंड सबसे अच्छा तरीका है। और ये जरूरी नहीं है कि केवल भारत के निचले 95% लोग ये जानें, कि 'भ्रष्ट को नागरिकों द्वारा बदलने का अधिकार' राईट टू रिकाल क्या है, बल्कि ये ज्यादातर लोगों को साफ हो जाना चाहिए कि दूसरे अधिकतर लोग भी इसके बारे में जानते है। और ये भी साफ़ हो जाना चाहिए कि प्रधानमन्त्री, मुख्यमंत्री, विधायक, सांसद, अधिकतर बुद्धिजीवी 'प्रजा अधीन-राजा' का विरोध कर रहे है। इसी को मैं माहौल बनाना बोलता हूँ।
माहौल बनाने के लिए वैसे तो समाचार पत्र, टी.वी और पत्रिका आदि के माध्यम से बहुत बड़ा अभियान चलाना होता है। लेकिन जो टी.वी चैनल और समाचार-पत्रों के प्रायोजक है, वे कभी भी 'प्रजा अधीन-राजा' के कानूनों का समर्थन नहीं करेंगे, इसीलिए कार्यकर्ताओं को ये काम बिना मीडिया ही करना होगा। इसीलिए ये बहुत जरूरी है कि कार्यकर्ता पोस्टकार्ड या इनलैंड नागरिकों को भेजे। ताकि यह अपने आप में एक मीडिया बन जाये।
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मैं सभी राईट टू रिकॉल कार्यकर्ताओ से विनती करता हूँ कि वे मीडिया वालों को कहें कि 'प्रजा अधीन-राजा' के बारे में जानकारी को उनके समाचार-पत्रों, पत्रिकाओं, टी.वी चैनलों में डालें/छापें।
मैं सभी राईट टू रिकॉल कार्यकर्ताओ से इसीलिए मीडिया, अखबार, टी.वी चैनल आदि को कहने के लिए विनती कर रहा हूँ, क्योंकि इससे वे देख सकते हैं कि मीडिया वाले 'प्रजा अधीन-राजा' के प्रस्तावों के कितने खिलाफ है। मीडिया वाले इन प्रस्तावों के खिलाफ क्यों हैं ? क्योंकि हमारा एक प्रस्ताव 'प्रजा अधीन-दूरदर्शन अध्यक्ष' भी है। जब वो आ जायेगा तो दूरदर्शन सुधरेगा और समाचारों को छुपाने की मीडिया की ताकत कम हो जायेगी, और मीडिया वालों की नाजायज आमदनी कम हो जायेगी। इसीलिए, मीडिया वाले कभी भी 'प्रजा अधीन-राजा' कानूनों का समर्थन नहीं करते।
ये दुःख की बात है, कि मीडिया वाले कभी भी 'प्रजा अधीन-राजा' के क़ानून-ड्राफ्ट का समर्थन नहीं करेंगे। लेकिन एक आशा की किरण यह है कि एक ऐसा रास्ता मौजूद है जिससे 'प्रजा अधीन-राजा' कानूनों का आंदोलन बिना मीडिया के समर्थन के भी खड़ा किया जा सकता है। और वो रास्ता 'मतदाताओं को पोस्ट-कार्ड/इनलैंड भेजने का अभियान' है। यदि 2 लाख कार्यकर्ता हर महीने 100 पोस्ट कार्ड या इनलैंड या पत्रिकाएं भेज रहे हैं, तो एक करोड़ से ज्यादा परिवारों को जानकारी मिलेगी कि 'प्रजा अधीन-राजा' की प्रस्तावित सरकारी अधिसूचनाएं क्या है। ये सारे मीडिया, अखबारों, टी.वी चैनल आदि को मिलाकर भी ज्यादा ताकतवर अभियान है। 6 महीनों में एक आंदोलन खड़ा करने के लिए ये तरीका काफी कारगर होगा तथा यह प्रधानमन्त्री, मुख्यमंत्री को जनहित के क़ानून ड्राफ्ट को गैजेट में प्रकाशित करने के लिए मजबूर कर देगा। लेकिन यदि करोड़ों नागरिकों को कोई भी जानकारी नहीं है कि भारतीय राजपत्र क्या है, और प्रस्तावित 'प्रजा अधीन-राजा' की सरकारी अधिसूचनाएं क्या है, तो कोई भी आंदोलन कभी खड़ा नहीं हो पायेगा। इसीलिए पोस्ट-कार्ड/इनलैंड नागरिकों को भेजना इस आंदोलन को खड़ा करने के लिए बेहद जरुरी है।
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(13.7) ये कदम कैसे मदद करते हैं- इन्टरनेट के द्वारा प्रचार
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आजकल (मई 2011) संगठनों की एक नयी नस्ल आयी है जो ज्यादा पैसे इकठ्ठा नहीं करते, जैसे 'इंडिया अगेंस्ट करप्शन'। लेकिन उनके प्रायोजक विदेशी कंपनियां हैं। और इसीलिए विदेशी कम्पनियाँ इनका प्रचार करने के लिए मीडिया को हजारों करोड़ रूपये देती हैं| लेकिन राईट टू-रिकाल आंदोलन के लिए विदेशी कंपनिया मीडिया के कभी भी प्रायोजक नहीं बनेंगे। इसीलिए हम उनके मॉडल की नक़ल नहीं कर सकते।
एक अनुमान यह है कि भारत में लगभग 6 करोड़ लोगों के पास उनके घर के व्यक्तिगत पीसी या कार्यालय के कम्प्युटर या कॉलेज के व्यक्तिगत पीसी के जरिए ब्राड बैंड उपलब्ध है। इन 6 करोड़ लोगों में से लगभग 15 लाख से 20 लाख लोग पुलिस व न्यायालय में भ्रष्टाचार कम करने में रूचि रखते है। वे गरीबी कम करने के भी इच्छुक है, और कुछ हद तक वे हर सप्ता‍ह 1-2 घंटे या इससे अधिक समय देना भी चाहते हैं। बाकी लोग इसमें बिलकुल भी रूचि नहीं लेंगे और ज्यादा से ज्यादा वे यही करेंगे कि किसी ऐसे व्यक्ति को वोट देंगे जिन्हें वे समझते हैं कि वह गरीबी कम कर देगा। लेकिन वे इस कार्य के लिए हर सप्ताह एक घंटा समय देना नहीं चाहते। इसलिए आन्दोलन खड़ा करने के लिए हमें इन 15 लाख लोगों का समर्थन प्राप्त करने पर निर्भर रहना होगा।
इन 15 लाख नागरिकों के बीच हमारा कुछेक संचार समूह बनाने का लक्ष्य है। मैं इन लोगों को संगठित करने की जरूरत नहीं समझता। मेरे विचार से, संचार समूह बनाना ही काफी है। हमें किसी संगठन की जरूरत नहीं है। संगठन संचार संगठन से अलग प्रकार का होता है और इस बात को मैं बाद में विस्तार से बताउंगा। इसलिए किसी संचार समूह की स्थापना करना और उसमें रहकर काम करने के लिए इस प्रकार कार्य करने चाहिए – समूहों को बनाना या उनकी खोज करना, इन संचार समूहों में शामिल हो जाना, उस संचार समूह के संदेशों को पढ़ना, यदि समय हो तो मैसेज लिखना, लिखे संदेशों को समूह के बीच या समूह से बाहर के लोगों तक भेजना और गरीबी, भ्रष्टाचार कम करने में रूचि रखने वाले लोगों की खोज करके उन्हें संचार समूह में शामिल होने के लिए कहना। और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उस संचार समूह से सम्पर्क तोड़ लेना जिसके मुखिया भ्रष्टाचार और गरीबी कम करने में रूचि नहीं रखते।
उपर दिए गए काम में इंटरनेट समुदाय से जुड़ने का ही काम है। मैं आप लोगों से इंटरनेट समुदाय से जुड़ने के लिए क्यों कह रहा हूँ?
इसका उद्देश्य इंटरनेट पर अनेक राइट टू रिकॉल के बड़े-बड़े समर्थक समूहों का निर्माण करना है, ताकि बिना खर्च के समुदाय गठित करना संभव हो सके। राइट टू रिकॉल तथा नागरिकों और सेना के लिए खनिज रॉयल्टी जैसी नैतिक और उपयुक्त मांग के लिए किन्हीं बड़े दिखावों की जरूरत नहीं है लेकिन इसके लिए बहुत अधिक संचार की जरूरत अवश्य है।
और संपर्क स्थापित करने के लिए बहुत अधिक प्रयास करने की जरूरत पड़ेगी, क्योंकि मीडिया-मालिक राइट टू रिकॉल के प्रारूपों को संचारित करने पर अपने पैसे खर्च नहीं करेंगे और इसलिए राइट टू रिकॉल का समर्थन करने वाले लोगों के पास कड़ी मेहनत करने के अलावा और कोई रास्ता नहीं बचता है। इसलिए, हम इंटरनेट का इस्तेमाल करके राइट टू रिकॉल के प्रारूपों को लोगों तक पहुंचा सकते है।
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(13.8) ये कदम कैसे मदद करते हैं - बिना इन्टरनेट के प्रचार
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भारत में केवल 5% लोगों के पास ही इन्टरनेट है। अब शेष 95 प्रतिशत लोगों तक सन्देश पहुंचाने के लिए क्या करें, जिनके पास इंटरनेट नहीं है ? इंटरनेट की सुविधा वाले 5 प्रतिशत लोगों में से कुछ लोग ज्यादा सक्रिय होकर इन सूचनाओं को बातचीत द्वारा बताकर अथवा पर्चियों के माध्यम से शेष 95 प्रतिशत लोगों तक पहुंचाएंगे।
और जिन लोगों के पास इन्टरनेट नहीं है, वो बुक पोस्ट, पोस्ट कार्ड और इन-लैंड, एस.एम.एस, पर्चे द्वारा भी अपने जिले के मतदाताओं तक सूचनाएं पहुंचा सकते हैं | आपके जिले की मतदाता सूची किसी भी पार्टी के स्थानीय कार्यकर्ताओं से मिल जायेगी या इन्टरनेट से भी मिल सकती है| और गरीब व्यक्ति भी पोस्ट-कार्ड लिख कर प्रचार में भाग ले सकता है |
सबसे जरुरी कदम नागरिकों को पोस्टकार्ड या इनलैंड भेजना है , जो क्रम-रहित तरीके से मतदाता सूची से लिए गए हों| यदि 2,00,000 कार्यकर्ता हर महीने 100 पोस्टकार्ड भेजते हैं, तो इसका मतलब है कि 2 करोड़ परिवारों को एक पोस्टकार्ड हर महीने मिलेगा और इसका खर्चा केवल 50 रू हर महीने है। और इसमें 4 घंटे हर महीने खर्च किया जाएगा| या फिर 2 लाख कार्यकर्ता यदि हर महीने 20 इनलैंड भेज रहे हैं तो 40 लाख लोगों को एक इनलैंड मिलेगा और इसका खर्च हर महीने केवल 50 रू आएगा। और इसमें हर महीने 4 घंटे लगेंगे।
अगला कदम समाचार पत्र में प्रचार करना है| पहले पन्ने पर 2 कॉलम * 25 सेंटीमीटर (एक पन्ने का आठवाँ हिस्सा ) ( 2 कॉलम= 9.5 सेंटीमीटर ) का प्रचार एक गैर-अंग्रेजी समाचार-पत्र में करने के लिए 2 लाख रुपये खर्च होंगे और ये प्रचार एक से तीन लोकसभा चुनाव क्षेत्र के लिए काफी होगा| यदि हमारे पास भारत में 20,000 कार्यकर्ता हैं जो हर महीने 1000 रुपये खर्च करने के लिए तैयार हैं, 5000 कार्यकर्ता जो हर महीने 2000 रुपये खर्च करने के लिए तैयार हैं, 500 कार्यकर्ता जो हर महीने 5000 रुपये खर्च करने के लिए तैयार हैं और 500 लोकसभा चुनाव क्षेत्र हैं। तब यदि कार्यकर्ता अपने पैसे का आधा हिस्सा समाचार पत्र के लिए दें और कुछ कार्यकर्ता कुछ महीनों के लिए पैसे इकठ्ठा करें तब हर साल हम हर लोकसभा चुनाव क्षेत्र के लिए 4-5 समाचार-पत्र के विज्ञापन दे सकते हैं| ( क्योंकि कई विज्ञापन एक से अधिक लोकसभा चुनाव क्षेत्र के लिए प्रचार करेंगे)
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पेम्पलेट - एक 16 पन्नों के पर्चे के लिए 3 रुपये खर्चा आएगा। बांटने के खर्च को मिलाकर हर महीने 30,000 रुपये के साथ हम 10,000 पर्चे एक लोकसभा चुनाव क्षेत्र में बाँट सकते हैं| इस तरह, कुछ 50 कार्यकर्ता हर लोकसभा चुनाव क्षेत्र में यदि 'प्रजा अधीन-राजा' के क़ानून-ड्राफ्ट का प्रचार करते है, तो एक साल में सभी लोगों तक ये जनहित के क़ानून-ड्राफ्ट पहुँच सकते हैं। और 'प्रजा-अधीन राजा के कार्यकर्ता 2-5% वोट हर पंचायत, पार्षद, विधायक और सांसद के पद के लिए पक्का कर सकते हैं| 'प्रजा अधीन-प्रधानमन्त्री','प्रजा अधीन-मुख्यमंत्री' आदि कानूनों को भारतीय राजपत्र में लाने के लिए ये काफी होगा| नए व्यक्ति को जानकारी देने के लिए 2,4,8 पन्नों के पर्चे दिए जा सकते हैं। तथा बाद में अधिक पन्नों के पर्चे दिए जा सकते है|
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तो जो काम मैं प्रस्तावित कर रहा हूँ वो छोटे हैं लेकिन आपस में पूरी तरह से जुड़ते हैं| यदि हर कार्यकर्ता सोचता है कि वो अकेला ये काम नहीं कर पायेगा तो वो ये काम नहीं करेगा| लेकिन यदि कार्यकर्ता को विश्वास है कि, इस काम में 2 लाख अपरिचित कार्यकर्ता भी जुड जाएँगे जो इस अध्याय के भाग-13.5 में दिए गए कदम के अनुसार काम करेंगे तो 'प्रजा अधीन-राजा' के क़ानून-ड्राफ्ट 2-3 सालों से कम में लागू हो जाएँगे |
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(13.9) दान और सदस्यता-शुल्क जमा करने के बिना प्रचार के खर्चे कैसे पूरे होंगे और बिना संगठन के प्रचार कैसे होगा ?
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अब क्या हमें एक संचार समूह चलाने के लिए पैसे की जरूरत है ? व्यावहारिक ज्ञान यह कहता है कि हमें हर काम के लिए पैसे की जरूरत होती है| फिर, क्या फर्क है 'प्रजा अधीन-राजा' और उन अन्य संस्थाओं में जो पैसे इकठ्ठा करते हैं ?
देखिये, दूसरी संस्थाओं में कार्यकर्ताओं को पैसे संगठन के सबसे ऊपर के लोगों को भेजना होता है और ये उम्मीद करनी होती है कि ऊपर के लोग और बीच के स्तर के लोग ये पैसा नहीं खायेंगे। संघठन के शीर्ष पर बैठे लोगो के पास पैसा नहीं खाने के कारण है – ख्याति जो एक दिन सत्ता/पद में बदल जायेगा| लेकिन बीच के लोगों के पास कोई नाम बनाने का अवसर नहीं होता और जो थोडा बहुत नाम उनको मिलता है उससे उनको पद नहीं मिलेगा| इसीलिए बीच के लोगों से ये उम्मीद करना कि वो पैसे नहीं खायेंगे, बहुत ज्यादा उम्मीद करना है|
जबकि 'प्रजा अधीन-राजा' के मॉडल में कार्यकर्ता सीधे ही सभी पैसे खर्च करते हैं और एक भी पैसा किसी 'प्रजा अधीन-राजा के दफ्तर या पद-अधिकारी को नहीं देते हैं| इसीलिए कभी भी पैसा खाना संभव नहीं है। उदाहरण के लिए 'प्रजा अधीन-राजा' के कार्यकर्ता यदि इन्टरनेट पर प्रचार कर रहे हैं तो वो पहले से ही इन्टरनेट की कंपनी को पैसे शुल्क के रूप में दे रहे हैं| और वो कोई भी पैसा किसी ऊपर के दफ्तर या व्यक्ति को नहीं दे रहे हैं। इसी तरह जिन कार्यकर्ताओं को समाचार-पत्र में विज्ञापन देने हैं वो भी विज्ञापन खुद देंगे और किसी भी कार्यकर्ता को ऊपर के दफ्तर/संगठन में पैसा नहीं भेजना होगा|
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अब मैं यह बताने जा रहा हूँ कि इस कार्य के लिए संगठन की जरूरत नहीं है और संगठन बनाकर काम करना केवल समय की बरबादी के सिवाय कुछ भी नहीं है। संगठन एक ऐसा समूह होता है जिसमें छोटे- बड़े अधिकारी होते हैं और इनके पास सम्पत्ति होती है। पदधारक समूह के लोगों में छोटे लोगों को अपने से उपर के अधिकारी को अपने कार्य की जानकारी देनी होती है/रिपोर्ट करना होता है जो कि बहुत महत्वपूर्ण कार्य माना जाता है। और इसलिए जो सदस्य इस परंपरा का पालन नहीं करते उन्हें अक्सर निकाल दिया जाता है या कम से कम उन्हें पदोन्नति तो नहीं ही दी जाती है। संगठन में केवल “किए जाने वाले कार्यों” की ही सूची नहीं बनाई जाती बल्कि “न किए जाने वाले कार्यों” की भी सूची बनाई जाती है जिससे सदस्यों की क्षमता कम होती है। संगठन बदलाव लाने और फेरबदल के कामों के विरूद्ध भी हो सकती है। संगठन के लिए सम्पत्ति और बहुत अधिक धन की जरूरत पड़ती है और यह फंड सदस्यता शुल्क अथवा इससे भी खराब यह कि चन्दा/दान लेकर जमा की जाती है। सदस्यता शुल्क में अधिकांश मामलों में कमी आ जाती है। और इसलिए संगठन में सदस्यों से दान/चन्दा वसूलने के लिए कहा जाता है। और फिर वह स्थिति आ जाती है जहां पतन शुरू होता है। और फिर संगठनों के नेताओं को दान देने वालों की शर्तों को स्वीकार करना पड़ता है। संदेह न करने वाले सदस्यों को यह सच्चाई बाद में समझ में आती है। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होती है।
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यदि कोई व्यक्ति शिक्षण संस्थान, अस्पताल आदि चलाने जैसे कार्य-कलाप करना चाहता है तो इसके लिए धन जमा करना और संगठन बनाना जरूरी होता है। लेकिन राजनैतिक सुधारों के लिए केवल संचार की ही जरूरत पड़ती है और इससे ज्यादा कुछ भी नहीं। क्यों ?
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आम तौर पर कोई भी कार्यकलाप जिसके लिए समय और पैसा दोनों चाहिए उस कार्य के लिए संगठन की जरूरत पड़ती है, लेकिन यदि कोई ऐसा काम जिसमें समय की जरूरत पड़े तथा बहुत थोड़े पैसे की जरूरत पड़े उसके लिए संगठन की जरूरत नहीं है। संचार समूह ही काफी है। हम लोगों के पास सरकार नाम की एक संस्था पहले से ही है और हमारा लक्ष्य सरकार में सुधार करना होना चाहिए। सरकार में सुधार करने के लिए हमें राइट टू रिकॉल जैसे कानून लागू कराने की जरूरत है। प्रजा अधीन-राजा, जूरी प्रथा, सेना के लिए खनिज रॉयल्टी आदि कानूनों को लागू करने के लिए हमें 'जनता की आवाज- पारदर्शी शिकायत प्रणाली' कानून की जरूरत पड़ेगी अथवा हमें 100-300 संसदीय सीटें जीतने की जरूरत पड़ेगी। चुनाव जीतने का काम विरोधियों की गलतियों पर ज्यादा निर्भर करता है और यह क्लोन-निगेटिव है जबकि 'पारदर्शी शिकायत प्रणाली' के द्वारा अन्य जन हित के क़ानून लाने के लिए विरोधियों की गलतियों की जरूरत नहीं पड़ती अत: यह तरीका क्लोन-पॉजेटिव है।
'जनता की आवाज-पारदर्शी शिकायत प्रणाली' जैसा कानून लाने के लिए हमें एक व्यापक आन्दोलन की जरूरत है। और व्यापक आन्दोलन खड़ा करने के लिए हमें उन लोगों के बीच संचार की जरूरत पड़ेगी जो 'जनता की आवाज-पारदर्शी शिकायत प्रणाली’ अथवा राइट टू रिकॉल, नागरिक और सेना के लिए खनिज रोयल्टी, जूरी प्रथा आदि कानून चाहते हैं। हमें किसी ऐसे संगठन की जरूरत नहीं है जहां लोग शारीरिक और भौतिक कार्य कलापों के लिए आदेश देते हैं और आदेश मानते हैं। संगठन बनाने से केवल मूल्यवान समय और धन की बरबादी के सिवाय और कुछ नहीं होगा।
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अब भारत के 110 करोड़ वैसे लोगों के लिए क्या करें जिनके पास इंटरनेट नहीं है ? इनमें से कुछ लोगों से सम्पर्क करने के लिए हम एस.एम.एस. का उपयोग कर सकते हैं जो नि:शुल्क है। शेष लोगों के लिए हमें पम्फलेटों और समाचार विज्ञापनों, बुक-पोस्ट, इनलैंड और पोस्ट कार्ड की जरूरत पड़ेगी और मतदाताओ की सूची अपने स्थानीय कार्यकर्ता से प्राप्त कर इन्हें ये सामग्री भेज सकते हैं। इसके लिए वे लोग योगदान दे सकते हैं जो प्रजा अधीन-राजा, जूरी प्रथा व सेना के लिए खनिज रॉयल्टीं कानूनों के प्रति बहुत ज्यादा प्रतिबद्ध हैं। ऊपर दिए गए कार्य-कलापों के पहले सेट के जरिए एक बड़ा संचार समूह तैयार हो जाता है। कार्यकलापों के अगले समूह में मीडिया कर्मियों का ध्यान आकर्षित करने के बारे में बताया गया है।

आखिर क्यों बीजेपी के नेता हिन्दुओ को ‘होली पर पानी बचाने’ तथा ‘जल विहीन होली’ मनाने के लिए प्रोत्साहित कर रहे है ? (29-Mar-2016) No.1

March 29, 2016 No.1

https://www.facebook.com/mehtarahulc/posts/10153388228456922

आखिर क्यों बीजेपी के नेता हिन्दुओ को ‘होली पर पानी बचाने’ तथा ‘जल विहीन होली’ मनाने के लिए प्रोत्साहित कर रहे है ?
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होली पर रंग खेलने में प्रति व्यक्ति कितने पानी कि खपत होती है ? 100 लीटर प्रति व्यक्ति से भी कम. और मांस के उत्पादन पर कितना पानी खर्च किया जाता है ? ज्वार/बाजरे के प्रति किलोग्राम उत्पादन पर 50 लीटर जबकि भैस के एक किलो मांस के उत्पादन पर 5000 लीटर पानी की आवश्यकता होती है !!! लेकिन होली वर्ष में सिर्फ एक बार एक दिन के लिए ही आती है --- जबकि भैंस के मांस का उत्पादन पूरे वर्ष किया जाता है. 

कहने का मतलब यह है कि ----- हर व्यक्ति अपनी इच्छानुरूप चलने के लिए स्वतंत्र है, जब तक कि जल को व्यर्थ करना अपराध की श्रेणी में नही आता हो. भैंस का मांस खाना अपराध की श्रेणी में नहीं आता, अत: जो कोई व्यक्ति एक किलो मांस का भक्षण करके अप्रत्यक्ष रूप से 5000 लीटर पानी का उपभोग कर रहा है, तो उसे ऐसा करने देना चाहिए ---- क्योंकि कीमत भी उपभोक्ता ही चुका रहा है. इसीलिए यदि कोई होलिकात्सव पर 100 लीटर पानी रंग खेलने में खर्च करना चाहता है तो उसके ऐसा करने पर भी किसी को कोई आपत्ति नही होनी चाहिए. मैं विरोध नही करूँगा. लेकिन मैं उन तरीको के खिलाफ हूँ जिनमे होली खेलने के लिए 10 हजार किलो टमाटरो का इस्तेमाल किया जाता है !!! (हाँ, ऐसा अहमदाबाद में होता है ---- यहाँ किसी पार्टी या क्लब में कुछ 10 हजार टमाटरो को एक दुसरे पर फेंक कर होली खेली जाती है !!) इस प्रकार से होली खेलना अपराध की श्रेणी में आता है. लेकिन होली खेलने पर 100 लीटर पानी खर्च करना अपराध नही है.
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और होली खेलने के सूखे रंगों के निर्माण में ‘टेसू के फूलो के घोल’ से ज्यादा पानी की आवश्यकता होती है !!!
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जल संकट का कारण जलाभाव नही बल्कि सप्लाई लाइन की अनुपलब्धता है. उदाहरण के लिए अहमदाबाद में 100 लीटर पानी बचाने से भी महाराष्ट्र जैसे राज्य के अभावग्रस्त इलाको में जल की एक बूँद भी नही पहुंचेगी --- क्योंकि अहमदाबाद से महाराष्ट्र के उन इलाको में पानी पहुंचाने का कोई नेटवर्क नही है. मांस, चिकेन और गेहू/चावल को दिए जा रहे अनुदान समाप्त करना, अनिवार्य रूप से पानी के मीटर लगाना तथा ज्यूरी प्रक्रियाएं लागू करना आदि जल संकट से निपटने का सही तरीका है. ज्यूरी प्रक्रियाएं आने से जल शोधन उपकरण और बिजली कि दरें सस्ती होगी.

लेकिन जैसी कि उम्मीद थी, मिशनरीज़ द्वारा प्रायोजित पेड-बुद्धिजीवी जो कि मांस भक्षण का समर्थन करते है, हिन्दुओ को जल विहीन होली मनाने की नसीहतें दे रहे है.
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दुःख का विषय है कि अब तक बीजेपी के एक भी नेता ने ‘जल विहीन होली’ कि इस बेतुकी सलाह का विरोध नही किया है. यहाँ तक कि किसी भी बीजेपी नेता ने अपने परिवार और मित्रो पर रंगों का पानी फेंकते हुए दिखाने का सांकेतिक वीडियो या तस्वीरे तक सार्वजनिक नही की है. 
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बीजेपी के नेता हिन्दू परम्पराओं को नष्ट करने में अब कोंग्रेस/आम आदमी पार्टी से भी बेहतर काम कर रहे है. उदाहरण के लिए बीजेपी के सांसद और मंत्री हर्षवर्धन ने दिल्ली चुनाव जीतने पर कार्यकर्ताओं को आतिशबाजी करने के निर्देश दिए. और इसमें कोई गलत बात भी नही है. लेकिन इन्ही हर्षवर्धन ने दीपावली पर आतिशबाजी करने का विरोध किया !!! और मोदी साहेब ने भी दीपावली पर आतिशबाजी का विरोध प्रदर्शित करने के लिए एक फुलझड़ी तक चलाते हुए फोटो खिंचाने से भी इनकार कर दिया !!! वे नही चाहते थे कि लोग उन्हें दीपावली पर आतिशबाजी करते हुए देख कर प्रेरित हो. दुसरे शब्दों में बीजेपी के सभी नेताओ ने तब दीपावली पर आतिशबाजी करने का विरोध किया और अब ये लोग होली पर पानी से रंग खेलने का विरोध कर रहे है. 
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हम राईट टू रिकॉल ग्रुप के कार्यकर्ता दीपावली पर अहानिकर आतिशबाजी चलाने का समर्थन करते है और हम होली पर पानी से रंग खेलने के भी समर्थन में है. दरअसल, दीपावली पर आतिशबाजी और होली पर पानी से रंग खेलने का विरोध सिर्फ हिन्दू परम्पराओं को नष्ट करने और मिशनरीज को खुश करने के लिए किया जा रहा है. इसीलिए हमारा आग्रह है कि बीजेपी नेताओं समेत उन सभी व्यक्तियों का विरोध करें जो दीपावली पर आतिशबाजी और पानी से होली खेलने का विरोध करते है.
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