घूस खाना मेरा जन्म सिद्ध अधिकार है और मैं इसे खाकर ही रहूँगा !!!
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बात आरक्षण की है।
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जो लोग आरक्षण का विरोध कर रहे है वे भी उतने ही बेईमान है जितने की वे, जो कि आरक्षण मांग रहे है।
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किसी निजी कंपनी में झाड़ू पौछा करने की नौकरी के लिए कितने लोग आरक्षण की मांग कर रहे है ? लेकिन यही काम यदि उन्हें सरकारी दफ्तर में करने को मिले तो लोग सड़को पर उतर कर बसे फूंकने, पथराव करने और यहाँ तक कि खुद को आग लगाने के लिए भी तैयार है। और यही स्थिति सभी सरकारी नौकरियों के साथ है। क्योंकि निजी कंपनी में किसी व्यक्ति को कामचोरी करने पर मालिक द्वारा नौकरी से निकाल दिया जाता है जबकि सरकारी नौकरी कम काम करने के बावजूद सुरक्षित है। तो नौकरी नहीं सरकारी नौकरी चाहिए और सरकारी नौकरी के लिए आरक्षण चाहिए।
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यहां आशय यह नहीं है कि सभी सरकारी कर्मचारी कामचोर है और मुफ्त का पैसा उड़ा रहे है। लेकिन यह सच है कि 1) यदि प्राइवेट कंपनी किसी कर्मचारी को 300 रू रोज देती है तो अमुक व्यक्ति को उतने ही रूपये का काम भी करना होता है, जबकि सरकारी कम्पनी में न्यूनतम कार्य करने पर भी नौकरी चालू रहती है। 2) प्राइवेट कंपनी में काम नहीं किया तो नौकरी जायेगी जबकि सरकारी नौकरी में अफसर को खुश करके रखने से नौकरी से हाथ धोने की सभावना लगभग नहीं है। 3) प्राइवेट कम्पनी में घूस खाने का अवसर नहीं है, जबकि सरकारी नौकरी घूस खाकर असीमित धन कमाने का अवसर प्रदान करती है। पद जितना बड़ा होगा ये अवसर भी उतने ही अधिक होंगे। 4) नागरिक सरकारी कर्मचारियों से बेहद मुलायमियत से पेश आते है। कई अधिकारी जनता को मवेशियों की तरह ट्रीट करते है क्योंकि उन्हें और जनता दोनों को पता है कि जनता उनका कुछ उखाड़ नहीं सकती। प्राइवेट नौकरी में यह ठसक नहीं है।
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दूसरे शब्दों में जब कोई काम करने के लिए जितना पैसा मिले उतना ही काम करना पड़े तो ऐसी नौकरी कोई नहीं करना चाहेगा, ख़ास तौर पर तब, जबकि उतना ही पैसा कम काम करने से मिल रहा हो।
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मतलब, यदि सरकारी नौकरियों से भ्रष्टाचार मिटा दिया जाए और निकम्मापना देखने पर उन्हें नौकरी से निकालने की सहज प्रक्रिया हो, तो आरक्षण की मांग करने वाले और विरोध करने वाले दोनों ही फरार हो जाएंगे और आपको ढूंढे से भी नहीं मिलेंगे।
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लेकिन यह देखा गया है कि है कि जब भी आरक्षण का विषय आता है हजारो की संख्या में लोग समर्थन और विरोध करने निकल आते है, लेकिन उनमे से एक आध प्रतिशत ही सांसद से भ्रष्टाचार मिटाने के कानूनो को गैजेट में प्रकाशित करने की मांग करते है। ये सभी सरकार पर आरक्षण के क़ानून को लेकर दबाव बनाने में लगे रहते है। समर्थन वाले भी, और विरोध वाले भी।
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असल में यह कुश्ती घूस का अधिकार प्राप्त करने को लेकर है।
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आप ध्यान देंगे तो सुन पाएंगे कि आरक्षण मांगने वाले कह रहे है कि, हर साल सरकारी अधिकारी करोडो रूपये की रिश्वत खा रहे है, इसलिए मुझे और मेरे जाति भाइयो को भी इसमें से रूपया खाने का मौका दिया जाए। इसलिए ये लोग सरकारी विभागों से भ्रष्टाचार दूर करने के कानूनो की मांग करने की जगह उस भ्रष्टाचार में हिस्सा खाने के लिए आरक्षण का क़ानून लागू करने की मांग करते है।
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और आरक्षण का विरोध करने वाले कहते है कि सरकारी अधिकारी करोडो रूपये की रिश्वत खा रहे है उन्हें खाने दो, जो योग्य है उन्हें ही ये घूस खाने का अवसर मिलना चाहिए। इसलिए मेरी रुचि उन कानूनो में नहीं है जिससे ये भ्रष्टाचार ख़त्म हो जाए। आप आरक्षण ख़त्म कर दो ताकि योग्यता के आधार पर घूस का बाँट बखरा किया जा सके।
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दोनों ही अपने अपने ढंग से लगे हुए है।
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सरकारी नौकरियों पर टूट कर पड़ने का मुख्य कारण 'सेवा सुरक्षा' और घूस खाने के अवसर है। यहाँ सेवा सुरक्षा से मतलब है कि कामचोरी करने के बावजूद नौकरी कायम रहना। जबकि निजी कम्पनी में कामचोरी करने पर सेवा की सुरक्षा का लोप हो जाता है। राजकिय कर्मचारियों को घर जमाई यूँ ही नही कहा जाता। जो कुछ ईमानदार कर्मचारी है वे ताउम्र सिस्टम से लड़ते रहते है और प्रतिभाशाली लोग अच्छे प्रदर्शन के बावजूद पदोन्नति के अवसर न होने के कारण सरकारी नौकरियों की और देखते भी नही।
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यदि कल सरकार आदेश जारी करके नयी होने वाली सभी सरकारी नियुक्तियों के वेतन में 25% की कटौती कर दे तब भी आरक्षण के लिए टूटे पड़ रहे लोगो में कोई उल्लेखनीय कमी नहीं आएगी। क्योंकि वेतन से कोई लेना देना ही नही है। सारा मामला सेवा सुरक्षा (निकम्मापन) और घूस खाने के अवसर का है।
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यदि हम अमेरिका का उदाहरण ले तो इस फ़र्क़ को समझा जा सकता है। अमेरिका में सरकारी नौकरियों में 'रोजगार के समान अवसर' नाम से योजना लागू है जो कि एक प्रकार का आरक्षण है। इस के तहत कुछ अफ़्रीकी अमेरिकन वर्ग के नागरिको को आरक्षण का लाभ दिया जाता है। लेकिन वहाँ न तो इस आरक्षण को मांगने वालो की तादाद ज्यादा है न ही इसका विरोध करने वालो की। क्योंकि इस कोटे के तहत नौकरी पाने वाले को लॉटरी नहीं लगी जा रही है। उन्हें वहाँ जितना वेतन मिलता है उसके अनुसार काम करना पड़ता है, और निकम्मापन दिखाने पर सेवा सुरक्षा खतरे में आ जाती है। इसका कारण है कि कई विभागों जैसे पुलिस, शिक्षा, न्यायपालिका आदि के मुख्य अधिकारियों को नौकरी से निकालने का अधिकार वहाँ की जनता के पास है। अत:कर्मचारियों को काम करना होता है जबकि भारत में अफसर की लल्लो चप्पो करते रहने से नौकरी भी सुरक्षित रहती है और सब मिलजुल कर धांधलीया भी करते है।
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जब आरक्षण मांगने वालो और विरोध करने वालो से कहा जाता है कि इस सर्कस को रोकने के लिए भारत में राईट टू रिकाल कानूनो की जरुरत है, अत: अपने सांसद से इन कानूनो की मांग कीजिये ताकि भारत की राजकीय सेवाओ में व्याप्त भ्रष्टाचार को खत्म किया जा सके तो दोनों ही पक्ष इन कानूनो का विरोध करते है और अपनी शक्ति आरक्षण मांगने और ख़त्म करने पर लगाते है।
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इसी तरह यह तर्क कि, आरक्षण योग्यता के साथ अन्याय है, और इस व्यवस्था के कारण नाकाबिल लोग नियुक्त किये जा रहे है, पूरी तरह सही नही है। मेडिकल एंट्रेंस की वरीयता सूचियाँ देखने पर मालूम होता है कि जहां सामान्य वर्ग की मेरिट 92% पर रहती है तो SC, ST और OBC का कट ऑफ क्रमश: 88%, 86% और 90% रहता है। लेकिन अप्रवासी (NRI) कोटे का कट ऑफ काफी नीचे, लगभग 70% के आसपास रहता है। इस स्थिति में योग्यता को ज्यादा नुकसान तो वित्त पोषित (self financed quota) सीटो से हो रहा है।
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लेकिन यह अजीब बात है कि योग्यता-न्याय के आधार पर आरक्षण को ख़त्म करने की मांग करने वाले कभी भी वित्त पोषित कोटे को ख़त्म करने की मांग नहीं करते।
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सार यह है कि जो भी आरक्षण की समस्या का हल चाहते है, उन्हें अपने सांसदों से राईट टू रिकॉल प्रक्रियाओ एवं जूरी सिस्टम कानूनो को गैजेट में छापने की मांग करनी चाहिए ताकि सरकारी विभागों में व्याप्त भ्रष्टाचार और कामचोरी बंद हो। ऐसा होने से आरक्षण मांगने वालो और आरक्षण ख़त्म करने वालो, दोनों की ही संख्या में कमी आ जायेगी।
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अलावा इसके, आरक्षण समस्या के समाधान के लिए हमने जो कानूनी ड्राफ्ट प्रस्तावित किये है उन्हें यहां पढ़ा जा सकता है।
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